विंड टर्बाइन में हमेशा 3 ब्लेड ही क्यों होते हैं… 5 और 7 क्यों नहीं?

विंड टर्बाइन में हमेशा 3 ब्लेड ही क्यों होते हैं… 5 और 7 क्यों नहीं?


होमफोटोनॉलेज

विंड टर्बाइन में हमेशा 3 ब्लेड ही क्यों होते हैं… 5 और 7 क्यों नहीं?

Last Updated:

विंड टर्बाइन का काम हवा से बिजली खींचना है. मगर क्या कभी आपने सोचा है कि पवन चक्की में तीन ब्लेड ही क्यों होते हैं? अगर इसका काम हवा से एनर्जी खींचना ही है तो 5 से 7 ब्लेड क्यों नहीं हो सकते. 1970 में इस पर एक प्रयोग हुआ था, मगर नतीजे सफल नहीं रहे थे.

क्या कभी अपने सोचा है कि विंड टर्बाइन में 3 ब्लेड ही क्यों होते हैं. 4-5 या 7 क्यों नहीं. अगर इसका काम हवा से ऊर्जा खींचना ही है तो आखिर ब्लेड क्यों नहीं बढ़ाए जाते. सुनने में भले ही यह सही लगे, लेकिन तीन अलग-अलग वजहों की वजह से ऐसा नहीं हो सकता. सबसे पहली बात तो किसी भी टर्बाइन का ब्लेड हवा को पकड़ता नहीं है ये असल में हवाई जहाज के पंखे की तरह काम करते हैं, जिससे ब्लेड के अंदर एक बल पैदा होता है, जिससे रोटर घूमता है. ऐसे में यह जरूरी नहीं कि ब्लेड बढ़ा देने से रोटर और तेजी से घूम सकेगा. (सभी फोटो-pixabay)

कोई भी टर्बाइन हवा से पूरी ऊर्जा हासिल नहीं कर सकता. दरअसल हवा से ऊर्जा निकालने के लिए रोटर को हवा की गति कम करनी पड़ती है. जब हवा फैलती है तो रोटर हवा को पीछे से आगे धकेलता है. इस तरह से वहा से तकरीबन 60 प्रतिशत तक एनर्जी हासिल कर ली जाती है. इसे बेट्ज लिमिट कहते हैं. यह हवा से ऊर्जा निकालने की अधिकतम सैद्धांतिक सीमा है. यानी अगर टर्बाइन में ब्लेड बढ़ा भी दिए जाएं तो इसमें बहुत ज्यादा फायदा नहीं मिलने वाला.

साइंस ABC की एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका में पुराने जमाने में जो पवन चक्कियां इस्तेमाल की जाती थीं उनमें कई घुमावदार पाल लगे होते थे. इससे वे तेजी से घूमती थीं. धीरे-धीरे घूमने की वजह से वह कुएं से पानी निकालने में उपयोगी थी, लेकिन बिजली बनाने के लिए रोटर को तेजी से घूमना होगा. यह कम ब्लेड वाले रोटर से ही हो सकता है. इसके लिए एक परीक्षण किया गया. एक रोटर में 3 ब्लेड लगाए गए और दूसरे में पांच. दोनों ने समान हवा को ही रोका मगर तेजी से घूमने के मामले में 3 ब्लेड वाला रोटर अव्वल था.

Add News18 as
Preferred Source on Google

डेनमार्क में 1970 में हुई एक रिसर्च में भी यही सामने आया था. इससे वैज्ञानिकों ने ये निष्कर्ष निकाला कि विंड टर्बाइन में एक ब्लेड ज्यादा लगाने से भी कोई फायदा नहीं है. ऐसा करने में से एक ब्लेड का खर्चा और बढ़ जाएगा, जबकि काम उतना ही होगा. एक डिजाइन संबंधी रिसर्च में ये भी पाया कि अगर ब्लेड के सिरों की लंंबाई 25 प्रतिशत बढ़ा दिया जाए तो जरूर फायदा हो सकता है. इसीलिए आधुनिक विंड टर्बाइन में ब्लेडों की संख्या न बढ़ाकर उनकी लंबाई पर फोकस किया जाता है.

अगर सवाल ये है कि लागत कम करने के लिए दो ब्लेड क्यों नहीं किए जाते, तो इसका जवाब है संतुलन जो विंड टर्बाइन के लिए बेहद जरूरी है. बेशक दो ब्लेड वाला रोटर भी उतनी ही बिजली पैदा कर सकता है, मगर दोनों ब्लेड के बीच अंतर होने की वजह से टर्बाइन को अलग-अलग गति वाली हवा का सामना करना पड़ सकता है, जिससे टावर पर अतिरिक्त भार पड़ता है. इसीलिए तीन ब्लेड वाला रोड ज्यादा संतुलित माना जाता है.

तीन ब्लेड वाला टर्बाइन आधुनिक डिजाइन में नहीं थी. सबसे पहले दो या चार ब्लेड वाले डिजाइन ही बनाए गए थे.डेनमार्क के इंजीनियर जोहानेस जूल ने गेडसर में 200 किलोवाट क्षमता वाला तीन-ब्लेड टर्बाइन विकसित किया, जो 1957 में चालू हुआ और 1967 तक नियमित रूप से संचालित रहा. 1970 के दशक के तेल संकट के बाद वैकल्पिक ऊर्जा की तलाश तेज हुई. डेनमार्क के छोटे निर्माताओं ने सरल, व्यावहारिक और भरोसेमंद तीन-ब्लेड डिजाइन को अपनाया. समय के साथ ये डिजाइन विंड टर्बाइन का मानक बन गया.

लेटेस्ट कॉमर्स डील्स, खास डिस्काउंट और बेहतरीन शॉपिंग ऑफर देखने के लिए कंपेयर इंड‍ियादेखें.



Source link