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China Taiwan Chip War : अमेरिकी पाबंदियों से घिरे चीन की नजर ताइवान की दिग्गज सेमीकंडक्टर कंपनियों और उनकी उन्नत 3nm चिप तकनीक पर है. अरबों रुपये झोंकने के बाद भी चीन अभी तक चिप निर्माण में कोई ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल नहीं कर पाया है. यही वजह है कि वह साम-दाम-दंड भेद की नीति अपनाकर ताइवान की कंपनियों पर नियंत्रण हासिल करना चाहता है. अगर दोनों देशों के बीच चिप को लेकर टकराव से सप्लाई में कोई बाधा आई तो वैश्विक टेक इंडस्ट्री का दम फूल जाएगा.
ताइवान की चिप इंडस्ट्री में चीन सेंध लगाने की कोशिशें कर रहा है. (Photo : Canva)
नई दिल्ली. स्मार्टफोन, फाइटर जेट, सुपरकंप्यूटर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की रीढ़ मानी जाने वाली चिप्स अब दुनिया का सबसे ‘हॉट प्रोडक्ट’ बन चुकी है. इसके बिना किसी भी देश का गुजारा होना अब नामुमकिन सा हो गया है. ताइवान दुनिया का सबसे बड़ा चिप सप्लायर है. चीन के साथ ताइवान की तनातनी जग-जाहिर है. पहले यह जमीन और संप्रभुता तक सीमित थी. लेकिन अब दोनों देशों के बीच सेमीकंडक्टर को भी लेकर जोरदार ‘खिंचतान’ चल रही है. ताइवान दुनिया की सबसे उन्नत चिप्स का केंद्र है, जबकि चीन तकनीक के मोर्चे पर अमेरिकी दबदबे को चुनौती देने के लिए इस सप्लाई चेन की चाबी अपने हाथ में लेना चाहता है.
ताइवान दुनिया की सबसे एडवांस सेमीकंडक्टर चिप्स, खासकर 3 नैनोमीटर और उससे नीचे का लगभग 90% उत्पादन करता है. ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कंपनी (TSMC) दुनिया की सबसे बड़ी चिप निर्माता है. ऐपल और एनवीडिया से लेकर दुनिया की तमाम बड़ी टेक कंपनियां अपने अत्याधुनिक प्रोसेसर के लिए पूरी तरह टीएसएमसी पर निर्भर हैं. यही तकनीकी ताकत ताइवान को एक ‘सिलिकॉन शील्ड’ (Silicon Shield) देती है. इसी की वजह से वह वैश्विक कूटनीति के केंद्र में रहता है. अमेरिका को उसकी सुरक्षा करनी पड़ती है.
चीन की तकनीकी घेराबंदी
चीन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आधुनिक रक्षा तकनीकों में अमेरिका से आगे निकलने की चाहत रखता है. लेकिन सेमीकंडक्टर निर्माण की की आधुनिक तकनीक न होने से उसकी यह चाहत पूरी नहीं हुई है. अत्याधुनिक 3nm चिप्स तैयार करने के लिए आवश्यक एएसएमएल की एक्सट्रीम अल्ट्रावायलेट (EUV) लिथोग्राफी मशीनों और उन्नत डिजाइन सॉफ्टवेयर पर अमेरिका एक्सपोर्ट बैन लगा रखा है. चीन ने घरेलू चिप उद्योग में भारी पैसा लगाया है लेकिन इन पाबंदियों की वजह से वह चिप निर्माण में ताइवान और पश्चिमी देशों से मिलों पीछे है. इस ‘तकनीकी घेराबंदी’ को तोड़ने के लिए चीन की नजर ताइवान की चिप फाउंड्रीज पर टिकी है.
चीन चल रहा कुटिल चाल
इस साल अप्रैल में ताइवान की शीर्ष सुरक्षा एजेंसी ने सांसदों को सौंपी अपनी रिपोर्ट में ताइवान की चिप इंडस्ट्री में चीन के सेंध लगाने की कोशिशों का खुलासा किया था. रिपोर्ट के अनुसार, चीनी कंपनियां अप्रत्यक्ष माध्यमों, शेल कंपनियों और मोटे सैलरी पैकेज का लालच देकर ताइवान के शीर्ष सेमीकंडक्टर इंजीनियरों और हाई-टेक विशेषज्ञों को अपने यहां खींचने की कोशिश कर रहा है. चीनी सरकार के इशारे पर हैकर्स नेटवर्क अवैध तरीकों से स्थानीय कंपनियों में घुसपैठ कर उन्नत चिप निर्माण प्रक्रियाओं से जुड़े गुप्त फॉर्मूले और नियंत्रित वस्तुओं की खरीद की जुगत में लगे हैं. यही नहीं चीन ताइवान की सेमीकंडरक्टर कंपनियों को अपने यहां कारखाने लगाने के लिए प्रलोभन दे रहा और दबाव भी बना रहा है.
सैन्य घेराबंदी
बीजिंग ताइवान को अपना अभिन्न अंग मानता है और ताइवान जलडमरूमध्य (Taiwan Strait) में लगातार लड़ाकू विमानों और युद्धपोतों के जरिए सैन्य दबाव बना रहा है. रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि चीन कभी ताइवान पर सैन्य नियंत्रण की कोशिश करता है, तो उसका एक प्रमुख लक्ष्य इन उन्नत चिप फाउंड्रीज पर कब्जा जमाना होगा.
तनाव ने लिया उग्र रूप तो दुनिया की टेक इंडस्ट्री पर क्या असर होगा?
अगर ताइवान और चीन के बीच यह तनाव किसी सैन्य टकराव या समुद्री नाकेबंदी में बदलता है, तो इसका असर वैश्विक टेक इंडस्ट्रीज पर बहुत बुरा असर होगा. इसे हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) कंपनी एंथ्रोपिक की सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) फाइलिंग से समझ सकते हैं. एंथ्रोपिक ने अपनी फाइलिंग में कहा है कि अगर ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कंपनी TSMC को कोई भी नुकसान होता है तो उनके कारोबार को बहुत बड़ा झटका लग सकता है. एंथ्रोपिक का कहना है कि TSMC को कई तरह के खतरे हैं. इनमें चीन और ताइवान के बीच बढ़ता राजनीतिक तनाव सबसे बड़ा खतरा है. अगर ताइवान में चिप बनाने में कोई रुकावट आती है तो दुनिया के दूसरे देशों में इतनी फैक्ट्रियां नहीं हैं, जो उसकी भरपाई कर सकें.