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खेती-किसानी तो बहुत से लोग करते हैं और यहां तक कि एक ही गांव में लोग एक ही तरह की फसल भी लगाते हैं लेकिन, सभी को मुनाफा अलग-अलग होता है. इसकी वजह खेती के तौर-तरीके में है. एक ही फसल को कई तरीके से तैयार किया जा सकता है लेकिन, कुछ तरीके ऐसे होते हैं जिनमें लागत कम आती है और मुनाफा ज्यादा होता है. ऐसा ही मॉडल जीरो टिलेज श्रीविधि प्राकृतिक खेती है. इससे किसानों को कई तरह के फायदे मिलते हैं और कम लागत में अधिक पैदावार होती है. इस विधि में….
कुमार: बिहार में धान की हार्वेस्टिंग के बाद खेत में बचे पुआल का उपयोग करके, खेतों को बिना जुताई आलू की खेती करना किसानों के लिए एक उपयोगी विकल्प हो सकता है. इस तकनीक में धान की कटाई के बाद खेत की मिट्टी को बार-बार जोतने के बजाय, नमी वाली जमीन पर आलू के बीज कंद रखकर घरों से निकलने वाले गनौरा यानि गोबर खाद और धान के पुआल से ढक दिया जाता है. इस मॉडल को जीरो टिलेज श्रीविधि प्राकृतिक खेती कहा जाता है. इससे किसानों को कई तरह के फायदे मिलते हैं और कम लागत में अधिक पैदावार होता है.
इस विधि में खेत की जुताई किए बिना आलू की फसल को लगाया जाता है, जिसमें बहुत ही कम मजदूर की आवश्यकता पड़ती है. इतना ही नहीं इस विधि के इस्तेमाल से उपज में 15-20 प्रतिशत तक वृद्धि की जा सकती है. कम लागत, कम समय और अधिक उत्पादन देने वाली जीरो टिलेज श्रीविधि पद्धति से आलू की खेती गया जिले में तेजी से लोकप्रिय हो रही है. इस आधुनिक तकनीक से किसान बिना जुताई, धान कटनी के बाद बचे पराली का उपयोग कर आलू की खेती कर रहे हैं. इस विधि से जहां खेती की लागत में भारी कमी आ रही है, वहीं मिट्टी की उर्वरता बनी रह रही है, साथ ही पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिल रहा है.
गया जिले में दर्जनों ऐसे किसान है जो पिछले दो वर्षों से इस नये तकनीक से आलू की खेती कर रहे हैं और बंपर पैदावार कर रहे हैं. पारंपरिक विधि से आलू की खेती की पैदावार जहां 2-3 क्विंटल प्रति कट्ठा है वहीं इस नई तकनीक से आलू का उत्पादन 3-4 क्विंटल प्रति कट्ठा तक हो रहा है. मानपुर प्रखंड के नवादा गांव के किसान जीवेश कुमार जिन्होंने इस विधि से आलू की खेती कर पिछले साल अच्छा उत्पादन लिया था और इन्हें कृषि विभाग से सम्मानित भी किया गया था.
जीवेश कुमार बताते हैं कि जीरो टिलेज श्रीविधि प्राकृतिक आलू की खेती में खेत की जुताई जरूरी नहीं है. धान का फसल हार्वेस्टिंग होते हीं खेत में खेतों की जुताई किए बिना गोबर खाद और पुआल के मदद से इस विधि से आलू की खेती कर अच्छा पैदावार लिया जा सकता है. इस तकनीक से खेती करने में प्रति कट्ठा किसानों को 1200 रुपये की बचत होती है. पारंपरिक आलू की खेती में जहां बार-बार खेतों की जुताई, मजदूरी और रासायनिक खाद पर पैसे खर्च होते हैं इसमें पूरी तरह से बचत हो जाती है.