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दहेज के एक मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने एक अहम फैसला सुनाया है. हाईकोर्ट ने फैसले में कहा कि दहेज की मांग साबित करने के लिए लिखित एग्रीमेंट की जरूरत नहीं है. दहेज की मांग साबित करने के लिए शादी से पहले रकम तय होने का प्रमाण जरूरी नहीं है. विवाह के संबंध में शादी के बाद की गई दहेज की मांग भी कानून के दायरे में आएगी.
शादी के बाद भी दहेज मांगा तो केस चलेगा. (यह तस्वीर AI से बनाई गई है.)
इंदौर. कानूनी तौर पर दहेज लेना और देना दोनों ही अपराध है. इसके बावजूद समाज में यह प्रथा बनी हुई है. अब दहेज से जुड़े एक मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने एक अहम फैसला सुनाया है. हाईकोर्ट ने कहा दहेज की मांग साबित करने के लिए लिखित समझौता यानी एग्रीमेंट जरूरी नहीं है. अगर शादी के बाद भी दहेज मांगा तो केस चलेगा. दहेज के अपराध में मुकदमा चलाने के लिए यह साबित करना जरूरी नहीं है कि शादी से पहले ही दहेज की रकम तय हो गई थी. शादी के बाद अगर कोई दहेज मांगता है, तो दहेज निषेध अधिनियम की धारा 4 के तहत कार्रवाई की जा सकती है.
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच के जस्टिस आलोक अवस्थी ने यह अहम टिप्पणी करते हुए दहेज प्रताड़ना के एक मामले में पति की सजा बहाल कर दी है. हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि दहेज की मांग को मौखिक गवाही के आधार पर साबित किया जा सकता है. इसके लिए लिखित समझौता या दस्तावेज होना अनिवार्य नहीं है. बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए अपीलीय अदालत के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें पति और उसके पिता को बरी कर दिया गया था.
क्या है मामला
दैनिक भास्कर के मुताबिक, हाई कोर्ट ने पति के खिलाफ निचली अदालत से मिली सजा बहाल कर दी. हालांकि, पति के पिता की मृत्यु हो जाने के कारण उनके खिलाफ दोषसिद्धि बहाल नहीं की गई. दरअसल, महिला के माता-पिता ने शादी के समय करीब 17 लाख रुपए नकद, गहने और घरेलू सामान दिया था. महिला का आरोप था कि उसके पति ने अमेरिका से बीबीए करने की बात कही थी, जबकि उसके मुताबिक पति ने केवल 12वीं तक पढ़ाई की थी. महिला ने आरोप लगाया कि शादी के बाद ससुराल वाले कहते थे कि उन्हें 25 लाख रुपए दहेज मिलने की उम्मीद थी, लेकिन उन्हें केवल 17 लाख रुपए ही मिले. बाकी रकम नहीं देने पर महिला को ससुराल से निकाल दिया गया. इसके बाद महिला ने 6 अगस्त 2007 को शिकायत दर्ज कराई.
नौ गवाहों के बयान बने अहम आधार
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने कुल 9 गवाह पेश किए. इनमें महिला, उसके माता-पिता, भाई, जांच अधिकारी और अन्य गवाह शामिल थे. मामले में निचली अदालत ने पति और उसके पिता को एक-एक साल के कारावास की सजा सुनाई थी. इसके बाद दोनों ने फैसले को अपीलीय अदालत में चुनौती दी. अपीलीय अदालत ने निचली अदालत का फैसला पलटते हुए दोनों को बरी कर दिया. इसके खिलाफ महिला ने हाई कोर्ट का रुख किया.
दहेज की मांग के लिए लिखित सबूत जरूरी नहीं
हाई कोर्ट ने मामले में स्पष्ट किया कि दहेज की मांग साबित करने के लिए शादी से पहले रकम तय होने का प्रमाण जरूरी नहीं है. विवाह के संबंध में शादी के बाद की गई दहेज की मांग भी कानून के दायरे में आ सकती है. अदालत के मुताबिक, ऐसी मांग को मौखिक गवाही से भी साबित किया जा सकता है. इसके लिए लिखित समझौते या दस्तावेज की अनिवार्यता नहीं है. इस फैसले के साथ हाई कोर्ट ने पति के खिलाफ निचली अदालत की सजा बहाल कर दी, जबकि पिता की मृत्यु के चलते उनके खिलाफ दोषसिद्धि बहाल नहीं की गई.