अब चौथी पीढ़ी ने संभाली ‘मिठास’ की कमान, 1920 से खंडवा को खिला रहे एक से एक मिठाई, इनका रसगुल्ला सबसे बड़ा!

अब चौथी पीढ़ी ने संभाली ‘मिठास’ की कमान, 1920 से खंडवा को खिला रहे एक से एक मिठाई, इनका रसगुल्ला सबसे बड़ा!


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Success Story: खंडवा में वर्ष 1920 से शुरू हुआ अग्रवाल परिवार का मिठाई कारोबार आज चार पीढ़ियों की मेहनत से ‘अग्रवाल मिठास’ बन चुका है. देसी गाय के दूध का विशाल रसगुल्ला और तिरंगा बर्फी इसकी मुख्य पहचान है. सरकारी योजना से मिले 36.58 लाख के ऋण और 10 लाख के अनुदान से इस कारोबार का कायाकल्प हुआ है.

Khandwa News: हर बड़ा कारोबार बड़ी पूंजी से ही खड़ा हो, ऐसा जरूरी नहीं है. कई बार छोटी-सी दुकान और सीमित संसाधनों से शुरू हुआ सफर भी मेहनत और लगन के दम पर बड़ी पहचान बना लेता है. खंडवा के भागचंद अग्रवाल की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. मिठाई बनाने और बेचने का उनका पारिवारिक कारोबार कई पीढ़ियों से चला आ रहा है. कभी छोटी-सी दुकान से शुरू हुआ यह सफर आज अग्रवाल मिठास के नाम से पहचान बना चुका है. खास बात ये कि परिवार की तीन पीढ़ियां मिठाई बनाने की परंपरा को आगे बढ़ाती रहीं और अब चौथी पीढ़ी भी इस कारोबार को संभाल रही है. यहां की मिठाइयों में रसगुल्ला खास आकर्षण है, जिसे अपने बड़े आकार और स्वाद के लिए जाना जाता है. वहीं, कारोबार को आगे बढ़ाने में सरकारी योजना से मिली आर्थिक मदद ने भी अहम भूमिका निभाई.

1920 में रखी गई थी मिठाई के कारोबार की नींव
अग्रवाल परिवार के मिठाई कारोबार का इतिहास करीब एक सदी पुराना है. परिवार की ओर से मिली जानकारी के मुताबिक, मूल रूप से राजस्थान से आए रामसहाय जी अग्रवाल ने वर्ष 1920 में मिठाई बनाने की परंपरा की शुरुआत की थी. परिवार ने खंडवा को अपना घर बनाया और यहीं मिठाई का कारोबार शुरू किया. धीरे-धीरे इस काम से परिवार की पहचान जुड़ती चली गई. अग्रवाल परिवार की खास पहचान तिरंगा बर्फी से भी जुड़ी रही है. यह मिठाई देखने में तिरंगे के रंगों जैसी होती है और अपने स्वाद के लिए पसंद की जाती है. समय के साथ परिवार की अगली पीढ़ियां भी इस काम से जुड़ती गईं. आज भागचंद अग्रवाल और उनके बेटे इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. बदलते दौर में कारोबार को संभालने के साथ ग्राहकों की पसंद के मुताबिक मिठाइयां तैयार करना भी इस सफर का हिस्सा रहा है.

देसी गाय के दूध से बनता खास रसगुल्ला
अग्रवाल मिठास की बात हो और यहां के बड़े रसगुल्ले का जिक्र न हो, ऐसा कम ही होता है. दुकान पर मिलने वाला यह रसगुल्ला अपने आकार के कारण लोगों का ध्यान खींचता है. दावा है कि इसका एक रसगुल्ला आकार में करीब 10 सामान्य रसगुल्लों के बराबर होता है. इसे खास तौर पर देसी गाय के दूध से तैयार किया जाता है. बड़े आकार के इस रसगुल्ले को देखने और खाने के लिए मिठाई के शौकीन दुकान पर पहुंचते हैं. इसके अलावा यहां दूध और मावे से बनी मिठाइयां भी मिलती हैं. परिवार का कहना है कि मिठाई बनाने के पारंपरिक काम को आगे बढ़ाते हुए ग्राहकों की पसंद का ध्यान रखा जाता है. यही वजह है कि पुराने समय से मिठाई के कारोबार से जुड़ा यह परिवार आज भी अपनी पहचान बनाए हुए है.

छोटी दुकान से कारोबार बढ़ाने में आईं मुश्किलें
भागचंद अग्रवाल बताते हैं कि पहले उनकी दुकान छोटी थी और कारोबार को बड़े स्तर पर ले जाने के लिए जरूरी संसाधनों की कमी थी. कारोबार को बढ़ाने के लिए केवल मेहनत ही नहीं, बल्कि बेहतर सुविधाओं और निवेश की भी जरूरत थी. सीमित साधनों के कारण दुकान का विस्तार और आधुनिकीकरण करना आसान नहीं था. ऐसे में उन्होंने अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए सरकारी योजना का सहारा लिया. भागचंद अग्रवाल ने प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्यम उन्नयन योजना के तहत आवेदन किया. योजना के अंतर्गत उन्हें 36 लाख 58 हजार रुपये का ऋण और 10 लाख रुपये की अनुदान राशि स्वीकृत हुई. इस आर्थिक मदद से उन्होंने रेलवे स्टेशन रोड, खंडवा स्थित अपनी दुकान अग्रवाल मिठास का विस्तार और आधुनिकीकरण किया.

सरकारी योजना से मिला कारोबार को आगे बढ़ाने का सहारा
भागचंद अग्रवाल के मुताबिक, योजना से मिली आर्थिक सहायता ने उनके व्यवसाय को आगे बढ़ाने में मदद की. दुकान के विस्तार और सुविधाओं को बेहतर बनाने से कारोबार को नई दिशा मिली. उनका कहना है कि पहले जिन संसाधनों की कमी के कारण व्यवसाय बढ़ाने में परेशानी आती थी, उन्हें दूर करने का अवसर मिला.यह कहानी उन छोटे खाद्य उद्यमियों के लिए भी प्रेरणा बन सकती है, जो अपना काम तो कर रहे हैं, लेकिन पूंजी की कमी के कारण उसे बड़े स्तर पर नहीं ले जा पा रहे हैं. हालांकि, किसी भी योजना का लाभ पात्रता, स्वीकृति और निर्धारित नियमों के आधार पर मिलता है. भागचंद अग्रवाल के मामले में ऋण और अनुदान की स्वीकृति से उनके पारिवारिक कारोबार को विस्तार देने में मदद मिली.



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