AI के आने के बाद यूं तो काफी कुछ बदला है. लेकिन हाल दिनों में सॉफ्टवेयर की दुनिया में एक दिलचस्प बदलाव दिखा है. कुछ सॉफ्टवेयर इंजीनियरों ने AI की मदद से माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस और फोटोशॉप के ऐसे संस्करण तैयार कर रहे हैं, जिन्हें फ्री में इस्तेमाल कर सकते हैं. जबकि ये सॉफ्टवेयर काफी महंगे हैं और उन्हें इस्तेमाल करने के लिए काफी भारी कीमत चुकानी पड़ती थी. ये काम ‘रिवर्स इंजीनियरिंग’ नाम की तकनीक से हो रहा है, जिसमें AI टूल्स की मदद ली जा रही है.
रिवर्स इंजीनियरिंग क्या है?
चैटजीपीटी और क्लॉड जैसे जनरेटिव AI टूल्स की शुरुआत वैसे तो कोड लिखने में मदद के लिए हुई थी. कोड वो निर्देश होते हैं, जिनसे सॉफ्टवेयर बनता है. लेकिन अब एआई टूल्स का इस्तेमाल एक कदम आगे बढ़कर हो रहा है. ‘वाइब कोडिंग’ में आप AI को बताते हैं कि आपको कैसा सॉफ्टवेयर चाहिए और वह बनाने की कोशिश करता है. लेकिन बड़े और कॉम्प्लेक्स सॉफ्टवेयर के लिए ‘रिवर्स इंजीनियरिंग’ ज्यादा प्रभावी साबित हो रही है. इसमें किसी मौजूदा सॉफ्टवेयर को तोड़कर उसके अलग-अलग हिस्सों को समझा जाता है और फिर उसी के जैसी नकल का कोड तैयार किया जाता है. इसी सब के चलते ‘रिवर्स इंजीनियर एनीथिंग’ नाम का एक फ्री AI टूल कोडिंग करने वालों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा है.
1990 के दशक में होता था यही काम
रिवर्स इंजीनियरिंग का ये नया तरीका लोगों को 1990 के दशक की याद दिला रहा है. तब इंटरनेट नया-नया था और ज्यादातर सॉफ्टवेयर मुफ्त या ‘ओपन सोर्स’ होते थे. ओपन सोर्स का मतलब था कि आप सॉफ्टवेयर का कोड डाउनलोड करके अपनी जरूरत के हिसाब से उसमें बदलाव कर सकते थे. लोग एक-दूसरे की मदद करते थे और सॉफ्टवेयर को मिल-जुलकर बेहतर बनाते थे. लेकिन धीरे-धीरे हालात बदल गए. माइक्रोसॉफ्ट जैसे कंपनियों ने मुनाफे के लिए सॉफ्टवेयर बनाने का मॉडल मजबूत किया. 1998 में अमेरिका में डिजिटल मिलेनियम कॉपीराइट एक्ट (डीएमसीए) आया, जिसने सॉफ्टवेयर के ‘लॉक’ तोड़ने को अवैध बना दिया. इसके बाद गूगल, अमेजन, एप्पल और फेसबुक जैसी कंपनियां उभरीं और सॉफ्टवेयर महंगा और बंद होता चला गया.
‘वाइब कोडिंग’ में आप AI को बताते हैं कि आपको कैसा सॉफ्टवेयर चाहिए और वह बनाने की कोशिश करता है.
अब AI की मदद से रिवर्स इंजीनियरिंग एक बार फिर मुफ्त सॉफ्टवेयर की संभावनाएं जगा रही है. चूंकि यह सॉफ्टवेयर का लॉक नहीं तोड़ती, इसलिए सीधे डीएमसीए का उल्लंघन नहीं करती. हालांकि कानूनी चुनौतियां अभी भी आ सकती हैं.
आम लोगों के लिए इससे क्या फायदा?
अगर यह ट्रेंड आगे बढ़ा, तो ऑफिस वर्क, फोटो एडिटिंग, डिजाइन जैसे कामों के लिए महंगे सॉफ्टवेयर खरीदने की जरूरत कम पड़ सकती है. छोटे बिजनेस, स्टूडेंट्स, फ्रीलांसर और आम यूजर्स के लिए यह राहत की बात हो सकती है. कुछ लोग इसे सॉफ्टवेयर की दुनिया में पावर बैलेंस बदलने का संकेत मान रहे हैं. यानी कंपनियां जितना चाहें उतना चार्ज नहीं कर पाएंगी, क्योंकि विकल्प मौजूद रहेंगे.
पर ये सब इतना आसान नहीं है. इसमें कुछ प्रैक्टिकल प्रॉब्लम्स हैं. जैसे बग और गड़बड़ियां, क्योंकि AI से बने कोड में अक्सर अजीब सी गड़बड़ होती है और इसे इंसानी प्रोग्रामर की तरह डीबग करना उतना आसान नहीं होता. फाइलों की कंपैटिबिलिटी भी एक समस्या है. जैसे अगर हर कोई वर्ड या एक्सेल का अपना अलग वर्जन इस्तेमाल करने लगे, तो फाइलें एक-दूसरे के सॉफ्टवेयर में सही से नहीं खुलेंगी. साथ ही सिर्फ फोटोशॉप की नकल बना लेने से काम नहीं चलेगा. एडोबी के पास वो विशाल डेटा और AI मॉडल हैं, जिनसे उसके खास टूल्स काम करते हैं. अभी ये सब नया है पर कंपनियां ऐसे प्रयासों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकती हैं.
रिवर्स इंजीनियरिंग के इस दौर को देखकर यह कहना बहुत जल्दबाजी होगी कि महंगे सॉफ्टवेयर का दौर खत्म हो गया है. लेकिन यह जरूर सॉफ्टवेयर कंपनियों के ट्रेडिशनल बिजनेस मॉडल पर दबाव डालेगी. अब सिर्फ सॉफ्टवेयर बेचकर मुनाफा कमाना पहले जितना आसान नहीं रह सकता. आम यूजर्स के लिए यह एक मौका है और सेफ्टी का ध्यान रखना भी जरूरी है.
(एजेंसी के एनपुट के साथ)