Arunachal Pradesh Story: चीन का भारत के साथ सीमा विवाद एक बार फिर से चर्चा में है. आखिर ऐसा क्या है कि यह तनातनी मची हुई है. भारत का पूर्वोत्तर में स्थित राज्य अरुणाचल प्रदेश को Land of the Rising Sun यानी उगते सूरज की धरती भी कहा जाता है. उसको अपनी सामरिक स्थिति और प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है. अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर पर स्थित होने के कारण यह राज्य अक्सर चर्चा में रहता है. भारत के नक्शे में अरुणाचल का इतिहास, इसका प्रशासनिक सफर अहम है. चीन के साथ इस राज्य की सीमा को लेकर जारी विवाद बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक पहलू का है. अरुणाचल प्रदेश का इतिहास क्या है, भारत में इसका विलय कैसे हुआ और चीन के साथ जारी विवाद की मुख्य वजह क्या है?
अरुणाचल प्रदेश ना केवल प्राचीन भारतीय संस्कृति और अलग-अलग जनजातीय परंपराओं का प्रतीक है, बल्कि भारत की सुरक्षा की दृष्टि से एक अति-संवेदनशील सीमावर्ती राज्य भी है. चीन के बार-बार के बेबुनियाद दावों के बावजूद, भारत ने अपनी सैन्य तैयारी और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के जरिए यह साफ कर दिया है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अटूट हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा.
पौराणिक और प्राचीन इतिहास
अरुणाचल प्रदेश का जिक्र भारत के प्राचीन ग्रंथों और पौराणिक कथाओं में मिलता है. रामायण और महाभारत काल में माना जाता है कि परशुराम ने अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए लोहित जिले की कुंड नदी में स्नान किया था, जिसे आज परशुराम कुंड के नाम से जाना जाता है. इसके अलावा महाभारत काल की रुक्मिणी यानी भगवान कृष्ण की पत्नी के बारे में माना जाता है कि वह अरुणाचल की मिशमी जनजाति से ताल्लुक रखती थीं.
मध्यकालीन शासकों की बात करें तो 16वीं शताब्दी में असम के अहोम साम्राज्य के राजाओं ने इस क्षेत्र के स्थानीय जनजातीय समूहों के साथ व्यापारिक और रणनीतिक संबंध स्थापित किए थे. इनमें न्यिशि, मिशमी और मोन्पा शामिल हैं. 17वीं शताब्दी में यहां प्रसिद्ध तवांग मठ की स्थापना हुई, जो तिब्बती बौद्ध धर्म का एक बड़ा सेंटर बना.
ब्रिटिश काल और ‘शिमला समझौता’
19वीं शताब्दी के अंत में ब्रिटिश भारत ने असम और उसके आसपास के जनजातीय इलाकों पर अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू किया. NEFA का शुरुआती ढांचा आया. 1873 में अंग्रेजों ने ‘इनर लाइन परमिट’ प्रणाली लागू की ताकि बाहरी लोग बिना अनुमति जनजातीय क्षेत्रों में प्रवेश ना कर सकें.
मैकमोहन लाइन का मामला
1914 में शिमला में ब्रिटिश भारत, तिब्बत और चीन के प्रतिनिधियों के बीच एक सम्मेलन हुआ. इसमें ब्रिटिश प्रतिनिधि सर हेनरी मैकमोहन ने तिब्बत के प्रतिनिधियों के साथ मिलकर भारत और तिब्बत की सीमा तय की. इसी सीमा रेखा को मैकमोहन रेखा कहा गया, जिसके तहत तवांग और आसपास के इलाकों को ब्रिटिश भारत का हिस्सा स्वीकार किया गया. हालांकि चीन का रुख अलग रहा. चीन के प्रतिनिधि ने शिमला समझौते पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया और दावा किया कि तिब्बत को स्वतंत्र तौर पर ऑटोनॉमस संधि करने का कोई अधिकार नहीं था.
स्वतंत्र भारत में विलय और राज्य का सफर
15 अगस्त 1947 को भारत की आजादी के बाद यह क्षेत्र असम के राज्यपाल के सीधे प्रशासनिक नियंत्रण में रहा. मेजर बॉब खाथिंग का साहसिक कदम देखने को मिला. आजादी के समय तक तवांग क्षेत्र में प्रशासनिक नियंत्रण काफी कमजोर था. फरवरी 1951 में भारतीय सेना के मेजर हिमंत बहादुर बॉब खाथिंग ने एक अभियान का नेतृत्व किया और बिना किसी रक्तपात के तवांग में भारतीय तिरंगा फहराया.
खाथिंग के इस बहादुरी भरे कदम के साथ ही औपचारिक रूप से भारतीय प्रशासन स्थापित हो गया. NEFA का गठन 1954 में हुआ. साल 1954 में इस क्षेत्र का नाम नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (NEFA) रखा गया. यह विदेश मंत्रालय के अधीन काम करता था और असम के राज्यपाल इसके प्रशासनिक प्रमुख थे.
1962 का भारत-चीन युद्ध का वो काला समय आया. 1962 में चीन ने इस NEFA के इलाके पर अचानक हमला कर दिया और चीनी सेना तवांग से होते हुए असम के मैदानी इलाकों के करीब बोमडिला तक पहुंच गई थी. हालांकि एकतरफा युद्धविराम की घोषणा के बाद चीनी सेना अपनी मैकमोहन रेखा के पीछे लौट गई.
केंद्र शासित प्रदेश से पूर्ण राज्य
20 जनवरी 1972 को NEFA का नाम बदलकर ‘अरुणाचल प्रदेश’ रखा गया और इसे केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा मिला. 20 फरवरी 1987 को अरुणाचल प्रदेश को भारतीय संघ का 24वां पूर्ण राज्य बनाया गया. इसकी राजधानी ईंटानगर बनी.
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