Dehradun News : देखना है तलवार-भालों का रोमांच? देहरादून में शुरू होने जा रहा ठोऊड़ा महोत्सव, जानिए लोकेशन

Dehradun News : देखना है तलवार-भालों का रोमांच? देहरादून में शुरू होने जा रहा ठोऊड़ा महोत्सव, जानिए लोकेशन


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Dehradun ki local news : देहरादून के जौनसार में रहने वाले लोग खुद को पांडवों का वंशज मानते हैं. महाभारत काल से जुड़ी मान्यताओं को समेटे इस क्षेत्र की शौर्य परंपरा एक बार फिर जीवंत होने जा रही है. 24 अक्टूबर से देहरादून में ठाउड़ा महोत्सव में शुरू होगा. इस सांस्कृतिक संगम का मुख्य आकर्षण होगा पौराणिक ‘ठाउड़ा नृत्य’, जिसमें स्थानीय कलाकार हाथों में तलवारें, भाले और ढाल लेकर युद्ध कौशल की हैरतअंगेज कलाबाजियां दिखाते हैं. ठोऊड़ा महोत्सव 2026 के आयोजक कुंदन सिंह चौहान बताते हैं कि इस महोत्सव का आयोजन 24 से 27 अक्टूबर तक देहरादून के परेड ग्राउंड में किया जा रहा है. इसका उद्देश्य नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध संस्कृति से जोड़ना और उसका संरक्षण करना है.

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देहरादून. उत्तराखंड की राजधानी देहरादून का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा माना जाता है. यहां जौनसार क्षेत्र के लोग खुद को पांडवों के वंशज मानते हैं. दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि देवभूमि उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर में जौनसार-बावर का एक अनूठा और खास स्थान है. महाभारत काल से जुड़ी मान्यताओं को समेटे इस क्षेत्र की शौर्य परंपरा एक बार फिर देहरादून की धरती पर जीवंत होने जा रही है. 24 अक्टूबर से देहरादून में ठाउड़ा महोत्सव में जौनसार बावर के साथ उत्तराखंड के पूरे पहाड़ की झलकियां देखने को मिलेंगी. इस आयोजन में दर्शकों को जौनसार की प्रसिद्ध पाण्डव कालीन संस्कृति और वीरता का अद्भुत नजारा देखने को मिलेगा. इस सांस्कृतिक संगम का मुख्य आकर्षण होगा पौराणिक ‘ठाउड़ा नृत्य’, जिसमें स्थानीय कलाकार हाथों में तलवारें, भाले और ढाल लेकर युद्ध कौशल की हैरतअंगेज कलाबाजियां पेश करेंगे. ढोल-दमाऊ की दनदनाती ताल और रणसिंगे की गूंज के बीच जब पारंपरिक वेशभूषा में सजे नर्तक हवा में अस्त्र-शस्त्र लहराते हुए कदम ताल मिलाएंगे, तो दर्शक मंत्रमुग्ध हो उठेंगे. यह आयोजन न केवल पुरानी धरोहर को सहेजने की एक अनूठी पहल है, बल्कि आज की युवा पीढ़ी को अपनी वीरोचित जड़ों और पाण्डव कालीन समृद्ध इतिहास से रूबरू कराने का एक सुनहरा मौका भी है.

ठोऊड़ा महोत्सव 2026 के आयोजक कुंदन सिंह चौहान ने कहा कि यह महोत्सव उत्तराखंड की लोक संस्कृति, परंपरा और लोककला का एक भव्य और अनूठा महाकुंभ है. इस महोत्सव का आयोजन 24 से 27 अक्टूबर तक राजधानी देहरादून के परेड ग्राउंड में किया जा रहा है. इसमें राज्यभर से हजारों लोक कलाकार, पारंपरिक वादक और छात्र-छात्राएं भाग ले रहे हैं. इसमें 51 पारंपरिक ढोलों की गूंज, 11 रणसिंघों की गर्जना और हजारों कलाकारों की रंगयात्रा देवभूमि की सांस्कृतिक विरासत को एक मंच पर जीवंत करेगी. इसका उद्देश्य नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध संस्कृति से जोड़ना और उसका संरक्षण करना है. जौनसार क्षेत्र के लोकगायक नरेश बादशाह बताते हैं कि ठोऊड़ा नृत्य जौनसार के साथ हिमाचल प्रदेश, सिरमौर क्षेत्र में भी प्रचलित है जिसमें कौरव पांडवों के खेल से शुरू तीर कमान के माध्यम से डांस किया जाता है. इस नृत्य में 14 फीट बांस का हाथी बनाया जाता है. इसी हाथी से नृत्य करवाया जाता है.

प्राचीन मार्शल आर्ट

उत्तराखंड के जौनसार-बावर क्षेत्र और समीपवर्ती हिमाचल की घाटियों में खेला जाने वाला ‘ठोऊड़ा’ या ठोड़ा असल में एक प्राचीन मार्शल आर्ट सह युद्ध नृत्य है, जिसका सीधा और गहरा संबंध महाभारत काल के पांडवों और कौरवों से माना जाता है. लोक मान्यताओं और परंपरा के अनुसार, इस खेल या नृत्य शैली को महाभारत के महायुद्ध के दौरान पांडवों और कौरवों के बीच हुए रणकौशल और तीरंदाजी के प्रदर्शन का प्रतीकात्मक रूप माना जाता है.इसमें भाग लेने वाले खिलाड़ी (धनुर्धर) खुद को पौराणिक रूप से पांडव और कौरव पक्षों का वंशज या प्रतिनिधि मानते हैं, जो जौनसार-बावर क्षेत्र की संस्कृति में गहराई से रचा-बसा है.



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