कॉर्बेट के जंगलों में क्यों कम नजर आ रहे मोर और जंगली मुर्गे? वैज्ञानिक जांच की उठी मांग

कॉर्बेट के जंगलों में क्यों कम नजर आ रहे मोर और जंगली मुर्गे? वैज्ञानिक जांच की उठी मांग


नैनीताल: बाघों की दहाड़ और वन्यजीव संरक्षण के लिए दुनियाभर में पहचान रखने वाले कॉर्बेट टाइगर रिजर्व और इसके लैंडस्केप से अब एक ऐसा सवाल उठ रहा है, जिसने वन्यजीव प्रेमियों, नेचर गाइड और पक्षी विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है. आखिर कॉर्बेट के जंगलों और तराई-भाबर क्षेत्र में नियमित रूप से दिखाई देने वाले मोर, जंगली मुर्गे और कलीज फीजेंट कहां चले गए? वन्यजीव प्रेमियों का दावा है कि पिछले आठ से नौ महीनों में इन पक्षियों की साइटिंग में कमी महसूस की जा रही है.

मामले में जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आवास में बदलाव, बढ़ते निर्माण और कीटनाशकों के इस्तेमाल जैसी संभावनाएं जताई जा रही हैं. हालांकि, अब तक किसी एक कारण की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है. मामला वन विभाग तक पहुंच गया है और विभाग ने जानकारी जुटाकर आगे शोध की संभावनाओं पर विचार करने की बात कही है.

कॉर्बेट का नाम आते ही सबसे पहले बाघ, हाथी और दूसरे बड़े वन्यजीवों की तस्वीर सामने आती है, लेकिन किसी जंगल की वास्तविक समृद्धि उसकी संपूर्ण जैव विविधता से तय होती है. मोर, रेड जंगल फाउल यानी जंगली मुर्गा और कलीज फीजेंट भी जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. वन्यजीव प्रेमियों के मुताबिक, ढिकाला, बिजरानी, ढेला, झिरना और फाटो जैसे पर्यटन क्षेत्रों में भी इन पक्षियों की मौजूदगी पहले की तुलना में कम महसूस हो रही है. हालांकि, पक्षियों का कम दिखाई देना और उनकी वास्तविक आबादी में गिरावट आना अलग-अलग स्थितियां हैं. ऐसे में स्थिति स्पष्ट करने के लिए नियमित सर्वेक्षण, वैज्ञानिक गणना और पुराने आंकड़ों से तुलना जरूरी है.

जलवायु परिवर्तन से लेकर बीमारी तक की आशंका

वन्यजीव विशेषज्ञ इमरान खान का कहना है कि पिछले आठ से नौ महीनों से मोर, जंगली मुर्गे और कलीज फीजेंट की साइटिंग में कमी महसूस की जा रही है. उनके मुताबिक, तराई-भाबर के अन्य क्षेत्रों और नेपाल तक से भी ऐसी जानकारी मिलने की बात सामने आई है. उन्होंने जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आवास में बदलाव और खेती की जमीनों पर बढ़ते निर्माण को संभावित कारण बताते हुए वैज्ञानिक जांच की जरूरत पर जोर दिया.

इमरान खान के अनुसार, मौसम में बदलाव से पौधों में फूल आने, बीज बनने और फल पकने का समय प्रभावित हो सकता है. वहीं, पक्षियों को किसी बीमारी या बर्ड फ्लू से प्रभावित होने की आशंका को भी जांच के दायरे में रखा जाना चाहिए. उन्होंने इको-सेंसिटिव जोन के नियमों को सख्ती से लागू करने और विकास परियोजनाओं में हरित क्षेत्रों को सुरक्षित रखने की आवश्यकता बताई. वरिष्ठ नेचर गाइड और पक्षी विशेषज्ञ राजेश भट्ट भी इस स्थिति को चिंताजनक मानते हैं. उनका कहना है कि खासकर मार्च-अप्रैल के बाद पिछले समर सीजन में ग्राउंड फॉरेजिंग बर्ड्स की साइटिंग की बारंबारता कम महसूस हुई. उन्होंने कहा कि भौगोलिक परिस्थितियों में बदलाव, मौसम या बीमारी के अलावा पक्षियों का दूसरे क्षेत्रों की ओर जाना भी एक संभावना हो सकती है. वास्तविक स्थिति का पता वैज्ञानिक अध्ययन से ही चलेगा.

रिसॉर्ट और निर्माण से प्रभावित हो सकता है प्राकृतिक आवास

वन्यजीव प्रेमी और नेचुरलिस्ट प्रशांत के मुताबिक, पहले खेतों, झाड़ियों और खुले प्राकृतिक क्षेत्रों में पक्षियों को अनाज, कीड़े-मकोड़े और भोजन के दूसरे स्रोत आसानी से मिल जाते थे. लेकिन कई जगह प्राकृतिक जमीनों पर रिसॉर्ट और व्यावसायिक निर्माण होने से उनके आवास और भोजन की उपलब्धता प्रभावित होने की आशंका है. उन्होंने पक्षी अवलोकन और प्रकृति आधारित पर्यटन को बढ़ावा देने की भी बात कही है. वहीं, वन्यजीव प्रेमी सुमंता घोष ने कीटनाशकों के अत्यधिक इस्तेमाल, शहरीकरण, घोंसले बनाने की जगहों में कमी और भोजन के स्रोतों में बदलाव को संभावित कारण बताया. उन्होंने गिद्धों की आबादी में गिरावट का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह वैज्ञानिक शोध से गिद्धों की मृत्यु में डाइक्लोफेनाक दवा की भूमिका सामने आई थी, उसी तरह इन पक्षियों की स्थिति समझने के लिए भी व्यवस्थित अध्ययन जरूरी है.

वन विभाग ने लिया संज्ञान, जुटाई जाएगी जानकारी

इस मामले में कॉर्बेट टाइगर रिजर्व की डिप्टी डायरेक्टर सिरिन पंडित ने बताया कि नेचुरलिस्ट की ओर से यह विषय विभाग के संज्ञान में लाया गया है. हालिया फील्ड निरीक्षण के दौरान उन्हें कलीज फीजेंट समेत कुछ पक्षियों की साइटिंग हुई है. उन्होंने यह भी कहा कि मानसून के बाद जंगल में अंडरग्रोथ यानी छोटी वनस्पतियों का घनत्व बढ़ने से पक्षियों को देख पाना मुश्किल हो सकता है. हालांकि, उन्होंने मामले को गंभीरता से लेकर उच्च अधिकारियों तक जानकारी पहुंचाने और जरूरत पड़ने पर शोध कराने की बात कही. वहीं तराई पश्चिमी वन प्रभाग के डीएफओ पुनीत तोमर के मुताबिक, नेचुरलिस्ट की ओर से साझा की गई जानकारी और वीडियो का संज्ञान लिया गया है. फील्ड स्टाफ से जानकारी और टिप्पणियां जुटाने के बाद उच्च स्तर पर शोध की सिफारिश की जाएगी. आवश्यकता के अनुसार संबंधित क्षेत्रों में अध्ययन कराने की दिशा में भी कदम उठाए जा सकते हैं.

बाघों के साथ छोटे वन्यजीवों की निगरानी भी जरूरी

कॉर्बेट की पहचान बाघ संरक्षण से जरूर है, लेकिन जंगल की सेहत का आकलन केवल बड़े वन्यजीवों की मौजूदगी से नहीं किया जा सकता. मोर, जंगली मुर्गे और कलीज फीजेंट की घटती साइटिंग ने जैव विविधता की निगरानी को लेकर नए सवाल खड़े किए हैं. अब वन विभाग की जांच और संभावित वैज्ञानिक अध्ययन से ही स्पष्ट हो सकेगा कि यह बदलाव मौसम, आवास, पक्षियों की गतिविधियों या किसी अन्य कारण से जुड़ा है.



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