30 साल नौकरी के बाद भी नहीं बने सरकारी शिक्षक! अब आरपार की लड़ाई, धरने पर बैठे टीचर

30 साल नौकरी के बाद भी नहीं बने सरकारी शिक्षक! अब आरपार की लड़ाई, धरने पर बैठे टीचर


सतना. सालों तक बच्चों को पढ़ाया, सरकारी स्कूलों में नौकरी की और कई शिक्षक रिटायर भी हो गए लेकिन आज तक उन्हें सरकारी कर्मचारी होने का पूरा हक नहीं मिला. किसी को सातवां वेतनमान नहीं मिल रहा, किसी की पेंशन अटकी है, तो किसी शिक्षक की मौत के बाद उसके परिवार को अनुकंपा नियुक्ति तक नहीं मिल पा रही. यह मामला मध्य प्रदेश के सतना जिले के उन सैकड़ों शिक्षकों का है, जो साल 2018 से संविलियन का इंतजार कर रहे हैं. सरकारी आदेश और कोर्ट से राहत मिलने के बाद भी उनकी समस्या दूर नहीं हुई. अब शिक्षकों ने जिला पंचायत कार्यालय के सामने अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया है. उनका कहना है कि गलती सरकारी दफ्तरों के कामकाज में है लेकिन सजा शिक्षक और उनके परिवार भुगत रहा है.

सतना जिले में पंचायती राज व्यवस्था के तहत नियुक्त कई शिक्षक आज भी राज्य शिक्षा सेवा में संविलियन का इंतजार कर रहे हैं. मध्य प्रदेश सरकार ने साल 2018 में राज्य शिक्षा सेवा कैडर बनाया था. इसके तहत नियमों को पूरा करने वाले अध्यापकों को शिक्षा विभाग की सेवा में शामिल किया जाना था ताकि उन्हें समान पद, वेतन और अधिकार मिल सकें. आरोप है कि जिला पंचायत और जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के बीच मामला 8 साल से अटका हुआ है. अधिकारी बदल जाते हैं और उनका मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है. गड़बड़ इसमें भी है कि कुछ शिक्षकों का संविलियन कर दिया गया लेकिन बाकी अब भी सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं.

हाईकोर्ट से राहत के बाद भी नहीं मिला हक
लोकल 18 को जानकारी देते हुए अमरपाटन से आने वाले शिक्षक राजेंद्र सिंह ने बताया कि शुरुआत में अधिकारियों ने कहा था कि कुछ शिक्षकों के खिलाफ लोकायुक्त के विशेष न्यायालय में मामला चल रहा है. उनके मुताबिक फैसला शिक्षकों के पक्ष में आने के बाद भी कई शिक्षकों का संविलियन नहीं किया गया. अधिकारियों ने उनके खिलाफ विपरीत टिप्पणी होने की बात कही. इसके बाद शिक्षकों ने हाईकोर्ट की डबल बेंच में अपील की. कोर्ट ने टिप्पणी हटाते हुए कहा कि संबंधित शिक्षक न तो अभियुक्त थे और न ही मामले में पक्षकार. इसके बावजूद बाकी शिक्षकों का संविलियन नहीं होने से नाराजगी बढ़ गई.

15 शिक्षकों का काम हुआ, बाकी इंतजार में
राजेंद्र ने बताया कि पिछले महीने की पांच तारीख को आंदोलन की योजना बनी थी. उस समय अधिकारियों ने भरोसा दिया था कि 20 अक्टूबर से पहले टिप्पणी हटने वाले सभी शिक्षकों का संविलियन कर दिया जाएगा लेकिन केवल 15 लोगों का संविलियन हुआ, जिनमें राजेंद्र सिंह भी शामिल हैं. बाकी शिक्षक अब भी इंतजार कर रहे हैं. उनका कहना है कि अधिकारियों की ओर से कई बार आश्वासन मिला लेकिन सभी पात्र शिक्षकों का काम पूरा नहीं किया गया. इसी वजह से आंदोलन फिर तेज करना पड़ा.

हर माह हो रहा नुकसान
संविलियन नहीं होने से शिक्षकों को द्वितीय क्रमोन्नति और सातवें वेतनमान का लाभ नहीं मिल रहा है. इससे हर महीने करीब 20 से 25 हजार रुपये तक का नुकसान हो रहा है. उनका कहना है कि कई शिक्षक 30 से 35 साल नौकरी करने के बाद रिटायर हो चुके हैं लेकिन उन्हें पेंशन नहीं मिल पा रही. वहीं नौकरी के दौरान जिन शिक्षकों की मौत हो गई उनके परिवारों को अनुकंपा नियुक्ति का लाभ भी नहीं मिला. शिक्षकों का कहना है कि इस परेशानी का असर उनके बच्चों और पूरे परिवार पर पड़ रहा है.

बारी-बारी से भूख हड़ताल कर रहे शिक्षक
अपनी मांगों को लेकर शिक्षकों ने जिला पंचायत सतना के सामने अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया है. आंदोलन के तहत शिक्षक रोज बारी-बारी से भूख हड़ताल पर बैठ रहे हैं. राजेंद्र सिंह ने बताया कि पहले दिन रामपुर बघेलान की शिक्षिकाएं मीना शुक्ला, माया सिंह और बबीता सिंह भूख हड़ताल पर बैठीं. इसके बाद अमरपाटन और फिर सोहावल विकासखंड के शिक्षक इसमें शामिल होंगे. उनकी योजना है कि रोज कोई न कोई शिक्षक भूख हड़ताल करेगा. शिक्षकों ने चेतावनी दी है कि मांगों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो आंदोलन को आमरण अनशन में बदल दिया जाएगा.

जिला पंचायत सदस्य ने भी दिया समर्थन
जिला पंचायत सदस्य ज्ञानेंद्र सिंह ज्ञानू ने कहा कि वह शिक्षकों की मांगों को लेकर आखिरी लड़ाई तक उनके साथ रहेंगे. उन्होंने बताया कि पिछले दो साल से वह अलग-अलग मौकों पर संविलियन का मुद्दा उठाते रहे हैं. अधिकारियों ने कई बार लिखित और मौखिक आश्वासन दिए लेकिन सभी शिक्षकों का काम पूरा नहीं हुआ. ज्ञानू ने सवाल उठाया कि जब कुछ लोगों का संविलियन किया जा सकता है, तो बाकी शिक्षकों का मामला क्यों अटका है. उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर वह जिम्मेदार अधिकारियों के चैंबर में बैठकर भी इस मुद्दे को उठाएंगे.

30 साल नौकरी, फिर भी सुविधाओं से वंचित
शासकीय अध्यापक संगठन के प्रदेश संगठन मंत्री यशपाल शर्मा ने कहा कि शिक्षक करीब 8 साल से संविलियन के लिए प्रशासन के चक्कर लगा रहे हैं. साल 1995 और 1998 में नियुक्त अध्यापकों को शुरुआत में 500 और 600 रुपये मानदेय मिलता था. आज भी कई शिक्षकों को सातवें वेतनमान की जगह छठे वेतनमान के हिसाब से वेतन मिल रहा है. किसी शिक्षक की असमय मौत होने पर दूसरे कर्मचारियों की तरह दो लाख रुपये के बीमा की सुविधा भी इन्हें नहीं मिलती. उनका कहना है कि 30 साल तक सेवा देने के बाद भी शिक्षक सरकारी कर्मचारियों जैसी सुविधाओं से वंचित हैं.

भूख हड़ताल पर बैठीं शिक्षिकाओं ने क्या कहा?
शिक्षिका मीना शुक्ला ने कहा कि साल 2018 में संविलियन की प्रक्रिया शुरू हुई थी लेकिन कुछ शिक्षकों के नाम छूट गए. हाईकोर्ट से राहत मिलने के बाद भी उनका काम पूरा नहीं हुआ. उन्होंने आरोप लगाया कि अधिकारी कुछ शिक्षकों का ही संविलियन कर रहे हैं और बाकी को इंतजार करना पड़ रहा है. मीना शुक्ला ने बताया कि भूख हड़ताल में शामिल शिक्षिका बबीता सिंह दिव्यांग हैं, फिर भी वह अपने अधिकारों के लिए बैठी हैं. शिक्षिका माया सिंह ने कहा कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो क्रमिक भूख हड़ताल को आमरण अनशन में बदल दिया जाएगा.



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