फिनलैंड में गूगल ने अपना डेटा सेंटर बनाने के लिए दो जगहों पर अंदाजन 4 लाख पेड़ काट दिए. लेकिन पेड़ काटने से पहले जो जरूरी ‘पर्यावरणीय प्रभाव आकलन’ का प्रोसेस करना होता है, वो गूगल ने नहीं किया है. इस घटना क बाद फिनलैंड में, जहां ये पेड़ काटे गए, लोगों में गुस्सा साफ नजर आ रहा है. दरअसल AI धीरे-धीरे हमारे जीवन में इस तरह घुसता जा रहा है कि ये एक जरूरत बनता जा रहा है. लेकिन AI को काम करने के लिए जो इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए उसका खामियाजा हमारे पर्यावरण और आगे चलकर हमें चुकाना होगा.
मुहोस और ओतानमाकी से काटे गए पेड़
फिनलैंड के मुहोस में करीब 330 हेक्टेयर जंगल में लगभग 2.5 लाख पेड़ काटे गए. वहीं, पहली जगह से करीब 100 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में ओतानमाकी के पास 1.5 लाख और पेड़ काटे गए. ‘नेशनल हेराल्ड’ की रिपोर्ट में फिनिश एसोसिएशन फॉर नेचर कंजर्वेशन की इकोलॉजिस्ट मारी अन्नाला के हवाले से बताया गया है कि एक अनुमान के मुताबिक दोनों जगहों पर कुल करीब 4 लाख पेड़ काटे गए हैं. इस घटना के बाद फिनलैंड के लाइसेंसिंग एंड सुपरविजन अथॉरिटी ने दोनों जगहों पर काम अस्थायी रूप से रोकने का आदेश दिया. इसकी वजह यह थी कि कंपनी ने जरूरी पर्यावरणीय प्रभाव आकलन पूरा होने से पहले ही जमीन को पेड़ों से साफ कर दिया था. Google के फिनलैंड कंट्री मैनेजर एंटी जार्विनेन ने पिछले हफ्ते पेड़ों की कटाई के लिए माफी मांगी. उन्होंने कहा कि उस समय कंपनी ने कानून की अपनी समझ के आधार पर काम किया था.
13 अरब यूरो का निवेश, पर पर्यावरण का क्या?
दोनों जगहों पर डेटा सेंटर बनाने की योजना 13 अरब यूरो के निवेश का हिस्सा है. इसे फिनलैंड में अपनी तरह का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट बताया जा रहा है. ठंडी जलवायु, जमीन की उपलब्धता और जियोपॉलिटिकल स्थिरता को देखते हुए फिनलैंड, डेटा सेंटर बनाने वाली कंपनियों के लिए एक अहम जगह बनकर उभरा है. इस डेटा सेंटर की वजह से देश में आ रहा निवेश देश के लिए बड़ा मौका है. यहां प्रधानमंत्री पेटेरी ओर्पो का तर्क था कि डेटा आधारित अर्थव्यवस्था से सीधे निवेश के अलावा भी कई फायदे मिल सकते हैं. हालांकि, इस विवाद ने एक बार फिर बहस छेड़ दी है कि क्या डेटा सेंटर से मिलने वाला आर्थिक फायदा पर्यावरण को होने वाले नुकसान की भरपाई कर सकता है? साथ ही, यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या फिनलैंड के मौजूदा नियम डेटा सेंटर के तेजी से बढ़ते कारोबार पर निगरानी रखने के लिए पर्याप्त हैं.
AI डेटा सेंटर के क्यों कटते हैं पेड़?
आज तकनीक की जिस लग्जरी का हम इंजॉय कर रहे हैं, उसकी कीमत पर्यावरण का चुकानी पड़ रही है. AI डेटा सेंटर बनाने के लिए पेड़ इसलिए काटे जाते हैं, क्योंकि इन सेंटरों को बनाने के लिए बहुत बड़ी जमीन, इलेक्ट्रिसिटी और कूलिंग सिस्टम की जरूरत होती है. लाखों कंप्यूटर प्रोसेसर और सर्वर लगते हैं और बड़ी-बड़ी इमारतों में इन्हें रखा जाता है. इस पूरे सिस्टम को ही डेटा सेंटर कहते हैं. AI डेटा सेंटरों में बिजली की खपत बहुत ज्यादा होती है. इसलिए इनके पास बिजली पहुंचाने के लिए सबस्टेशन, ट्रांसमिशन लाइन और बाकी स्ट्रक्चर की जरूरत होती है. सिर्फ जमीन ही नहीं, इन डेटा सेंटरों के लिए हजारों गैलन पानी की भी जरूरत होती है. यही वजह है कि यह सेंटर पर्यावरण के लिए खतरनाक माने जा रहे हैं.
पर्यावरण को नुकसान और स्थानीय लोगों का विरोध
पेड़ों का कटना महज एक समस्या नहीं है. जब इतने पेड़ कटते हैं तो हजारों-लाखों जंगली जानवरों को अपने ठिकाने छोड़ने पड़ते हैं, पानी की गुणवत्ता बिगड़ती है और जंगल का पूरा का पूरा इको-सिस्टम नष्ट हो जाता है. ‘नेशनल हेराल्ड’ की रिपोर्ट बताती है कि मुहोस में रहने वाले लोगों का कहना है कि पेड़ों की कटाई के बाद साइट से बहकर आ रहा भूरा पानी एक ऐसी जलधारा में मिल रहा है, जो आगे जाकर औलुजोकि नदी में मिलती है. Google ने कहा है कि वह साइट पर पानी की गुणवत्ता को सुरक्षित रखने के लिए काम कर रहा है. ओतानमाकी में स्थानीय लोगों का कहना है कि जंगल साफ होने के बाद भेड़िए गांव के आसपास आने लगे हैं. पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों ने यह भी बताया कि जंगल में घोंसले बनाने वाले तीन पंजों वाले कठफोड़वे को अपना ठिकाना छोड़ना पड़ा है.
फिनिश एसोसिएशन फॉर नेचर कंजर्वेशन के बोर्ड की अध्यक्ष हाना हालमेनपा ने इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई पर हैरानी जताई. उन्होंने आरोप लगाया कि कंपनी ने ऐसी व्यवस्था का फायदा उठाया, जो कंपनियों पर भरोसे के आधार पर काम करती है. उन्होंने कहा, “यह पूरी तरह अहंकार है और हैरान करने वाला है.”
स्थानीय लोगों ने निर्माण कार्य के दौरान होने वाले शोर, इलाके के बुनियादी ढांचे पर बढ़ते दबाव और डेटा सेंटर बनने से घरेलू बिजली की कीमतों पर पड़ने वाले संभावित असर को लेकर भी चिंता जताई है. डेटा सेंटर पर सख्त नियम बनाने और पर्यावरण को होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए स्थानीय समुदायों को शुल्क देने की मांग वाली एक याचिका पर 93,000 से ज्यादा लोग हस्ताक्षर कर चुके हैं.
उम्मीद है कि यह विवाद फिनलैंड में अप्रैल में होने वाले अगले चुनाव का भी मुद्दा बनेगा. देश के सामने चुनौती यह है कि निवेश और रोजगार के अवसरों का फायदा उठाते हुए पर्यावरण की सुरक्षा कैसे की जाए. साथ ही, यह सवाल भी अहम है कि अंतरराष्ट्रीय कंपनियों की जरूरतों को पूरा करने वाले ऐसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट से स्थानीय लोगों को वास्तव में कितना फायदा मिल रहा है.