UPPSC recruitment scam 2012:अखिलेश सरकार में किन भर्तियों पर उठे थे सवाल, PCS से सहकारिता भर्ती तक जानें क्‍या था पूरा मामला?

UPPSC recruitment scam 2012:अखिलेश सरकार में किन भर्तियों पर उठे थे सवाल, PCS से सहकारिता भर्ती तक जानें क्‍या था पूरा मामला?


UPPSC recruitment scam 2012: उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरियों को लेकर एक बार फिर योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव आमने-सामने हैं. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में नियुक्ति पत्र वितरण कार्यक्रम में 2017 से पहले की सरकारों की भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि उस दौर में भर्ती बोर्ड और आयोग राजनीति, भाई-भतीजावाद और गड़बड़ियों से प्रभावित थे. उन्होंने कहा कि पहले नियुक्तियों के नाम पर खेल होता था जबकि उनकी सरकार में पारदर्शी तरीके से युवाओं को नियुक्ति पत्र दिए जा रहे हैं.

योगी के इस बयान के बाद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पलटवार किया. उन्होंने योगी सरकार पर निशाना साधते हुए दावा किया कि देश में सबसे ज्यादा प्रश्नपत्र लीक उत्तर प्रदेश में हुए हैं यानी चुनावी माहौल के बीच यूपी की राजनीति में सरकारी नौकरी और पेपर लीक का पुराना मुद्दा फिर चर्चा में आ गया है लेकिन सवाल यह है कि आखिर अखिलेश यादव के 2012 से 2017 के मुख्यमंत्री कार्यकाल में ऐसी कौन-कौन सी परीक्षाएं और भर्तियां थीं, जिन पर गड़बड़ी, पक्षपात, जातिवाद, भाई-भतीजावाद या पेपर लीक जैसे आरोप लगे? इनमें कौन से मामले सिर्फ आरोप रहे और किन मामलों में जांच, अदालत या सरकारी कार्रवाई हुई? इसे आसान भाषा में समझते हैं…

सबसे पहले बात UPPSC की, जिस पर सबसे ज्यादा सवाल उठे

अखिलेश यादव सरकार के दौरान उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग यानी यूपीपीएससी की कई भर्तियां विवादों में रहीं.2017 में योगी सरकार ने अप्रैल 2012 से मार्च 2017 के बीच आयोग की ओर से कराई गई परीक्षाओं और नियुक्तियों की जांच सीबीआई को सौंपने का फैसला किया था.बाद में केंद्र ने भी सीबीआई को जांच की जिम्मेदारी दी.उस जांच के दायरे में बड़ी संख्या में परीक्षाएं और नियुक्तियां आईं.सरकार की ओर से सीबीआई जांच की सिफारिश करते समय जिन शिकायतों का जिक्र किया गया उनमें स्केलिंग में गड़बड़ी, इंटरव्यू के नंबरों में अनियमितता, उत्तर पुस्तिकाएं बदलने, पेपर लीक होने के बावजूद परीक्षा रद्द न करने, आरक्षण नियमों के उल्लंघन और किसी खास क्षेत्र या जाति के अभ्यर्थियों को ज्यादा नंबर देने जैसे आरोप शामिल थे यानी उस समय विवाद सिर्फ एक परीक्षा तक सीमित नहीं था. अलग-अलग भर्ती परीक्षाओं को लेकर प्रतियोगी छात्र लगातार सवाल उठा रहे थे और कई मामले अदालत तक भी पहुंचे थे.

पीसीएस-2011 में ज्यादा नंबर देने का आरोप

इस पूरे विवाद में सबसे ज्यादा चर्चा पीसीएस-2011 की हुई.आरोप लगा कि इंटरव्यू में एक खास जाति के अभ्यर्थियों को ज्यादा नंबर दिए गए और इससे उनकी मेरिट ऊपर चली गई.इंडिया टुडे की 2014 की पड़ताल में बताया गया था कि पीसीएस-2011 में चयनित 86 ओबीसी अभ्यर्थियों में करीब 50 यादव थे. रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि कई चयनित यादव अभ्यर्थियों को इंटरव्यू में 135 से 140 के बीच अंक मिले जबकि सामान्य वर्ग, गैर-यादव ओबीसी और एससी-एसटी अभ्यर्थियों के औसत अंक इससे कम थे. इन आंकड़ों को लेकर आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठे थे. उस समय आरोप इंटरव्यू नंबरों के पैटर्न और चयन प्रक्रिया को लेकर लगाया गया था और इसी आधार पर मामला अदालत तथा बाद में सीबीआई जांच के दायरे में आया.बाद में सीबीआई जांच से संबंधित दस्तावेजों में भी पीसीएस समेत विभिन्न परीक्षाओं में किसी खास जाति और क्षेत्र के अभ्यर्थियों को लाभ पहुंचाने के आरोपों का उल्लेख हुआ.

इतिहास प्रवक्ता भर्ती में भी उठे सवाल

यूपीपीएससी की भर्तियों में इतिहास प्रवक्ता की सीधी भर्ती भी विवादों में आई थी. उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक 15 पदों के लिए हुई भर्ती में सामान्य वर्ग के 7, ओबीसी के 5 और एससी के 3 पद थे. आरोप लगाया गया कि चयनित अभ्यर्थियों में एक खास जाति के लोगों की संख्या असामान्य रूप से ज्यादा रही.उस समय इस तरह की कई भर्तियों को लेकर यह आरोप लगाया गया कि सामान्य वर्ग के पदों पर भी ओबीसी की एक खास जाति के अभ्यर्थियों को फायदा पहुंचाया गया. इन दावों को लेकर प्रतियोगी छात्रों ने आयोग की चयन प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे.

जेई सिविल भर्ती में भी लगे थे अनियमितता का आरोप

जेई सिविल भर्ती-2011 भी उन भर्तियों में शामिल थी जिन पर सवाल उठे. उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक 542 पदों की सीधी भर्ती में सामान्य और एससी-एसटी के पद निर्धारित थे, लेकिन अंतिम परिणाम में बड़ी संख्या में ओबीसी अभ्यर्थियों के चयन को लेकर विवाद हुआ.प्रतियोगी छात्रों और शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया कि चयन प्रक्रिया में आरक्षण और मेरिट के नियमों का सही तरीके से पालन नहीं हुआ.इसी तरह सिविल इंजीनियरिंग के लेक्चरर पदों की भर्ती को लेकर भी चयन प्रक्रिया पर सवाल उठे थे.इन मामलों को बाद में यूपीपीएससी की व्यापक सीबीआई जांच के संदर्भ में भी देखा गया.

सुहासिनी बाजपेयी की कॉपी बदलने का मामला

यूपीपीएससी की कार्यप्रणाली पर सबसे चर्चित मामलों में पीसीएस-2015 की मुख्य परीक्षा में सुहासिनी बाजपेयी की उत्तर पुस्तिका का मामला भी रहा.सुहासिनी बाजपेयी ने दावा किया था कि उनकी उत्तर पुस्तिका बदल गई थी.बाद में आयोग ने उनकी आपत्ति के बाद प्रक्रिया में गड़बड़ी स्वीकार की और उन्हें इंटरव्यू में शामिल किया.इस मामले में आयोग के दो कर्मचारियों को निलंबित भी किया गया था.यह मामला इतना चर्चित हुआ कि 2017 के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसे उठाया था.बाद में अदालत में यूपीपीएससी से जुड़ी कार्यप्रणाली पर चल रहे मामलों में इस प्रकरण का उल्लेख हुआ.

पीसीएस-2014 में गलत सवालों को लेकर HC पहुंचा मामला

पीसीएस-2014 की प्रारंभिक परीक्षा भी विवाद से अछूती नहीं रही.अभ्यर्थियों ने आरोप लगाया कि करीब 25 प्रश्न गलत थे और उत्तर कुंजी को लेकर आपत्तियां थीं.मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा था.इसके अलावा न्यायिक सेवा यानी पीसीएस-जे 2013 की प्रारंभिक परीक्षा में भी प्रश्नों और उत्तर कुंजी को लेकर याचिकाएं दाखिल हुईं.हाईकोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक आयोग ने विशेषज्ञों की रिपोर्ट के बाद ऐसे प्रश्न हटाने और सभी अभ्यर्थियों की उत्तर पुस्तिकाओं का दोबारा मूल्यांकन करने का फैसला किया था.इसके बाद संशोधित परिणाम जारी हुआ.इस तरह हर विवाद का मतलब पेपर लीक या भ्रष्टाचार नहीं था.कुछ मामलों में सवाल गलत होने, उत्तर कुंजी में गलती या प्रक्रिया संबंधी विवाद अदालत तक पहुंचे और फिर परिणाम दोबारा जारी हुए.

यूपीपीएससी की किन-किन भर्तियों पर उठे थे सवाल?

अखिलेश सरकार के दौरान यूपीपीएससी की जिन भर्तियों और परीक्षाओं को लेकर विवाद या शिकायतें सामने आईं उनमें पीसीएस-2011, पीसीएस-2012, पीसीएस-2013, पीसीएस-2014, पीसीएस-2015, पीसीएस-2016, पीसीएस-जे 2013, लोअर सबऑर्डिनेट परीक्षा, आरओ-एआरओ, एपीओ, जेई और विभिन्न प्रवक्ता व शिक्षक भर्तियां शामिल थीं.इसके अलावा सहायक अभियोजन अधिकारी, समीक्षा अधिकारी/सहायक समीक्षा अधिकारी, राजस्व निरीक्षक, खाद्य सुरक्षा अधिकारी, अधीनस्थ कृषि सेवा और दूसरी सीधी भर्तियों को लेकर भी शिकायतें और विवाद सामने आए थे. 2017 में सरकार द्वारा सीबीआई को भेजे गए जांच संदर्भ में 2012 से 2017 के बीच घोषित परिणामों वाली विभिन्न परीक्षाओं को व्यापक जांच के दायरे में रखा गया था.

सीबीआई जांच में सिर्फ आरोप नहीं

2018 में सीबीआई ने यूपीपीएससी की 2012 से 2017 के बीच हुई नियुक्तियों में कथित अनियमितताओं को लेकर एफआईआर दर्ज की. सीबीआई की एफआईआर में आरोप था कि मॉडरेशन के जरिए कुछ अभ्यर्थियों के नंबर बढ़ाए गए जिससे कुछ ऐसे अभ्यर्थी इंटरव्यू के लिए योग्य हो गए जो अन्यथा नहीं होते और कुछ योग्य अभ्यर्थी बाहर हो गए.एफआईआर में उत्तर पुस्तिकाओं की पहचान संभव होने और मॉडरेशन में कथित तौर पर मनमाने तरीके से नंबर बदलने जैसी बातों का भी उल्लेख किया गया था. सीबीआई ने इन आरोपों को लेकर आपराधिक धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था यानी यह सिर्फ राजनीतिक बयान नहीं था कि जांच होगी.सीबीआई ने वास्तव में मामले में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की थी लेकिन किसी एफआईआर में दर्ज आरोप और अदालत में अंतिम रूप से साबित अपराध एक ही बात नहीं होते.

सहकारिता विभाग की भर्तियां भी जांच के घेरे में 

अखिलेश सरकार के कार्यकाल से जुड़ा एक और बड़ा मामला सहकारिता विभाग की भर्तियों का था. 2012 से 2017 के बीच सहकारिता विभाग और उससे जुड़ी संस्थाओं में 2324 पदों पर भर्ती हुई थी.बाद की जांच में इन भर्तियों में योग्यता के नियमों में बदलाव और ओएमआर शीट से छेड़छाड़ जैसी अनियमितताओं की शिकायतें सामने आईं. मामले में एसआईटी ने जांच की और मई 2021 में सात मुकदमे दर्ज किए गए.इस मामले को लेकर भी भर्ती प्रक्रिया में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के आरोप लगे थे.

पुलिस दरोगा भर्ती में पेपर लीक के आरोप, परीक्षा रद्द

अब बात उस भर्ती की जो अखिलेश सरकार के बाद हुई थी लेकिन उसी बहस में अक्सर उदाहरण के तौर पर सामने आती है.यूपी पुलिस सब-इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा-2017 में पेपर लीक की शिकायतों के बाद ऑनलाइन परीक्षा रद्द करनी पड़ी थी. उस समय 2709 सब-इंस्पेक्टर पदों के लिए परीक्षा कराई जा रही थी.जांच में ऑनलाइन परीक्षा में पेपर लीक और सॉल्वर गैंग से जुड़ी गतिविधियों के आरोप सामने आए यानी पेपर लीक का मुद्दा केवल 2017 से पहले की सरकारों तक सीमित नहीं है. इसी तथ्य को अखिलेश यादव अपनी राजनीति में उठाते रहे हैं और मौजूदा सरकार के दौर के पेपर लीक मामलों को लेकर योगी सरकार पर हमला करते हैं.

मार्च 2015 में पीसीएस पेपर लीक का मामला

अखिलेश सरकार के कार्यकाल में मार्च 2015 की यूपीपीएससी पीसीएस प्रारंभिक परीक्षा को लेकर पेपर लीक का मामला सामने आया था.पेपर सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप के जरिए लीक होने की शिकायतों के बाद परीक्षा रद्द करनी पड़ी थी.यह मामला उस दौर की परीक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर सवालों में शामिल था.यही वजह है कि 2017 के बाद जब भर्ती व्यवस्था की समीक्षा और जांच की बात हुई तो पेपर लीक, उत्तर पुस्तिका बदलने, इंटरव्यू नंबरों और मॉडरेशन समेत कई मुद्दे एक साथ चर्चा में आए.

स्वास्थ्य विभाग की भर्ती का मामला 

स्वास्थ्य विभाग में 2016 में हुई एक्सरे टेक्नीशियन भर्ती को लेकर भी बाद के वर्षों में गंभीर गड़बड़ियां सामने आईं. 403 पदों की भर्ती में एक ही नाम और जन्मतिथि से जुड़े कई लोगों के अलग-अलग जिलों में नौकरी करने का मामला सामने आया.बाद की जांच में एक जैसे व्यक्तिगत विवरण के आधार पर छह लोगों के अलग-अलग जिलों में नौकरी करने और वेतन लेने की बात सामने आई.यह मामला खास तौर पर इसलिए अहम है क्योंकि भर्ती 2016 में हुई थी, लेकिन गड़बड़ी का पता काफी बाद में डिजिटल रिकॉर्ड की जांच के दौरान चला.



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