देवभूमि में सीमाओं के रक्षक ‘हरू-सैम देवता’ कैसे दिलाते हैं पीड़ितों को न्याय?
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Haru Devta Kumaon History: देवभूमि उत्तराखंड में सीमाओं के रक्षक माने जाने वाले ‘हरू-सैम देवता’ की न्याय प्रणाली आज भी अनूठी और गहरी आस्था का केंद्र है. स्थानीय लोग अपनी समस्याओं और अन्याय के निवारण के लिए इन लोक देवताओं की शरण में जाते हैं. माना जाता है कि हारू-सैम देवता न केवल पीड़ितों को निष्पक्ष न्याय दिलाते हैं, बल्कि अपने भक्तों के जीवन में रक्षक की भूमिका निभाते हुए घर में सुख-समृद्धि और शांति भी लेकर आते हैं.
Haru Sem Devta Uttarakhand: देवभूमि उत्तराखंड की धरा पर लोक-संस्कृति में देवी-देवताओं का वास है इसलिए इस पवित्र स्थल को ‘देवभूमि’ (देवताओं की भूमि) कहा जाता है. उत्तराखंड में बड़ी संख्या में देवी-देवताओं के मंदिर, पावन तीर्थ और धाम स्थित होने के कारण इसे देवभूमि कहा जाता है. कुमाऊं मंडल की इसी लोक-आस्था के सबसे बड़े आधार हैं, न्याय और समृद्धि के प्रतीक ‘श्री हरु-सैम देवता’. लोक कथाओं के अनुसार, हरु देवता और सैम देवता को न्याय, सत्य और लोक कल्याण का प्रतीक माना जाता है. यहां बड़े-बड़े लोग आशीर्वाद प्राप्त करने आते हैं. मान्यता है कि यहां दर्शन करने मात्र से सभी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं. आइए जानते हैं कि उत्तराखंड की लोक आस्था के रक्षक हरु-सैम देवता हैं…
हरु और सैम दोनों भाई
अल्मोड़ा के जागेश्वर के पास स्थित झंकार सैम मंदिर में सैम देवता की पूजा स्वयंभू शिवलिंग के रूप में की जाती है. कुमाऊं की लोक परंपरा में हरु और सैम दोनों भाई हैं और इनके मंदिर हमेशा एक-साथ स्थापित होते हैं. इनके बारे में यह लोकोक्ति बहुत प्रसिद्ध है, ‘हरु आए हरियाली लाए, हरु जाए सब कुछ नष्ट हो जाए.’
गांवों की सीमाओं का रक्षक देवता
लोक गाथाओं और ‘जागरों’ (उत्तराखंड के पारंपरिक धार्मिक गीत) के अनुसार, इन्हें चम्पावत का राजा या राजकुमार (राजा हरिश्चंद्र का रूप) माना जाता है. वे एक अत्यंत सात्विक, न्यायप्रिय और सिद्ध पुरुष थे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन दीन-दुखियों की सेवा में समर्पित कर दिया था. इन्हें भगवान शिव का अंशावतार या स्वयंभू रूप माना जाता है. लोक मान्यताओं में इन्हें देवताओं का गुरु और कुछ परंपराओं में देवताओं का ‘मामा’ (मामू) भी कहा जाता है. इन दोनों को समृद्धि, सुख-शांति और गांवों की सीमाओं का रक्षक देवता माना जाता है.
मंदिर में विशेष अनुष्ठान
हरु देवता को पूरी तरह सात्विक माना जाता है, इसलिए यहां मुख्य रूप से फल-फूल, मेवा, मिष्ठान्न और पारंपरिक कुमाऊंनी ‘रोट’ (मीठी पूड़ी) का भोग लगाया जाता है. नवरात्रि, पौष महीने की वैसी (धुनी जागृत करना), डंगरिया परंपरा (देव डांगुर) समेत कई त्योहार पर इस मंदिर में विशेष अनुष्ठान देखने को मिलता है.
हरु-सैमज्यू के दरबार में पवित्र धुनी
नवरात्रि के पर्व पर यहां बेहद भव्य पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है. उत्तराखंड के मुख्यमंत्री समेत कई बड़ी हस्तियां और दूर-दूर से हजारों श्रद्धालु यहां शीश नवाने आते हैं जबकि पौष (पूस) के महीने में यहां विशेष ‘बैसी’ (धार्मिक व्रत और अनुष्ठान) का आयोजन होता है. इस दौरान गुरु गोरखनाथ और हरु-सैमज्यू के दरबार में पवित्र धुनी जागृत की जाती है.
पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप पर नृत्य
कुमाऊं संस्कृति के अनुसार, विशेष अवसरों पर देवताओं के ‘डंगरिया’ (वे व्यक्ति जिनके शरीर में देवता अवतरित होते हैं) पारंपरिक वाद्य यंत्रों (ढोल-दमोह) की थाप पर नृत्य करते हैं और भक्तों के कष्टों को दूर करने का आशीर्वाद देते हैं.