त्योहारी मौसत आते ही मिठाइयों और खाने की चीजों में मिलावट की खबरें सामने आ जाती हैं. नकली पनीर से लेकर नकदी दूध-मावा, नकली मसाले और न जाने क्या-क्या. यही वजह है कि खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (FSDA) के छापे और कार्रवाइयां इस दौरान काफी बढ़ गई हैं. इसी बीच उत्तर प्रदेश में खाद्य पदार्थों में इस्तेमाल होने वाले रंगों की जांच-पड़ताल तेज हो गई है. FSDA इन इस बार फूड कलरिंग को लेकर कड़ी गाइडलाइंस भी जारी की हैं. मोमोज और समोसे की चमकीली लाल चटनी हो या फिर तंदूरी चिकन, सड़कों पर मिलने वाले ज्यादातर फूड आइटम्स में फूड कलरिंग का इस्तेमाल हो रहा है. लेकिन चिंता की बात ये है कि खाने की चीजों में ऐसे नॉन-फूड ग्रेड औद्योगिक रंगो का इस्तेमाल हो रहा है जो मानव शरीर के लिए खतरा पैदा कर सकती है.
फूड सेफ्टी एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन विभाग अक्सर खाने में मिलाए जाने वाले रंगों को लेकर सख्ती दिखा चुका है. स्ट्रीट फूड, मिठाइयों, स्नैक्स और बेकरी प्रोडक्ट्स को ज्यादा आकर्षक दिखाने के लिए सबसे ज्यादा फूड कलरिंग का इस्तेमाल किया जाता है. सदियों से खाने को नए-नए रंग देकर उसे देखने में आकर्षक बनाया जाता है. लेकिन खाने को ये खूबसूरत रंग देने का काम सुरक्षित चीजों से ही किया जाता था. मनचाहा रंग और स्वाद लाने के लिए चटनी में टमाटर, चुकंदर, धनिया और पुदीना जैसी सामग्री का इस्तेमाल होता रहा है. मिठाइयों को केसर या केवड़ा, गुलाब की पत्तियों से खूबसूरत रंग दिए जाते थे. लेकिन धीरे-धीरे इन प्राकृतिक तरीकों की जगह जहरीले कैमिकल कलर्स ने ले ली है जो खाने के लायक भी नहीं हैं.
कौन-कौनसे रंग खाने लायक नहीं?
गैर-खाद्य रंगों में रोडामाइन-बी (Rhodamine-B) के इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक है. इस औद्योगिक रंग का इस्तेमाल कपड़ों और कागज को रंगने के लिए किया जाता है. लेकिन कई दुकानदार इसका प्रयोग करते हैं. रोडामाइन-बी के अलावा मेटानिल येलो, बटर येलो, मैलाकाइट ग्रीन, ऑरमीन, ऑरेंज-2 और सूडान डाई जैसे रंग भी पूरी तरह प्रतिबंधित हैं और खाने के लायक नहीं हैं. इन रंगों का अवैध इस्तेमाल कॉटन कैंडी, चटनी और मिठाइयों को चमकीला गुलाबी या लाल रंग देने से लेकर हल्दी, दालों, मिर्च पाउडर और दूसरे मसालों को ज्यादा चमकीला दिखाने तक किया जाता है. सूडान डाई, खाद्य तेलों और पैकेट में मिलने वाली सॉस में मिलाई जाती है.
रोडामाइन-B एक तरह का लाल रंग है, जो पानी में आसानी से घुल जाता है. यही वजह है कि कुछ रेस्टोरेंट में खाने को ज्यादा आकर्षक दिखाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है. कॉटन कैंडी को बच्चों के लिए आकर्षक बनाने में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है. रोडामाइन-B इंसानी शरीर के लिए जहरीला हो सकता है. साल 2020 में इंडोनेशिया में हुए एक अध्ययन में पाया गया कि इससे कोशिकाओं और ऊतकों में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस हो सकता है. अध्ययन के मुताबिक, लंबे समय तक खाने में रोडामाइन-B का इस्तेमाल लिवर की कार्यप्रणाली को नुकसान पहुंचा सकता है या कैंसर का खतरा बढ़ा सकता है. चूहों पर किए गए एक अध्ययन में यह भी पाया गया कि इसका असर अंडाशय पर पड़ सकता है.
टार्ट्राजीन एक सिंथेटिक पीला फूड कलर है. इसका संबंध अप्रत्यक्ष रूप से पित्ती और फूड एलर्जी जैसी समस्याओं से जोड़ा गया है. इसके कारण होंठ, जीभ, गले और गर्दन में सूजन हो सकती है. साल 2015 में हुए एक अध्ययन में चूहों पर इसके असर की जांच की गई. इसमें टार्ट्राजीन को न्यूरोटॉक्सिक पाया गया, यानी यह दिमाग की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है. अध्ययन में चूहों की जगह और दिशा पहचानने की याददाश्त पर भी इसका असर देखा गया.
कार्मोइसिन नाम का फूड कलर भी शरीर में एलर्जी जैसी प्रतिक्रियाएं पैदा कर सकता है. इससे त्वचा में सूजन और सांस लेने में परेशानी हो सकती है. खासकर अस्थमा के मरीजों और पित्ती की समस्या से जूझ रहे लोगों को इससे दिक्कत हो सकती है.
आर्टिफिशियल रंग इंसानी शरीर को कैसे नुकसान पहुंचाते हैं?
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार मैक्स हेल्थकेयर के डिपार्टमेंट ऑफ क्लिनिकल न्यूट्रिशन एंड डायटेटिक्स की रीजनल हेड रितिका समद्दार कहती हैं कि लंबे समय तक लगातार आर्टिफिशियल रंगों वाली चीजें खाने से शरीर में इनफ्लेमेशन की समस्या हो सकती है. खासकर तब, जब कोई व्यक्ति नियमित रूप से ऐसी चीजें खाता है और उसे उनकी आदत पड़ जाती है. यही वजह है कि डॉक्टर गठिया के मरीजों को आर्टिफिशियल रंगों और प्रिजर्वेटिव वाली चीजों से बचने की सलाह देते हैं. इसी कारण हम बच्चों की पसंदीदा कॉटन कैंडी में भी फूड कलर का इस्तेमाल नहीं करने की बात करते रहे हैं, क्योंकि बच्चों को इसकी आदत आसानी से लग सकती है.
एक्सपर्ट्स का कहना है कि अब तक किसी भी स्टडी में फूड कलर के इस्तेमाल और कैंसर जैसी किसी खास बीमारी के बीच सीधा संबंध साबित नहीं हुआ है. लेकिन जानवरों पर की गई स्टडीज में यह जरूर सामने आया है कि लंबे समय तक ज्यादा मात्रा में आर्टिफिशियल रंगों से भरपूर खाना देने पर शरीर में गंभीर विषाक्तता देखी गई. अलग-अलग लोगों की संवेदनशीलता के हिसाब से इन रंगों का असर भी अलग हो सकता है.
डॉक्टर सलाह देते हैं कि बाजार से तैयार पेस्ट और मसाले खरीदते समय उनके पैकेट पर लगे लेबल को ध्यान से पढ़ें. देखें कि उनमें किन फूड कलर का इस्तेमाल किया गया है और क्या उन्हें एफडीए ने अप्रूव किया है. साथ ही, रोजाना फूड कलर वाली चीजें खाने से बचें. FSSAI के नियमों के तहत कुछ प्राकृतिक रंगों और रंग देने वाले पदार्थों के इस्तेमाल की अनुमति है. इनमें कैरोटीन और कैरोटिनॉयड्स, बीटा-कैरोटीन, कैंथैक्सैंथिन, क्लोरोफिल, कैरेमल, राइबोफ्लेविन, केसर और करक्यूमिन शामिल हैं. FSSAI के 2009 के नियमों के मुताबिक, खाद्य पदार्थों और पेय पदार्थों में सिंथेटिक फूड कलर की अंतिम मात्रा 100 पीपीएम (पार्ट्स पर मिलियन) से अधिक नहीं होनी चाहिए.