लखनऊ: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव हो और जैसे ही यहां की जातीय राजनीति की बात होती है तो लोगों के बीच में यादव, दलित, ब्राह्मण और राजपूत वोटों की काफी चर्चा होती है. लेकिन चुनाव का गणित बनाने में गैर यादव ओबीसी की भी बड़ी भूमिका है. कुर्मी, मौर्य, राजभर, निषाद, लोधी और प्रजापति जैसी जातियां कई सीटों पर नतीजे बदलने में सक्षम हैं. यही वजह है कि बीजेपी अपना दल, निषाद पार्टी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) जैसे सहयोगियों को अहम मानती है. दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी (सपा) अपने पीडीए फॉर्मूले के जरिए इन समुदायों को साथ लाने के लिए हर संभव कोशिश में जुटी है.
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सवाल है कि गैर यादव ओबीसी का समर्थन किसे मिलेगा? क्या बीजेपी अपना पुराना समीकरण मजबूत कर पाएगी या सपा का पीडीए फॉर्मूला उसे चुनौती देगा?
1. गैर यादव ओबीसी क्यों हैं इतने अहम?
उत्तर प्रदेश में ओबीसी आबादी करीब 52 फीसदी होने का अनुमान है. इसमें कई दर्जन जातियां शामिल हैं. करीब 9% यादव समुदाय को ओबीसी का एक बड़ा समूह माना जाता है. लेकिन बाकी गैर यादव ओबीसी जातियां भी मिलकर बड़ा वोट बैंक बनाती हैं. इसमें कुर्मी, राजभर, निषाद, पाल, प्रजापति, लोधी, मौर्य, गुर्जर, नाई, धोबी और लोनिया जैसी जातियां शामिल हैं.
बीजेपी की रणनीति इन समुदायों को अपने साथ जोड़ने की रही है. पार्टी का मकसद सिर्फ यादव वोटों का मुकाबला करना नहीं, बल्कि गैर यादव ओबीसी के बीच अपनी पकड़ मजबूत करना भी है.
2. सपा की कमजोरी को बीजेपी ने कैसे समझा?
समाजवादी पार्टी की पहचान लंबे समय से यादव समुदाय से जुड़ी रही है. खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश में यादव वोट पार्टी का मजबूत आधार माना जाता है. लेकिन दूसरे पिछड़े समुदायों के बीच प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल भी उठते रहे हैं. धारणा रही है कि सत्ता, टिकट और नौकरियों में यादवों को ज्यादा प्राथमिकता मिलती है. मौर्य, शाक्य, सैनी, कुर्मी, राजभर और निषाद जैसी जातियों को लगता है कि उन्हें उनकी आबादी के हिसाब से जगह नहीं मिलती.
बीजेपी ने इसी नाराजगी को अपने पक्ष में करने की कोशिश की. पार्टी ने इन समुदायों को राजनीतिक भागीदारी और सम्मान देने का संदेश दिया. 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद केशव प्रसाद मौर्य को उपमुख्यमंत्री बनाना भी इसी रणनीति के तौर पर देखा गया. इससे बीजेपी ने गैर यादव ओबीसी समुदायों के बीच नेतृत्व का भरोसा मजबूत करने की कोशिश की.
3. अपना दल से बीजेपी को क्या फायदा मिलता है?
अपना दल (सोनेलाल) को मुख्य रूप से कुर्मी समुदाय से जुड़ी पार्टी माना जाता है. उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में कुर्मी वोटरों की अच्छी मौजूदगी है. 2014 के लोकसभा चुनाव के समय से अपना दल (एस) बीजेपी के साथ गठबंधन में आया. इससे बीजेपी को कुर्मी बहुल इलाकों में अपनी पहुंच बढ़ाने का मौका मिला. बीजेपी के पास सवर्णों का समर्थन हमेशा से रहा है. अपना दल के साथ आने से कुर्मी समुदाय तक पहुंच बनाने में मदद मिली. साथ ही, गैर यादव ओबीसी को राजनीतिक भागीदारी देने का संदेश भी मजबूत हुआ.
केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल 2014 से बीजेपी के साथ हैं.
4. निषाद पार्टी की ताकत और उसकी मांग
पूर्वांचल में संजय निषाद की अगुवाई वाली निषाद पार्टी भी बीजेपी के लिए अहम सहयोगी है. निषाद समुदाय की मौजूदगी पूर्वी उत्तर प्रदेश और वाराणसी मंडल समेत कई इलाकों में है. इस गठबंधन से बीजेपी को निषाद बहुल क्षेत्रों में राजनीतिक पहुंच बनाने में मदद मिलती है. निषाद पार्टी ने नदी किनारे रहने वाले और छोटे कारोबार से जुड़े समुदायों को अलग पहचान दिलाने की कोशिश भी की है. हालांकि, निषाद समुदाय की एससी यानी अनुसूचित जाति का दर्जा देने की मांग भी अहम है. समुदाय का एक बड़ा हिस्सा यह दर्जा चाहता है, जबकि कई जगह उसे ओबीसी श्रेणी में रखा गया है.
निषाद पार्टी के प्रमुख संजय निषाद इन दिनों आरक्षण की डिमांड पर अड़े हैं.
इस मुद्दे से आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बहस भी जुड़ी है. ऐसे में निषाद पार्टी बीजेपी की ताकत होने के साथ-साथ उस पर दबाव बनाने वाली सहयोगी भी है. हाल ही में दिल्ली के ताककटोरा स्टेडियम में रैली कर संजय निषाद आरक्षण की मांग को एक बार फिर से सरकार के सामने मजबूती से पहुंचाने का प्रयास किया है.
5. सुभासपा से पूर्वांचल में कैसे बनता है समीकरण?
ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) का मुख्य आधार राजभर समुदाय है. पूर्वी उत्तर प्रदेश में इस समुदाय की अहम मौजूदगी है. ओम प्रकाश राजभर ने इसे अलग राजनीतिक पहचान दिलाने की कोशिश की है. सुभासपा 2017 में बीजेपी के साथ रहा, फिर 2022 के चुनाव में सपा के साथ. चुनाव बाद जुलाई 2023 में सुभासपा ने दोबारा एनडीए में शामिल होने का फैसला किया. पार्टी ने 2024 का लोकसभा चुनाव भी एनडीए के साथ लड़ा.
सुभासपा फिलहाल बीजेपी के साथ हैं, लेकिन 2022 में सपा के साथ थी.
लेकिन गठबंधन का मतलब यह नहीं था कि सभी समुदायों के वोट बीजेपी के पक्ष में चले गए. 2024 के लोकसभा चुनाव में पूर्वांचल की 27 सीटों में से बीजेपी सिर्फ नौ सीटें जीत सकी. इससे साफ हुआ कि जाति आधारित पार्टियों के साथ गठबंधन होने भर से वोटों का पूरा हस्तांतरण तय नहीं हो जाता. जमीनी समर्थन और स्थानीय समीकरण भी अहम रहते हैं.
6. बीजेपी के लिए ये पार्टियां ताकत भी, चुनौती भी
अपना दल, निषाद पार्टी और सुभासपा जैसी पार्टियां बीजेपी को अलग-अलग समुदायों तक पहुंचने में मदद करती हैं. इनके अपने नेता और सामाजिक आधार हैं. लेकिन गठबंधन चलाना आसान नहीं होता. हर पार्टी की अपनी मांगें होती हैं. इनमें टिकट, मंत्रालय, आरक्षण और राजनीतिक पद जैसे मुद्दे शामिल हैं. जब मांगें पूरी नहीं होतीं, तो गठबंधन में दबाव बढ़ सकता है. वोटों का एक पार्टी से दूसरी पार्टी में जाना भी हमेशा आसान नहीं होता.
यानी ये सहयोगी बीजेपी के लिए ताकत हैं, लेकिन इनके साथ तालमेल बनाए रखना भी जरूरी है.
7. सपा का पीडीए फॉर्मूला कितनी चुनौती देगा?
अखिलेश यादव ने पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों को साथ लाने के लिए पीडीए फॉर्मूले पर जोर दिया है. सपा की कोशिश है कि गैर यादव ओबीसी को भी अपने साथ जोड़ा जाए. पार्टी का दावा है कि बीजेपी के मुकाबले सपा में इन समुदायों को ज्यादा प्रतिनिधित्व मिल सकता है. इस तरह सपा उस सामाजिक समीकरण को चुनौती देना चाहती है, जिसे बीजेपी ने अपने पक्ष में मजबूत करने की कोशिश की है. अब मुकाबला सिर्फ दो राजनीतिक दलों के बीच नहीं है. यह बीजेपी के गैर यादव ओबीसी गठबंधन और सपा के पीडीए फॉर्मूले के बीच भी है.
8. 2027 में किसके साथ जाएंगे गैर यादव ओबीसी?
यूपी विधानसभा चुनाव 2027 में गैर यादव ओबीसी का समर्थन अहम हो सकता है. बीजेपी के लिए अपना दल, निषाद पार्टी और सुभासपा जैसे सहयोगियों के जरिए इन समुदायों तक पहुंच बनाए रखना जरूरी होगा. वहीं, सपा की कोशिश होगी कि पीडीए के जरिए इन जातियों को अपने साथ लाया जाए. लेकिन गठबंधन और नारों से आगे बढ़कर राजनीतिक भागीदारी, स्थानीय समर्थन और वोटों का वास्तविक हस्तांतरण भी मायने रखेगा.