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Bhagalpur Manjusha Art Soup Demand In Abroad: बिहार के भागलपुर में छठ महापर्व की तैयारियां जोरों पर हैं. इस बार सूप पर उकेरी गई पारंपरिक मंजूषा कला देश ही नहीं, बल्कि अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे बाहरी देशों में भी भेजी जा रही है, जिससे स्थानीय कलाकारों को काफी प्रोत्साहन मिल रहा है.
भागलपुर. कार्तिक मास प्रारंभ होते ही बिहारवासियों के मन में एक अलग ही खुशी होने लगती है और एक अलग ही उत्साह नजर आने लगता है. इस माह में सूर्य की किरणें और खेतों की हरियाली अलग ही देखने को मिलती है, जिसको देखकर मन फूले नहीं समाता है. विदेश में रहने वाले लोग देश तो अलग-अलग राज्यों में रहने वाले लोग अपने शहर आते हैं. क्योंकि यह माह लेकर आता है बिहार का सबसे बड़ा महापर्व और इसी से शुरुआत होती है बिहार की कहानियों की. दरअसल, जिस पर्व की बात कर रहे हैं, उसे हम लोग छठ पर्व के नाम से जानते हैं और छठ की छटा छाने लगी है.
सूप पर मंजूषा कला की झलक
इसकी तैयारी जोर-शोर से हो रही है और इसको लेकर लोग सूप बनाने की तैयारी में जुट गए हैं. सूप पर भागलपुर की लोक कला मंजूषा की झलक इसको बिल्कुल ही अलग बनाती है. आपको बता दें कि सूप में तीन रंगों से बनी आकृति इसको अलग बनाती है. इसको लेकर जब मंजूषा गुरु मनोज पंडित के घर पर लोकल 18 की टीम गई तो वहां पर कुछ बच्चियों के द्वारा सूप पर मंजूषा उकेरी जा रही थी. इसको लेकर जब वैष्णवी से बात की गई तो उन्होंने बताया कि छठ प्रकृति से जुड़ा महापर्व है.
इसमें सारी चीजें प्रकृति की दी हुई होती हैं और भागलपुर की लोक कला भी प्रकृति की एक अलग झलक है. मंजूषा मां बिहुला-विषहरी से जुड़ी हुई गाथा है. जब यह सूप पर जाती है तो यह एक अलग ही संदेश देती है. इसके साथ-साथ यहां की लोक कला का विस्तार भी होता है. सूप की सुंदरता के साथ-साथ लोग यहां की लोक कला को भी जान पाते हैं.
इसको लेकर क्या कहते हैं मंजूषा गुरु मनोज पंडित
जब लोकल 18 की टीम ने मंजूषा गुरु से बात की तो उन्होंने बताया कि इस बार मंजूषा पेंटिंग वाले सूप अपने देश के अलग-अलग राज्यों में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी भेजे जा रहे हैं. अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से इसका ऑर्डर मिलना बड़े ही सौभाग्य की बात है. जिस तरीके से मंजूषा सूप का ऑर्डर मिला है, उसी तरीके से यहां पर दीप व अन्य चीजों पर भी मंजूषा उकेरी जाती है और उसकी अच्छी-खासी डिमांड होती है.
मनोज पंडित बताते हैं कि जब अपने राज्य की कला व परंपरा विदेश में भी जाने लगे तो यह हमारे लिए गौरवपूर्ण क्षण होता है. मन को प्रफुल्लित तो करता ही है, इसके साथ-साथ जो मेहनत इतने दिनों से मंजूषा पर हुई है, वह साकार होती भी नजर आती है.
तीन रंगों की होती है मंजूषा
इसको लेकर मंजूषा स्कूल की प्राध्यापिका सुमना बताती हैं कि यह तीन रंगों की होती है और तीनों रंगों का अपना अलग-अलग महत्व है. शांति, समृद्धि और विकास के प्रतीक होते हैं ये तीन रंग और इसी से पूरा मंजूषा तैयार किया जाता है. इसे बनाने में काफी मेहनत लगती है और धैर्य धारण करना पड़ता है. हालांकि विदेशों में इस सूप की मांग से कलाकारों को काफी प्रोत्साहन मिला है.