दिल्ली-बेंगलुरु तक पहुंच रही छत्तीसगढ़ की कोसा साड़ी, सुतली गांव के बुनकरों के हुनर से मिल रहा रोजगार

दिल्ली-बेंगलुरु तक पहुंच रही छत्तीसगढ़ की कोसा साड़ी, सुतली गांव के बुनकरों के हुनर से मिल रहा रोजगार


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Raipur: जांजगीर-चांपा जिले के सुतली गांव का मां दुर्गा बुनकर समूह छत्तीसगढ़ के कोसा सिल्क से साड़ियां तैयार कर रोजगार हासिल कर रहा है. समूह के सदस्य देवेंद्र के अनुसार एक साड़ी की कीमत लगभग 4 से 6 हजार रुपये होती है और ऑर्डर के हिसाब से इससे महंगी साड़ियां भी बनाई जाती हैं. समूह सालभर में लाखों रुपये का कारोबार करता है.

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राहुल दुबे(रायपुर),

Chhattisgarh Kosa Silk Saree: छत्तीसगढ़ का कोसा सिल्क अपनी खास पहचान और प्राकृतिक चमक के लिए जाना जाता है. इस रेशम से तैयार होने वाली साड़ियां अपनी खूबसूरती, बनावट और पारंपरिक कारीगरी के कारण लोगों को पसंद आती हैं. जांजगीर-चांपा जिले के सुतली गांव में मां दुर्गा बुनकर समूह के सदस्य कोसा सिल्क की साड़ियां तैयार कर रोजगार हासिल कर रहे हैं. उनकी मेहनत और हुनर से न केवल पारंपरिक बुनकरी को बढ़ावा मिल रहा है, बल्कि परिवार की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो रही है.

मां दुर्गा बुनकर समूह के सदस्य देवेंद्र बताते हैं कि उनके समूह में छत्तीसगढ़ के कोसा सिल्क से साड़ियां तैयार की जाती हैं. एक साड़ी बनाने में बुनकरों को काफी मेहनत और समय देना पड़ता है. धागे की तैयारी से लेकर बुनाई और साड़ी को अंतिम रूप देने तक हर चरण में कारीगरी की जरूरत होती है. बुनकर अपने अनुभव और हुनर से आकर्षक डिजाइन वाली साड़ियां तैयार करते हैं, जिन्हें बाजार में पसंद किया जाता है.

4 से 6 हजार रुपये तक होती है एक साड़ी की कीमत
समूह के सदस्य के मुताबिक, उनके यहां तैयार होने वाली कोसा सिल्क की एक साड़ी की कीमत लगभग 4 हजार से 6 हजार रुपये तक होती है. ग्राहकों की पसंद और मिलने वाले ऑर्डर के अनुसार इससे अधिक कीमत की साड़ियां भी तैयार की जाती हैं. साड़ियों की बिक्री से समूह के सदस्यों को आमदनी होती है. देवेंद्र के अनुसार, समूह सालभर में लाखों रुपये का कारोबार करता है.

दिल्ली और बेंगलुरु तक पहुंच रही चांपा की साड़ियां
चांपा में तैयार होने वाली कोसा सिल्क की साड़ियों की मांग स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं है. समूह को दिल्ली और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों से भी ऑर्डर मिलते हैं. समूह के सदस्य बताते हैं कि दिल्ली के माध्यम से ये साड़ियां विदेशों तक भी पहुंचती हैं. इससे चांपा के बुनकरों की कारीगरी को व्यापक पहचान मिल रही है और पारंपरिक रेशम बुनाई से जुड़े लोगों के लिए बाजार के नए अवसर बन रहे हैं.

कैसे बनती है कोसा सिल्क की साड़ी?
कोसा सिल्क की साड़ी तैयार करने की प्रक्रिया रेशम के धागे से शुरू होती है. कोसा रेशम तसर रेशम का एक प्रकार है, जो रेशम के कीट के कोकून से प्राप्त होता है. कोकून से रेशे निकालने के लिए उपयुक्त प्रसंस्करण किया जाता है. इसके बाद रेशों को उपयोगी धागे के रूप में तैयार किया जाता है. धागे की गुणवत्ता और जरूरत के अनुसार उसकी तैयारी की जाती है, फिर उसे बुनाई के लिए इस्तेमाल किया जाता है. बुनकर करघे पर धागों को व्यवस्थित करके साड़ी की बुनाई करते हैं. डिजाइन, रंग और पैटर्न के अनुसार धागों को अलग-अलग तरीके से बुना जाता है. इसके बाद साड़ी को अंतिम रूप दिया जाता है. पूरी प्रक्रिया में सावधानी, अनुभव और बुनकरों के कौशल की अहम भूमिका होती है.

पारंपरिक कारीगरी से मिल रहा रोजगार
चांपा का मां दुर्गा बुनकर समूह कोसा सिल्क की साड़ियां बनाकर पारंपरिक बुनकरी को आगे बढ़ा रहा है. साड़ियों की मांग और मिलने वाले ऑर्डर समूह के सदस्यों के लिए रोजगार का माध्यम बन रहे हैं. स्थानीय स्तर पर तैयार होने वाला यह उत्पाद छत्तीसगढ़ की रेशम परंपरा और बुनकरों के हुनर को पहचान दिला रहा है. इस तरह कोसा सिल्क की साड़ियां केवल पहनावे का हिस्सा नहीं, बल्कि स्थानीय कारीगरों की मेहनत और आजीविका से भी जुड़ी हैं.



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