Nainital Snowfall: नैनीताल, मुक्तेश्वर और मसूरी में इस बार नहीं गिरेगी बर्फ? आखिर क्यों गर्म हो रही हैं पहाड़ों की सर्दियां, मौसम वैज्ञानिक से जानें

Nainital Snowfall: नैनीताल, मुक्तेश्वर और मसूरी में इस बार नहीं गिरेगी बर्फ? आखिर क्यों गर्म हो रही हैं पहाड़ों की सर्दियां, मौसम वैज्ञानिक से जानें


नैनीताल: उत्तराखंड के पहाड़ों में सर्दियों के दौरान बर्फबारी का इंतजार कर रहे पर्यटकों को इस बार निराशा हाथ लग सकती है. नैनीताल, मुक्तेश्वर और मसूरी जैसे लोकप्रिय हिल स्टेशनों पर हिमपात की संभावनाओं को लेकर चिंता बढ़ गई है. प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति मजबूत होने और पर्वतीय क्षेत्रों में तापमान सामान्य से ऊपर रहने के बीच इस बार सर्दियों में मौसम का मिजाज प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है. यदि पश्चिमी विक्षोभ कमजोर रहे और पर्याप्त नमी के साथ पहाड़ों तक नहीं पहुंचें, तो बारिश और बर्फबारी दोनों पर असर पड़ सकता है. हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि नैनीताल और आसपास के क्षेत्रों में इस बार बिल्कुल बर्फबारी नहीं होगी.

आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (एरीज), नैनीताल के वरिष्ठ पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. नरेंद्र सिंह के मुताबिक, प्रशांत महासागर के तापमान में बदलाव का असर वैश्विक मौसम प्रणालियों पर पड़ सकता है. अल नीनो की स्थिति मजबूत होने पर उत्तर भारत में सर्दियों के तापमान और पश्चिमी विक्षोभों की गतिविधियों में बदलाव की आशंका रहती है. ऐसे में यदि सर्दियों के दौरान पश्चिमी विक्षोभ कमजोर रहे, तो पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फबारी की संभावनाएं भी प्रभावित हो सकती हैं. उपलब्ध रिपोर्टों में प्रशांत महासागर के नीनो क्षेत्र के तापमान में सामान्य से काफी अधिक वृद्धि का उल्लेख किया गया है. हालांकि, अल नीनो की वास्तविक तीव्रता और सर्दियों पर इसके प्रभाव का आकलन संबंधित वैज्ञानिक एजेंसियों के नवीनतम आंकड़ों और पूर्वानुमानों के आधार पर किया जाना जरूरी है.

ऊंची चोटियों पर हिमपात, निचले पहाड़ रह सकते हैं वंचित

डॉ. नरेंद्र सिंह के अनुसार, हिमालय की अधिक ऊंचाई वाली चोटियों पर बर्फबारी की संभावना बनी रह सकती है, लेकिन कम ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों में हिमपात कमजोर रहने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता. करीब 2,000 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी बर्फबारी के स्वरूप में बदलाव महसूस किया जा रहा है. नैनीताल में भी बीते वर्षों के दौरान भारी बर्फबारी की घटनाएं अपेक्षाकृत कम देखने को मिली हैं. कभी शहर में दो से तीन फीट तक बर्फ जमने के नजारे आम चर्चा का हिस्सा हुआ करते थे, लेकिन अब बर्फबारी कई बार ऊंची चोटियों तक सीमित रह जाती है. निचले इलाकों में बर्फ गिरने पर भी तापमान अधिक रहने के कारण वह जल्दी पिघल सकती है.

नैनीताल, मुक्तेश्वर से धनोल्टी तक पर्यटकों की उम्मीदें

नैनीताल निवासी मौसम के जानकार रमेश चंद्रा बताते हैं कि उत्तराखंड में नैनीताल, मुक्तेश्वर, किलबरी, रामगढ़, चकराता, चौकोड़ी और धनोल्टी ऐसे प्रमुख पर्यटन स्थल हैं, जहां सर्दियों में बर्फबारी देखने के लिए बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं. बर्फ से ढकी पहाड़ियों, देवदार के जंगलों और सफेद चादर ओढ़े रास्तों का नजारा इन क्षेत्रों की पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा देता है. ऐसे में यदि इस बार हिमपात कम होता है, तो बर्फबारी की उम्मीद लेकर आने वाले पर्यटकों की योजनाओं पर असर पड़ सकता है. हालांकि, पर्यटन कारोबार पर इसका कितना प्रभाव पड़ेगा, यह वास्तविक मौसम परिस्थितियों और बर्फबारी की स्थिति पर निर्भर करेगा.

दिसंबर-जनवरी की बर्फबारी क्यों है खास?

रमेश चंद्रा के मुताबिक, दिसंबर और जनवरी में होने वाली बर्फबारी पर्यावरण और जल संसाधनों के लिहाज से विशेष महत्व रखती है. इन महीनों में तापमान कम रहने से बर्फ लंबे समय तक टिक सकती है. धीरे-धीरे पिघलने वाली बर्फ मिट्टी में नमी बनाए रखने और प्राकृतिक जलस्रोतों को रिचार्ज करने में मदद कर सकती है, जिससे गर्मियों में पानी की उपलब्धता को सहारा मिलता है. इसके विपरीत, तापमान अधिक रहने पर बर्फ जल्दी पिघल सकती है. ऐसे में हिमपात की मात्रा के साथ-साथ उसके समय और बर्फ के टिके रहने की अवधि का भी महत्व बढ़ जाता है.

खेती और जलस्रोतों पर भी पड़ सकता है असर

अल नीनो का संभावित प्रभाव केवल पर्यटन तक सीमित नहीं है. सर्दियों में पर्याप्त बारिश और बर्फबारी नहीं होने पर पर्वतीय जलस्रोतों, खेती और मिट्टी की नमी पर दबाव बढ़ सकता है. मैदानी क्षेत्रों में भी रबी की फसलों, विशेषकर गेहूं, के लिए तापमान और वर्षा की स्थिति महत्वपूर्ण रहेगी. फिलहाल नैनीताल और आसपास के पर्वतीय क्षेत्रों में इस सर्दी की बर्फबारी को लेकर अंतिम तस्वीर स्पष्ट नहीं है. आने वाले महीनों में पश्चिमी विक्षोभों की सक्रियता, तापमान और नमी की उपलब्धता निर्णायक भूमिका निभाएगी. ऐसे में वैज्ञानिकों की निगरानी और मौसम एजेंसियों के नियमित पूर्वानुमान पर नजर रखना जरूरी होगा.



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