12 साल में 49.6 करोड़ लोग गरीबी से बाहर, फिर भी 57% गरीब यूपी से बंगाल तक, वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट में क्या-क्या?

12 साल में 49.6 करोड़ लोग गरीबी से बाहर, फिर भी 57% गरीब यूपी से बंगाल तक, वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट में क्या-क्या?


India Poverty Report 2026: भारत में गरीबी को लेकर वर्ल्ड बैंक की नई रिपोर्ट आई है. जो साफ साफ बता रही क‍ि पिछले 12 साल में देश में गरीबी तेजी से घटी है. चरम गरीबी में रहने वाली आबादी का अनुपात 27.1% से घटकर 2.6% रह गया है. वहीं, करीब 49.6 करोड़ लोग उस गरीबी के दायरे से बाहर आए हैं, जिसे वर्ल्ड बैंक निम्न-मध्यम आय वाले देशों के लिए 4.20 डॉलर प्रतिदिन के मानक से मापता है. वर्ल्ड बैंक ने इसे दुनिया में गरीबी घटने की सबसे तेज रफ्तार वाले उदाहरणों में से एक बताया है. लेकिन इस अच्छी खबर के बीच कुछ चिंताएं भी हैं. देश के 57% गरीब उत्तर प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक फैले इलाके में रहते हैं. रोजगार बढ़ा है, लेकिन लोगों की वास्तविक कमाई में खास इजाफा नहीं हुआ. युवाओं में बेरोजगारी भी बढ़ी है.

वर्ल्‍ड बैंक की र‍िपोर्ट में और क्‍या-क्‍या?

12 साल में कितनी घटी गरीबी?

  • वर्ल्ड बैंक की अक्टूबर 2026 की Poverty and Equity Brief के मुताबिक, भारत में 2011-12 से 2023-24 के बीच गरीबी में बड़ी कमी दर्ज की गई है. इसे समझने के लिए गरीबी के दो अलग-अलग पैमाने देखना जरूरी है. पहला है चरम गरीबी यानी एक्सट्रीम पॉवर्टी. वर्ल्ड बैंक ने इसे प्रतिदिन 3 डॉलर यानी 2021 की क्रय शक्ति के हिसाब से करीब 58 रुपये से कम खर्च करने वाले व्यक्ति के रूप में मापा है. इस मानक पर भारत में गरीबी का अनुपात 2011-12 के 27.1% से घटकर 2023-24 में 2.6% रह गया.
  • दूसरा पैमाना निम्न-मध्यम आय वाले देशों के लिए 4.20 डॉलर प्रतिदिन का है. यह 2021 की क्रय शक्ति के हिसाब से करीब 82 रुपये के बराबर है. इस मानक पर गरीबी का अनुपात 57.7% से घटकर 16.1% रह गया. इस बदलाव के कारण अनुमानित 49.6 करोड़ लोग इस गरीबी रेखा से ऊपर आए.
  • यानी 49.6 करोड़ लोगों को चरम गरीबी से बाहर आने वाला आंकड़ा समझना सही नहीं होगा. यह 4.20 डॉलर वाली गरीबी रेखा के आधार पर निकाला गया आंकड़ा है. वहीं, 3 डॉलर के मानक पर भी भारत ने बड़ी प्रगति की है.

गरीबी घटने की वजह क्या रही?

  1. लोगों की खपत बढ़ना: परिवारों ने खाने-पीने और दूसरी जरूरतों पर पहले के मुकाबले ज्यादा खर्च किया. इससे उनके जीवन स्तर में सुधार हुआ.
  2. रोजगार में बढ़ोतरी: 2017 से 2023 के बीच भारत में रोजगार पाने वाले लोगों की संख्या करीब 13.4 करोड़ बढ़ी. यह इसी अवधि में कामकाजी उम्र की आबादी में हुई बढ़ोतरी से लगभग दोगुनी थी. इसमें ग्रामीण महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का अहम योगदान रहा.
  3. सरकारी योजनाएं: राशन और खाद्य सब्सिडी जैसी योजनाओं से गरीब परिवारों को मदद मिली. जब परिवारों को मुफ्त या सब्सिडी वाला अनाज मिला, तो उनके पास दूसरी जरूरतों पर खर्च करने के लिए कुछ और रकम बची. वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, इन तीनों वजहों ने मिलकर गरीबी कम करने में भूमिका निभाई.

3. यूपी से बंगाल तक देश के 57% गरीब क्यों?

वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, देश की गरीब आबादी का करीब 57% हिस्सा उत्तर प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक फैले एक लगातार भौगोलिक क्षेत्र में रहता है. इसका मतलब है कि गरीबी अब पूरे देश में पहले की तरह समान रूप से फैली हुई नहीं है. कुछ राज्यों और इलाकों में इसकी समस्या ज्यादा सघन है. इन क्षेत्रों में रोजगार के बेहतर अवसर, सड़क, परिवहन, शिक्षा और दूसरी बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करना जरूरी होगा.

ग्रामीण और शहरी भारत के बीच भी अंतर बना हुआ है. 4.20 डॉलर प्रतिदिन वाली गरीबी रेखा के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में गरीबी का अनुपात 19.3% है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 8.6% है. यानी गांवों में गरीबी की दर शहरों के मुकाबले दोगुने से भी ज्यादा है.

4. गरीबी घटी, लेकिन अमीर और गरीब की कमाई में कितना अंतर?

वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट में सबसे अहम चिंता कमाई के अंतर को लेकर है. देश में रोजगार तो बढ़ा है, लेकिन लोगों की वास्तविक कमाई में उसी अनुपात में बढ़ोतरी नहीं हुई. रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 में सबसे ज्यादा कमाई करने वाले 10% कर्मचारियों की औसत मध्य कमाई सबसे कम कमाई करने वाले 10% कर्मचारियों से करीब 13 गुना ज्यादा थी.

इसका मतलब है कि देश में आर्थिक प्रगति का फायदा सभी लोगों तक एक समान नहीं पहुंच रहा. इसके अलावा रोजगार बढ़ने का बड़ा हिस्सा कम उत्पादकता वाले कामों से आया है. ऐसे कामों में रोजगार तो मिलता है, लेकिन आमदनी तेजी से बढ़ने की संभावना सीमित रहती है. यही वजह है कि वर्ल्ड बैंक ने रोजगार की संख्या के साथ उसकी गुणवत्ता और वास्तविक वेतन में बढ़ोतरी को भी जरूरी बताया है.

5. युवाओं के लिए चिंता की बात, बेरोजगारी बढ़ी

  • रिपोर्ट में युवाओं के रोजगार को लेकर भी चिंता जताई गई है. वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही में युवा बेरोजगारी दर 14.6% थी, जो वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में बढ़कर 15.9% हो गई.
  • इस बढ़ोतरी का असर खासकर ग्रामीण युवा महिलाओं पर ज्यादा दिखाई दिया है. यानी एक ओर ग्रामीण महिलाओं की रोजगार में भागीदारी बढ़ी है, तो दूसरी ओर युवा महिलाओं के बीच बेरोजगारी की चुनौती भी बनी हुई है.
  • शिक्षा का भी गरीबी से सीधा संबंध दिखाई देता है. जिन वयस्कों ने कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली, उनमें गरीबी की दर 21.3% थी. वहीं, उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों में यह दर सिर्फ 7.4% रही. बच्चों की स्थिति भी चिंता बढ़ाती है. 0 से 14 साल के बच्चों में गरीबी की दर 21.8% दर्ज की गई.

6. सिर्फ पैसा नहीं, बुनियादी सुविधाओं की कमी भी बड़ी चुनौती

गरीबी का मतलब सिर्फ इतना नहीं है कि किसी व्यक्ति की रोजाना कमाई कितनी है. उसके पास साफ-सफाई, शिक्षा, पीने का पानी और दूसरी जरूरी सुविधाएं हैं या नहीं, यह भी महत्वपूर्ण है. वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, भारत में 29.6% आबादी के पास निर्धारित बुनियादी स्तर की स्वच्छता सुविधाओं का अभाव है. वहीं, 13.8% आबादी ऐसे घरों में रहती है, जहां किसी भी वयस्क ने प्राथमिक शिक्षा पूरी नहीं की है.

ऑक्सफोर्ड पावर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव के बहुआयामी गरीबी सूचकांक के अनुसार, 2005-06 में गरीबी का स्तर 53.8% था, जो 2019-21 में घटकर 16.4% रह गया. वर्ल्ड बैंक का अपना बहुआयामी गरीबी माप 2022-23 में 15.5% रहा. ये अलग-अलग अवधि और माप पद्धति के आंकड़े हैं.

7. आगे और कितनी घटेगी गरीबी?

वर्ल्ड बैंक का अनुमान है कि भारत में गरीबी का स्तर आने वाले वर्षों में भी नीचे जा सकता है, लेकिन इसकी रफ्तार धीमी रहने की आशंका है. 4.20 डॉलर प्रतिदिन वाली गरीबी रेखा पर गरीबी का अनुपात 2026 में अनुमानित 14.2% से घटकर 2028 तक 12.1% हो सकता है. हालांकि, यह पक्का आंकड़ा नहीं है. यह माइक्रोसिमुलेशन मॉडल पर आधारित अनुमान है, जिसमें रोजगार और आर्थिक परिस्थितियों में बदलाव होने पर संशोधन हो सकता है. वर्ल्ड बैंक ने यह भी चेतावनी दी है कि गरीबी के हालिया आंकड़ों में जीवन स्तर में वास्तविक सुधार के साथ-साथ सर्वे और मापन के तरीकों में बदलाव का भी कुछ असर हो सकता है.



Source link