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Hyderabad Dargah Shah Khamosh: हैदराबाद की दरगाह हज़रत सैयद शाह खामोश का ऐतिहासिक जन्नती दरवाजा साल में सिर्फ एक बार मुहर्रम की 5 तारीख को अकीदतमंदों के लिए खोला जाता है. इस मुकद्दस आस्ताने पर देश भर से ज़ायरीन पहुंचते हैं.
हैदराबाद: हैदराबाद के पुराने शहर की तंग गलियों में बसी दरगाह हज़रत सैयद शाह खामोश रहमतुल्लाह अलैह न केवल रूहानी सुकून का मरकज़ है बल्कि दक्कन की साझी विरासत की पहचान भी है. इस ऐतिहासिक आस्ताने की सबसे बड़ी खासियत यहां मौजूद जन्नती दरवाज़ा है, जो पूरे साल बंद रहता है और सिर्फ मुहर्रम-उल-हराम की 5 तारीख को रवायती रसूमात के तहत अकीदतमंदों की ज़ियारत के लिए खोला जाता है.
दरगाह परिसर में स्थित इस मुकद्दस दरवाज़े की निस्बत सिलसिला-ए-चिश्तिया के अजीम सूफी बुजुर्ग हज़रत बाबा फरीदुद्दीन गंज-ए-शकर रहमतुल्लाह अलैह से मानी जाती है. इतिहासकारों और दरगाह के जानकारों के मुताबिक, हज़रत शाह खामोश के चिश्तिया सिलसिले से गहरे ताल्लुक और आला रूहानी मकाम की बदौलत यह रिवायत सदियों से यहां कायम है. अकीदतमंदों का दृढ़ विश्वास है कि इस पवित्र चौखट से गुज़रना गुनाहों से तौबा, मग़फ़िरत और रूहानी सुकून का जरिया बनता है.
मुहर्रम की 5 तारीख को होने वाली यह रस्म खास
मुहर्रम की 5 तारीख को होने वाली यह रस्म बेहद खास होती है. तय रिवायत के अनुसार, दरगाह के सज्जादानशीन और मुतवल्लियों की मौजूदगी में कुरान ख्वानी, दरूद-ओ-सलाम और मुल्क में अमन-चैन की विशेष दुआओं के बाद यह दरवाज़ा खोला जाता है. इस मुकद्दस पल के दीदार और दरवाज़े से गुज़रने के लिए तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र सहित देश भर से ज़ायरीन पहुंचते हैं जिनका तांता देर रात तक लगा रहता है.
हैदराबाद के रूहानी और सांस्कृतिक ताने-बाने
पुरानी हवेली के करीब स्थित यह आस्ताना हमेशा से गंगा-जमुनी तहज़ीब का बड़ा केंद्र रहा है. इस मौके पर मजहब और संप्रदाय की दीवारें टूटती नज़र आती हैं और हर तबके के लोग यहां मन्नतें मांगने व चादर पेश करने आते हैं. भीड़ और अकीदतमंदों की सहूलियत के लिए दरगाह कमेटी व स्थानीय प्रशासन की ओर से सुरक्षा, अलग कतारों और बुनियादी सुविधाओं के पुख्ता बंदोबस्त किए जाते हैं. सदियों पुरानी यह रिवायत आज भी हैदराबाद के रूहानी और सांस्कृतिक ताने-बाने को मजबूती दे रही है.