नई दिल्ली. ‘नाइन टू फाइव’ सिर्फ एक ऑफिस ड्रामा नहीं है, बल्कि आज के युवाओं की एम्बिशन, इनसिक्योरिटी और उम्मीदों का एक साफ डॉक्यूमेंट है. कहानी के सेंटर में अनुज (प्रीत कमानी) है, जो अपनी जिंदगी के हर मोड़ पर ‘लगभग कुमार’ का टाइटल पाता है. कभी पढ़ाई में दूसरा नंबर, कभी प्यार में थोड़ी सी चूक, कभी करियर में सफलता की दहलीज पर पिछड़ जाना… अनुज की कहानी हर उस आम इंसान से जुड़ती है जो पूरी कोशिश करने के बाद भी बस पीछे रह जाता है. जब उसे एक कीवी ऐप स्टार्टअप में नौकरी का मौका मिलता है, तो उसकी जिंदगी में नई उम्मीद जगती है. लेकिन, यह नई शुरुआत अपने साथ अनगिनत चुनौतियां, ऑफिस पॉलिटिक्स और पर्सनल उथल-पुथल लेकर आती है. रस्क मीडिया के बैनर तले बनी यह सीरीज कॉर्पोरेट माहौल को बहुत ही रियलिस्टिक और रिफ्रेशिंग तरीके से दिखाती है.
कहानी
इस वेब सीरीज के राइटर सिद्धार्थ तिवारी और व्योम छारया ने रोजमर्रा की जिंदगी की सच्चाई को स्क्रीनप्ले में बहुत खूबसूरती से पिरोया है. कहानी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें कोई बढ़ा-चढ़ाकर या फिल्मी ड्रामा नहीं है, बल्कि रोजमर्रा की वे परेशानियां हैं जिनका सामना हर युवा करता है. पहले एपिसोड से लेकर आखिरी एपिसोड तक, कहानी ठहराव और रफ्तार के बीच एक परफेक्ट बैलेंस बनाती है. अनुज का स्टार्टअप इंटरव्यू, उसके किराए के फ्लैट की दिक्कतें, उसके मकान मालिक का दबाव, और ऑफिस में यशस्विनी (भाग्यश्री लिमये) के साथ उसकी प्रोफेशनल केमिस्ट्री… सब कुछ बहुत नेचुरल लगता है. तीसरे एपिसोड में ट्विस्ट, जब अनुज को अपनी गर्लफ्रेंड के साथ कुछ चौंकाने वाले डॉक्यूमेंट्स मिलते हैं, तो कहानी को एक रोमांचक रफ्तार मिलती है. स्क्रिप्ट सिर्फ ऑफिस की उथल-पुथल से आगे बढ़कर इंसानी भावनाओं, फेल होने के डर और रिश्तों की मुश्किलों को भी गहराई से दिखाती है.
एक्टिंग
लीड रोल निभा रहे प्रीत कमानी ने अनुज को जिंदा कर दिया है. प्रीत कमानी की बॉडी लैंग्वेज और एक्सप्रेशन, कैरेक्टर की बेबसी और आगे बढ़ने के पक्के इरादे को बराबर दिखाते हैं. सीरीज में दीपक का रोल कर रहे राजेश कुमार ने एक बार फिर अपने काबिल एक्टर होने का सबूत दिया है. राजेश कुमार के हल्के-फुल्के एक्सप्रेशन और कॉमिक टाइमिंग इस सीरियस कहानी में राहत का पल लाते हैं. यशस्विनी के रोल में भाग्यश्री लिमये अपनी नैचुरल और चार्मिंग परफॉर्मेंस से एक गहरी छाप छोड़ती हैं. उनका कॉन्फिडेंस, अपने काम के प्रति डेडिकेशन और शानदार व्यवहार स्क्रीन पर एक मजबूत असर छोड़ते हैं. भाग्यश्री की स्क्रीन प्रेजेंस सीन में जान डाल देती है. मेन कास्ट के अलावा, दूसरे सपोर्टिंग कास्ट मेंबर्स ने भी सीरीज को जिंदा करने में बहुत बड़ा योगदान दिया है. चाहे अनुज का फ्लैटमेट सुजल हो या उसके ऑफिस के कलीग, सभी ने अपने रोल में एक नेचुरल सहजता बनाए रखी है. तान्या शर्मा, अपने छोटे से रोल में भी, काफी नेचुरल और असरदार हैं. ये छोटे किरदार मिलकर कॉर्पोरेट और शहरी माहौल बनाते हैं जिसमें मुख्य किरदार रहते हैं और संघर्ष करते हैं. एक्टर्स की केमिस्ट्री और आसान परफॉर्मेंस यह पक्का करती है कि दर्शक किसी भी मोड़ पर कहानी से अलग महसूस न करें.
डायरेक्शन
डायरेक्टर व्योम छारया ने इस वेब सीरीज के जरिए यह साबित कर दिया है कि वे आज की यंग जेनरेशन की नब्ज को कितनी अच्छी तरह समझते हैं. उनका डायरेक्शन सटल और असरदार है. वे सीन में फालतू का मेलोड्रामा डालने के बजाय सिचुएशन की असलियत पर जोर देते हैं. टेंशन वाले ऑफिस के माहौल, तेजी से बदलते स्टार्टअप के माहौल और किरदारों की बातचीत के बीच का तालमेल व्योम की बेहतरीन समझ को दिखाता है. उन्होंने यह पक्का किया है कि सीरीज का मेन मैसेज – कि हमेशा नंबर वन रहना ही सब कुछ नहीं होता… दर्शकों तक पूरी सच्चाई के साथ पहुंचे. डायरेक्शन की यह मैच्योरिटी ‘नाइन टू फाइव’ को एक सिंपल ऑफिस कॉमेडी या ड्रामा से एक इंस्पायरिंग और सोचने पर मजबूर करने वाली वेब सीरीज बनाती है.
सिनेमैटोग्राफी
‘नाइन टू फाइव’ की सिनेमैटोग्राफी इसके मूड और टोन के साथ पूरी तरह से मैच करती है. कैमरामैन ने स्टार्टअप ऑफिस की तेज लाइट, मॉडर्न इंटीरियर और भागदौड़ को बहुत ध्यान से कैप्चर किया है. इसके उलट, अनुज के छोटे और तंग किराए के फ्लैट में सेट किए गए सीन में इस्तेमाल की गई लाइटिंग और कंपोजिशन उसकी पैसे की तंगी और दिमागी उथल-पुथल को दिखाते हैं. शहर की बिजी सड़कों, ऑफिस कैंटीन और मीटिंग रूम के शॉट्स से ऐसा लगता है कि कहानी मेट्रोपोलिस की दुनिया की है, जहां सांस लेने का भी समय नहीं मिलता. कलर पैलेट अच्छी तरह से बैलेंस्ड है, जो प्रोफेशनल दुनिया की ठंडक और पर्सनल जिंदगी की गर्मी के बीच एकदम सही बैलेंस बनाता है.
म्यूजिक
किसी भी ड्रामा या सीरीज में जान डालने में म्यूजिक और डायलॉग का बहुत बड़ा रोल होता है. ‘नाइन टू फाइव’ का बैकग्राउंड स्कोर सीन के टेंशन और हल्के-फुल्के पलों को खूबसूरती से दिखाता है. जब अनुज अपनी जिंदगी की उलझनों से जूझता है, तो म्यूजिक स्क्रीन के पार उसकी दिमागी हालत को दिखाता है. इसके अलावा सीरीज के डायलॉग इसकी सबसे बड़ी ताकत हैं. वे न सिर्फ मजेदार और भरोसेमंद हैं, बल्कि आसान भाषा में जिंदगी की गहरी सोच भी बताते हैं. अनुज के लिए दीपक का मंत्र: ‘लगभग होना’ कोई हार नहीं है, यह दर्शकों के साथ लंबे समय तक रहता है. डायलॉग्स में यह सादगी सीरीज को और ज्यादा असली और यादगार बनाती है.
कमियां
हर बेहतरीन काम की तरह ‘नाइन टू फाइव’ में भी कुछ कमियां हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. पहले और दूसरे एपिसोड के बीच की रफ्तार थोड़ी धीमी लगती है, खासकर जब कहानी अनुज के पर्सनल स्ट्रगल और अपार्टमेंट की प्रॉब्लम में ज्यादा उलझ जाती है. इसके अलावा, तान्या शर्मा और दूसरे को-स्टार्स के किरदारों में स्क्रिप्ट की वह गहराई नहीं है जो मेन कास्ट को मिली थी. कुछ सबप्लॉट थोड़े प्रेडिक्टेबल लगते हैं, जिससे दर्शकों के लिए उन्हें समझना आसान हो जाता है. अगर स्क्रिप्ट ने इन छोटी कमियों को ठीक किया होता और सपोर्टिंग कास्ट को थोड़ी और जगह दी होती, तो यह एक्सपीरियंस और भी अच्छा हो सकता था.
अंतिम फैसला
नतीजा यह है कि ‘नाइन टू फाइव’ एक ऐसी वेब सीरीज है, जो दर्शकों का मनोरंजन करती है और उन्हें सोचने पर मजबूर करती है. यह उन सभी युवाओं के लिए एक जरूरी सीरीज है जो जिंदगी में आगे बढ़ने की लगातार दौड़ से थक चुके हैं और उन्हें लगता है कि वे कभी अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाएंगे. मेरी ओर से इस सीरीज को 5 में से 3 स्टार.