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Gold Price Prediction : जनवरी, 2026 में सोना 5,400 डॉलर प्रति औंस था. लेकिन, अब यह गिरकर 4000 डॉलर औंस पर आ गया है. इतनी बड़ी गिरावट के बावजूद भी बड़े ज्वैलर्स अभी सोने की खरीदारी से बच रहे हैं. त्योहारी सीजन में सोने की डिमांड कम होने से सभी हैरान हैं.
अक्टूबर से दिसंबर की तिमाही को भारत में सोने का सबसे बड़ा पीक सीजन माना जाता है.
नई दिल्ली. दिवाली और धनतेरस का मौका हो और भारतीय सर्राफा बाजार में सोने की चमक न दिखे, ऐसा कम ही होता है. लेकिन, इस बार बाजार ठंडा नजर आ रहा है. आम ग्राहक तो छोडिए इस बार तो बड़े ज्वलैर्स भी सोना खरीदने में आनाकानी कर रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय और घरेलू बाजार में सोने का रेट 24 फीसदी गिरने के बाद भी देश के ज्वैलर्स भारी मात्रा में सोना खरीदने से बच रहे हैं. आमतौर पर होता ये है कि गोल्ड का रेट नीचे आते ही बड़े ज्वैलर्स खूब सोना खरीदते हैं. लेकन, इस बार वे ‘वेट एंड वॉच’ के मूड में हैं. उनके इस रुख से अब सवाल उठ रहा है कि क्या सोना अभी और सस्ता होने वाला है?
इस साल जनवरी में सोना 5,400 डॉलर प्रति औंस के रिकॉर्ड स्तर को पार कर गया था. इस रिकॉर्ड ऊंचाई से अब तक सोने की कीमतों में करीब 24 फीसदी की बड़ी गिरावट आ चुकी है. पिछले हफ्ते सोना 4,000 डॉलर प्रति औंस के स्तर से भी नीचे लुढ़क गया. इतनी बड़ी गिरावट के बाद भी बाजार के दिग्गजों की चुप्पी आम खरीदारों के मन में भी सवाल खड़े कर रही है.
ज्वैलर्स क्यों नहीं खरीद रहे सोना
सीएनबीसी आवाज की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश की सबसे प्रतिष्ठित बुलियन रिफाइनरी एमएमटीसी-पीएएमपी इंडिया (MMTC-PAMP India) के सीईओ और मैनेजिंग डायरेक्टर समीत गुहा के का कहना है की देश की बड़ी ज्वैलरी कंपनियां अभी आक्रामक खरीदारी नहीं कर रही हैं. बुलियन मार्केट की एक पुरानी रणनीति है. जब कीमतें लगातार बढ़ रही होती हैं तो ज्वैलर्स आगे के नुकसान से बचने के लिए स्टॉक जमा करते हैं. लेकिन जब कीमतों में लगातार गिरावट का ट्रेंड बन जाता है, तो वे मानकर चलते हैं कि निचले स्तर का बॉटम अभी बाकी है. बड़े ज्वैलर्स को लगता है कि कीमतें और नीचे जा सकती हैं. इसलिए वे सही समय और सबसे सस्ते भाव का इंतजार कर रहे हैं. अभी केवल छोटे और मझोले स्तर के ज्वैलर्स ही जरूरत के हिसाब सोना खरीद रहे हैं.
इंपोर्ट ड्यूटी का असर
सोने की सुस्त मांग के पीछे घरेलू नीतियां भी बड़ा कारण हैं. सरकार ने मई में सोने पर आयात शुल्क बढ़ाकर 15 फीसदी कर दिया था. इससे घरेलू बाजार में सोने की लैंडिंग कॉस्ट काफी बढ़ गई है. भारत अपनी घरेलू खपत का लगभग पूरा सोना विदेशों से आयात करता है, जिससे देश का व्यापार घाटा (Trade Deficit) बढ़ता है. इसी संतुलन को साधने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी समय-समय पर देशवासियों से गैर-जरूरी सोने के आयात और खरीदारी को सीमित रखने की अपील कर चुके हैं. ड्यूटी बढ़ने से बड़े ज्वैलर्स के लिए भारी इन्वेंट्री ब्लॉक करना महंगा सौदा साबित हो रहा है.
त्योहारी सीजन में मांग कमजोर रहने की आशंका
अक्टूबर से दिसंबर की तिमाही को भारत में सोने का सबसे बड़ा पीक सीजन माना जाता है, जिसमें दिवाली, धनतेरस और शादियों की खरीदारी एक साथ निकलती है. लेकिन इस बार बड़े प्लेयर्स के हाथ खींचने से फेस्टिव सीजन की ओवरऑल डिमांड पर असर पड़ने की आशंका है. सिटी रिसर्च (Citi Research) के एक अनुमान के अनुसार, अक्टूबर से दिसंबर के दौरान भारत में सोने का कुल आयात गिरकर महज 106 टन रह सकता है.
समीत गुहा का कहना है कि पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले इस बार MMTC-PAMP की कुल बिक्री में नरमी रही है, हालांकि अक्टूबर के पहले पखवाड़े में खुदरा खरीदारी की रफ्तार थोड़ी बेहतर हुई है. जानकारों का मानना है कि जैसे ही बाजार में यह संकेत मिलेगा कि सोने के दाम अपने निचले स्तर को छू चुके हैं या वहां से हल्का रिवर्सल शुरू होगा. बड़े ज्वैलर्स अच्छी खरीदारी शुरू कर सकते हैं.