GI टैग पा चुकी गया की पत्थरकाटी कला, शिल्पकारों को मिली पीएम विश्वकर्मा की टूलकिट, पर क्यों काम नहीं आ रहे औजार

GI टैग पा चुकी गया की पत्थरकाटी कला, शिल्पकारों को मिली पीएम विश्वकर्मा की टूलकिट, पर क्यों काम नहीं आ रहे औजार


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Gaya News: गया के पत्थरकट्टी गांव के शिल्पकारों को पीएम विश्वकर्मा योजना के तहत लकड़ी काटने वाली मशीनें मिलीं हालांकि उन्हें जरूरत पत्थर काटने वाली मशीन की थी. इस वजह से वे इनका इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं. इस समस्या को संज्ञान में ला दिया गया है और इस पर जल्दी ही काम होगा.

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गया. बिहार के गया जिले का पत्थरकट्टी गांव मूर्ति कला के लिए देशभर में प्रसिद्ध है. यहां पत्थरों की बनी मूर्तियां विदेश में भी भेजी जाती हैं. हाल ही में पत्थरकट्टी की मूर्ति कला को जीआई टैग भी मिला है. इस मूर्ति कला से इस क्षेत्र के 3000 से अधिक शिल्पकार जुड़े हुए हैं जो 50 रुपए से लेकर 10 लाख रुपए तक की मूर्तियां बनाते हैं. पत्थरकट्टी के अलावा आसपास सटे खुखड़ी साथ ही अन्य गांवों में भी लोग इस कला से जुड़े हुए हैं.

पत्थर काटने वाले कलाकारों को लकड़ी काटने वाली मशीन
पत्थरकट्टी की मूर्ति कला को बढ़ावा देने के लिए सरकार हर संभव मदद कर रही है. पीएम विश्वकर्मा योजना के तहत 200 से अधिक शिल्पकारों को टूल किट का वितरण किया गया है. लगभग 1 साल पहले पत्थरकट्टी और खुखड़ी गांव के शिल्पकारों को टूलकिट दिया गया था लेकिन आज तक टूल किट का इस्तेमाल यहां के शिल्पकारों के द्वारा नहीं किया गया है. यहां के शिल्पकारों का आरोप है कि ये लोग पत्थर काटने वाले कारीगर हैं लेकिन विभाग के द्वारा हम शिल्पकारों को लकड़ी काटने वाली मशीन दे दी गई है.

कोई नहीं कर रहा इस्तेमाल
गांव के रहने वाले सुनील कुमार, विद्यानंद केसरी और लाल बाबू चौधरी बताते हैं कि हम लोगों को टूल किट में जो सामान दिया गया है वह पत्थर काटने के लिए नहीं है. यह टाइल्स और लकड़ी काटने वाली मशीन है. जो भी मशीनें दी गई हैं वह 1 से 2 घंटे में जल जाती हैं. गांव के लोगों का आरोप है कि जो भी टूल किट में मशीनें हैं वह पत्थर काटने और तराशने वाली नहीं बल्कि लकड़ी काटने वाली हैं. हम लोग इस किट का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं और ऐसे ही लोग अपने-अपने घरों में रखे हुए हैं.

हालांकि इस संबंध में जब भारत सरकार के एमएसएमई मंत्री और गया के सांसद जीतन राम मांझी से बात की तो उन्होंने बताया इस बात की जानकारी हमें नहीं है और अब जानकारी मिली है तो हम यहां के शिल्पकारों के लिए हमेशा खड़े हैं और उनकी परेशानियों को जल्द दूर करेंगे. इन्होंने बताया यहां का पत्थर सबसे बढ़िया पत्थर है और इस पत्थर से बनी मूर्तियां देश के बाहर भी जा रही हैं. अब तो जीआई टैग भी मिल गया है और इस कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलेगी.

यहां के बने पात्रों की डिमांड
बता दें कि पहले यहां सिर्फ मूर्तियों का काम होता था लेकिन उसके बाद पत्थरों से थाली, गिलास, कटोरा, सुराही आदि बनाते थे. इसके अलावा औषधि कूटने वाली खल बनाई जाती थी. बांग्लादेश जब भारत का हिस्सा हुआ करता था तो उन दिनों यहां की बनी खल ढाका तक जाती थी. इसी खल में औषधि की पिसाई की जाती थी. आज भी बड़े-बड़े औषधालय में यहां के बने पात्र की डिमांड है.

पूरे विश्व में सबसे अच्छा पत्थर
माना जाता है पूरे विश्व में पत्थरकट्टी गांव में सबसे बढ़िया काला पत्थर पाया जाता है. काले पत्थर की बनी मूर्तियां और अन्य सामग्रियों की डिमांड सबसे ज्यादा है. इसकी कीमत भी अन्य पत्थरों की तुलना में अधिक मिलती है. आज के समय में यहां 3 हजार से अधिक लोग मूर्ति कला के काम से जुड़े हुए हैं. पत्थरकट्टी और खुखड़ी जैसे गांव के हर घर में इस काम को किया जाता है. घर का हर सदस्य इस काम से जुड़ा हुआ है पुरुषों का काम पत्थरों को तराश कर मूर्तियां बनाना है तो महिलाएं तैयार मूर्तियों को घिसकर उसे चिकना बनाती हैं.



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