दुनिया फिर देखेगी दूसरा एपिक फ्यूरी… US में कैसे रखे जाते हैं ऑपरेशन के नाम
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डोनाल्ड ट्रंप ने इजराइल के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ जो ऑपरेशन चलाया था उसे एपिक फ्यूरी नाम दिया गया था. इस नाम को उन 20 नामों से चुना गया था जो ट्रंप को सुझाए गए थे. अमेरिका में हर सैन्य ऑपरेशन का नाम रखने के पीछे एक पूरी प्रक्रिया होती है. नाम ऐसे चुने जाते हैं जो अमेरिका की कार्रवाई को सही दिखाएं और दुश्मन को डराने वाले हों.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप.
ईरान ने फिर ट्रंप की दुखती रग पर हाथ रख दिया है. मिडटर्म चुनाव की तैयारियों में जुटे डोनाल्ड ट्रंप इसे खुली चुनौती के तौर पर ले रहे हैं. उन्होंने ऐलान कर दिया है कि वह एक बार फिर ईरान पर एक छोटा एपिक फ्यूरी ऑपरेशन चला सकते हैं. ये वही ऑपरेशन है जो 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान के खिलाफ चलाया था.
ट्रंप ने खुद इस ऑपरेशन का एपिक फ्यूरी रखा था. इसमें ईरान पर बड़े पैमाने पर कार्रवाई की गई थी. अब एक रैली के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार ये ऑपरेशन चलाने की चेतावनी दी है. दरअसल दरअसल ट्रंप के वरिष्ठ खुफिया अधिकारी ने दावा किया है कि शिया मुस्लिम देश अमेरिकी कर्मियों को निशाना बनाने की कोशिश में है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक राष्ट्रीय खुफिया निदेशक जे क्लेटन की चेतावनी के बाद यूएस ने सऊदी में अपने मिशन में कर्मियों को कम कर दिया है. क्लेटन ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो को लिखे संदेश में खुफिया जानकारी के हवाले से ये दावा किया था
अमेरिका सेना किसी भी सैन्य कार्रवाई को एक नाम देती है. ईरान के खिलाफ किए गए ऑपरेशन को एपिक फ्यूरी नाम दिया गया था. एपिक का अर्थ होता है महाकाव्य और फ्यूरी का अर्थ होता है भीषण गुस्सा या क्रोध. एक इंटरव्यू के दौरान ट्रंप ने खुद बताया था कि इस ऑपरेशन को नाम देने का फैसला उसका अपना था.
उन्होंने ये भी बताया था कि सेना के जनरल ने उन्हें 20 नामों की सूची दी थी. नाम पढ़कर मुझे नींद आने लगी थी, फिर अचानक मैंने एपिक फ्यूरी देखा और कहा यही नाम होगा. मुझे ये नाम पसंद है. एक्सपर्ट के मुताबिक ट्रंप का ये नाम चुना अमेरकी कार्रवाई की विनाशकारी क्षमता दिखाना था, जिसका मतलब था कि अमेरिका का गुस्सा बेहद बड़ा यानी ‘एपिक’ और विनाशकारी यानी ‘फ्यूरी’ साबित होने वाला है.
सैना जब कोई भी ऑपरेशन करती है तो उसकी पहली प्राथमिकता होती है कि दुश्मन को इसकी भनक न लगे. इसीलिए गुप्त बातचीत के लिए ऑपरेशन को कोई नाम दिया जाता है. ईरान के खिलाफ भी इसी रणनीति के तहत ऑपरेशन का नाम एपिक फ्यूरी रखा गया था. इसके अलावा सेना में कई मिशन एक साथ चलते हैं. रेडियो संचार या वायरलेस पर बातचीत के दौरान किसी भी तरह के भ्रम से बचने के लिए ऑपरेशन का नाम लेकर ही बात की जाती है. इससे जानकारी लीक होने का डर भी नहीं रहता और कंफ्यूजन की स्थिति भी नहीं रहती.
रेडियो फ्री यूरोप की एक रिपोर्ट के मुताबिक नाम ऐसा चुना जाता है जो सैनिकों में जोश भर सके और जनता का मनोबल बढ़े खासतौर से सोशल मीडिया के दौर में जब कुछ ही मिनटों में जानकारी दुनिया तक फैल जाती है, ऐसे में अमेरिका जैसे देश ऐसे नाम रखते हैं जिससे दुनिया के सामने उनका रुख सही लगे. खासतौर से ऐसे नाम रखे जाते हैं न्यायपूर्ण और रक्षात्मक लगें.
अमेरिकी सेना में नाम रखने के लिए एक विशेष कंप्यूटर प्रोग्राम काम करता है. इसे NICKA यानी निकनेम एंड एक्सरसाइज टर्म सिस्टम कहते हैं. रक्षा मंत्रालय की विभिन्न इकाइयों को दो अक्षर के कोट जैसे AG-AL अलॉट होते हैं. कंप्यूटर इन अक्षरों से शुरू होने वाले दो शब्दों के नाम जनरेट करता है. 1970 के दशक के बाद से यह नियम बनाया गया है कि कोई भी नाम अपमानजनक, बहुत ज्यादा आक्रामक या किसी ट्रेडमार्क से संबंधित नहीं होना चाहिए. नाम को अंतिम मंजूरी देश के राष्ट्रपति या रक्षामंत्री देते हैं.
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