जमापूंजी से लेकर पेंशन तक कला के नाम, मिलिए 80 वर्षीय रिटायर्ड प्रोफेसर सुभाष सरपोल से जिन्होंने 45 साल में जुटाईं नायाब कलाकृतियां

जमापूंजी से लेकर पेंशन तक कला के नाम, मिलिए 80 वर्षीय रिटायर्ड प्रोफेसर सुभाष सरपोल से जिन्होंने 45 साल में जुटाईं नायाब कलाकृतियां


अंबाला: कहते हैं कि कला को देखने और उसे जीने में बहुत फर्क होता है. कोई खूबसूरत मूर्ति देखकर आगे बढ़ जाता है, तो कोई उसकी बारीक कारीगरी, कल्पना और इतिहास में छिपी पूरी दुनिया तलाशने लगता है. दरअसल, कुछ ऐसा ही जुनून कैंट निवासी 80 वर्षीय रिटायर्ड प्रोफेसर सुभाष सरपोल को है. उन्होंने अपने इस शौक को महज संग्रह तक सीमित नहीं रखा, बल्कि जिंदगी के 45 साल और अपनी पूरी जमापूंजी इस कला को समर्पित कर दी. आज उनके दो मंजिला मकान के करीब 30 कमरों में 300 से ज्यादा छोटी-बड़ी मूर्तियां, नायाब कलाकृतियां और एंटीक फर्नीचर मौजूद हैं. खास बात यह है कि इनमें से कई कलाकृतियां इतनी विशाल हैं कि उन्हें घर के अंदर रखने के लिए दरवाजे और कमरों की चौखट तक तुड़वानी पड़ी.

45 साल का जुनून, जमापूंजी और पेंशन तक कला पर की खर्च

सुभाष सरपोल जीएमएन कॉलेज से एमए इंग्लिश लिटरेचर के प्रोफेसर पद से रिटायर हुए हैं. उन्होंने बताया कि पिछले करीब 45 वर्षों से वह इस शौक को पूरा कर रहे हैं. शुरुआत में कला के प्रति लगाव धीरे-धीरे उनके जीवन का सबसे बड़ा जुनून बन गया. उन्होंने अपनी जमापूंजी के साथ-साथ पेंशन का बड़ा हिस्सा भी कलाकृतियां बनवाने और खरीदने में लगा दिया. उनका कहना है कि आज तक उन्हें खुद भी अंदाजा नहीं है कि इस शौक पर कुल कितना पैसा खर्च हो चुका है. परिवार के लोग कई बार उन्हें पैसे बर्बाद करने की बात कहकर समझाते थे, लेकिन पत्नी, माता-पिता और बहन के समझाने के बावजूद उन्होंने अपना शौक जारी रखा.

300 से ज्यादा मूर्तियां और एंटीक फर्नीचर से सजा है पूरा घर

उनके संग्रह में भगवान गणेश, माता लक्ष्मी और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियों के साथ-साथ ऐतिहासिक व्यक्तित्वों की आकृतियां, दीवारों पर लगाने वाली एंटीक कलाकृतियां, खूबसूरत बेड, अलमारियां और पुराने समय की याद दिलाने वाला फर्नीचर शामिल है. कई लकड़ी के ढांचों पर देवी-देवताओं और ऐतिहासिक लोगों की तस्वीरें तथा आकृतियां बेहद बारीकी से उकेरी गई हैं.

सुभाष सरपोल खुद डिजाइन तैयार करवाते हैं और फिर कारीगरों को अपनी कल्पना के अनुसार उन्हें आकार देने के लिए कहते हैं. इसके लिए देश के अलग-अलग राज्यों से विशेष प्रकार की कीमती लकड़ी मंगवाई जाती है. उनका कहना है कि यह फर्नीचर पुराने राजा-महाराजाओं के दौर की सभ्यता और संस्कृति की झलक दिखाता है.

10 फीट ऊंची मूर्तियां, 15 फीट की कलाकृतियां; चौखट तक तुड़वानी पड़ी

सुभाष सरपोल के घर में 4 से लेकर 10 फीट तक ऊंची मूर्तियां मौजूद हैं, जबकि दीवारों पर 15-15 फीट तक की कलाकृतियां लगी हुई हैं. इनमें से ज्यादातर वस्तुएं कारीगरों ने हाथों से तैयार की हैं. खास बात यह है कि वह केवल कलाकृतियां बनवाकर संतुष्ट नहीं होते, बल्कि कई मूर्तियों पर खुद भी पॉलिश करके उन्हें अंतिम रूप देते हैं.

कुछ विशाल मूर्तियों को घर में स्थापित करने के लिए कमरों के दरवाजे और चौखटें तक तोड़नी पड़ीं. इसके अलावा उनके पास करीब 100 साल पुराना एंटीक म्यूजिक सिस्टम यानी सीडी प्लेयर वाला टेप रिकॉर्डर भी है. घर के बाहर करीब 30 साल पुराना चेतक स्कूटर भी उनके पुराने शौक और संग्रह का हिस्सा है.

विदेश से आए लोग भी देखकर रह गए हैरान, करोड़ों में हो सकती है कलाकृतियों की कीमत

लोकल 18 को ज्यादा जानकारी देते हुए सुभाष सरपोल ने बताया कि एक बार फ्रांस, इटली और कनाडा से कुछ लोग उनके घर आए थे. यहां मौजूद कलाकृतियों और लकड़ी पर की गई बारीक नक्काशी को देखकर वे भी हैरान रह गए. उनका दावा है कि विदेशों में ऐसी कलाकृतियों की कीमत करोड़ों से लेकर अरबों रुपये तक आंकी जा सकती है. हालांकि, उनके लिए इन वस्तुओं का महत्व केवल पैसों से नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत, लगाव और कला से जुड़ी भावनाओं से है.

30 कमरों में भी कम पड़ने लगी जगह, अब लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं अपना संग्रह

वहीं, अब सुभाष सरपोल अपने दो मंजिला मकान में पत्नी और बच्चों से अलग अकेले रहते हैं. उनका कहना है कि अब घर के 30 कमरों में भी कलाकृतियों के लिए जगह कम पड़ने लगी है, लेकिन कला के प्रति उनका जुनून कम नहीं हुआ है.

फिलहाल उनका यह निजी संग्रह आम लोगों के लिए खुला नहीं है, जिसके कारण इतनी अनोखी कलाकृतियां सार्वजनिक प्रदर्शन और बड़े दर्शक वर्ग की नजरों से दूर हैं. हालांकि, उनकी इच्छा है कि 45 वर्षों की मेहनत से तैयार यह अनमोल संग्रह लोगों तक पहुंचे और भारतीय कला, संस्कृति, कारीगरों के पारंपरिक हुनर तथा पुरानी सभ्यता को एक अलग पहचान मिले.



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