नई दिल्ली. जब बॉलीवुड की सबसे आइकॉनिक रोमांटिक फिल्मों की बात आती है, तो ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ सबसे ऊपर है. इस फिल्म ने न सिर्फ 90 के दशक के युवाओं को प्यार के बारे में एक नया नजरिया दिया, बल्कि करवा चौथ जैसे त्योहार की परिभाषा को भी हमेशा के लिए बदल दिया. विदेशों में रहने वाले एनआरआई दर्शकों की संस्कृति पर गर्व करने वाली इस फिल्म ने शाहरुख खान (राज) के काजोल (सिमरन) के लिए गुप्त रूप से उपवास रखने के दृश्य के साथ एक नया चलन शुरू किया. इस एक दृश्य ने करवा चौथ को दुनिया भर में एक वैश्विक घटना बना दिया.
डीडीएलजे से पहले और बाद का सिनेमा, ‘राज’ का मशहूर व्रत
1990 के दशक से पहले, भारतीय सिनेमा ने मुख्य रूप से ‘करवा चौथ’ को एक पारंपरिक और गंभीर पारिवारिक अनुष्ठान के रूप में चित्रित किया, जहां एक पत्नी अपने पति की लंबी आयु के लिए निर्जला उपवास रखती थी. लेकिन 1995 में ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ की रिलीज ने इस त्योहार को बदल दिया. आदित्य चोपड़ा ने इस धार्मिक और सांस्कृतिक त्योहार को युवा रोमांस, गीतों, सुंदर रंगों और आधुनिक पारिवारिक मूल्यों के साथ जोड़कर एक भव्य उत्सव में बदल दिया. यह प्यार की निशानी और बॉलीवुड की सबसे प्यारी यादों का हिस्सा बन गया है. डीडीएलजे की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि हीरोइन (सिमरन) ने न सिर्फ हीरो के लिए व्रत रखा, बल्कि हीरो (राज) ने भी अपनी प्रेमिका के प्रति अपनी वफादारी और बराबरी दिखाने के लिए चुपके से बिना पानी के करवा चौथ का व्रत रखा. फिल्म का वह सीन, जहां राज छत पर छिपकर सिमरन को पहला निवाला खिलाता है और पानी पीकर अपना व्रत तोड़ता है, बॉलीवुड के सबसे मशहूर पलों में से एक बन गया. इस एक सीन ने भारतीय युवाओं और पुरुषों की सोच पर गहरा असर डाला. इसने देश और दुनिया भर के लड़कों में अपनी गर्लफ्रेंड या पत्नियों के लिए करवा चौथ का व्रत रखने का एक नया और लगातार ट्रेंड शुरू कर दिया.
90 के दशक में शाहरुख खान का स्टारडम सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं था. उन्हें NRIs के बीच भी बहुत पॉपुलैरिटी मिली. वह उस जमाने के पहले सुपरस्टार बने जिनकी ज्यादातर फिल्में स्विट्जरलैंड, लंदन और यूनाइटेड स्टेट्स जैसी विदेशी जगहों पर शूट हुईं. विदेश में रहने वाले भारतीय समुदाय ने अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने के लिए शाहरुख खान की फिल्में देखीं. जब विदेश के थिएटर में NRI दर्शकों ने शाहरुख खान को बड़े पर्दे पर इतनी शान और जोश के साथ करवा चौथ का त्योहार मनाते देखा, तो उन्होंने भी विदेशी धरती पर इस त्योहार को बड़े उत्साह के साथ मनाना शुरू कर दिया. डीडीएलजे में करवा चौथ का सीन जिस खूबसूरती और शान के साथ फिल्माया गया था, उसने त्योहार की विजुअल अपील को कई गुना बढ़ा दिया. फिल्म का गाना ‘घर आजा परदेसी’ और करवा चौथ का मधुर बैकग्राउंड म्यूजिक ने विदेश में रहने वाले भारतीयों के दिलों में अपनी मातृभूमि के लिए गहरी चाहत जगा दी. छलनी से चांद देखने से लेकर पूजा करने और पति के हाथ से पानी पीने तक, हर छोटी रस्म को पर्दे पर इस तरह दिखाया गया कि यह इंटरनेशनल लेवल पर भारतीय संस्कृति के सबसे खूबसूरत सिंबल में से एक बन गया.
करवा चौथ का पॉप कल्चर और पुरुष प्रधान सोच को चुनौती
डीडीएलजे के बाद, करवा चौथ सिर्फ धार्मिक आस्था का मामला नहीं रहा, बल्कि फैशन, म्यूजिक और पॉप कल्चर का भी एक बड़ा हिस्सा बन गया. फिल्म में काजोल के पारंपरिक लाल कपड़े, मेहंदी डिजाइन और जिस तरह से उन्होंने पूजा की थाली सजाई, वह पूरे भारत और विदेशों में एक फैशन स्टेटमेंट बन गया. करवा चौथ के मौके पर डीडीएलजे स्टाइल की छलनी, सजी हुई प्लेटें और पारंपरिक कपड़े बाजार में बिकने लगे. इस फिल्म ने करवा चौथ को एक त्योहार ब्रांड के तौर पर स्थापित किया जिसे आज भी हर पीढ़ी बड़े उत्साह के साथ मनाती है. करवा चौथ को आमतौर पर सिर्फ महिलाओं का व्रत माना जाता था. हालांकि, डीडीएलजे ने इस सोच को बहुत ही आसान और प्यार भरे तरीके से चुनौती दी. राज का किरदार यह मैसेज देता है कि अगर एक औरत आपके लिए पूरे दिन भूखी-प्यासी रह सकती है, तो एक आदमी का भी यह फर्ज है कि वह उसके त्याग का सम्मान करे और यह एहसास उसके साथ शेयर करे. यह मैसेज नई पीढ़ी के दिलों में उतर गया और करवा चौथ को समर्पण और जेंडर इक्वालिटी के त्योहार के तौर पर स्थापित किया.
बॉलीवुड फिल्मों का ओवरसीज मार्केट और करवा चौथ की पॉपुलैरिटी
1990 के दशक के आखिर में जब यश चोपड़ा और धर्मा प्रोडक्शंस की फिल्मों ने ओवरसीज मार्केट में लाखों डॉलर कमाना शुरू किया, तो करवा चौथ हर बड़े बॉलीवुड ड्रामा का एक जरूरी हिस्सा बन गया. डीडीएलजे की जबरदस्त सफलता के बाद, ‘कभी खुशी कभी गम’, ‘बागबान’ और ‘हम दिल दे चुके सनम’ जैसी कई बड़ी फिल्मों में करवा चौथ के सीन उसी शान से दिखाए गए. हालांकि, डीडीएलजे ने इस पूरे ट्रेंड की नींव रखी, जिससे विदेशी मीडिया और हॉलीवुड का ध्यान भारतीय त्योहारों की ओर गया. आज भी सोशल मीडिया और इंटरनेट के जमाने में जब भी करवा चौथ आता है तो इंस्टाग्राम, एक्स और फेसबुक डीडीएलजे के करवा चौथ के सीन, मीम और गानों से भर जाते हैं. आज भी मॉडर्न कपल्स और इन्फ्लुएंसर अपने करवा चौथ सेलिब्रेशन के दौरान राज और सिमरन के आइकॉनिक पोज को रीक्रिएट करते हैं. यह इस बात का साफ सबूत है कि तीन दशक बाद भी फिल्म का असर जरा भी कम नहीं हुआ है और यह पीढ़ियों को इंस्पायर करती रहती है.
एक ऐसी फिल्म जिसने हमेशा के लिए इतिहास रच दिया
डीडीएलजे की सबसे बड़ी ताकत वेस्टर्न सभ्यता और भारतीय परंपराओं का इसका खूबसूरत बैलेंस था. वह सीन जहां लंदन में पले-बढ़े सिमरन और राज, भारत की मिट्टी और परंपराओं से जुड़ते हैं, मॉडर्न दर्शकों के साथ गहराई से जुड़ता है. करवा चौथ का त्योहार इस कल्चरल बैलेंस का सबसे बड़ा सिंबल बनकर उभरा. फिल्म ने दिखाया कि आप दुनिया में कहीं भी रहते हों या कितने भी मॉडर्न हो जाएं, अपनी जड़ों और परंपराओं का सम्मान करना ही सच्चा प्यार और कल्चर है. आखिर में यह कहना कोई बढ़ा-चढ़ाकर कहना नहीं होगा कि ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ सिर्फ एक फिल्म नहीं थी, यह एक कल्चरल क्रांति थी. इसने भारतीय त्योहारों को देखने और मनाने का तरीका बदल दिया. शाहरुख खान के करिश्मे और आदित्य चोपड़ा के डायरेक्शन ने ‘करवा चौथ’ के पवित्र त्योहार को सीमाओं से परे ले जाकर ग्लोबल पहचान दिलाई.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)