पाकिस्तान की हालत ऐसी हो गई है कि देश में जो भी मेहमान आता है, वो उसके सामने पानी का रोना रोने लगता है. जी हां, मेहमान का मतलब मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू और पानी का मतलब है सिंधु जल से जुड़ा समझौता, जिस पर भारत ने लगाम कस रखी है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने मुइज्जू की मेहमाननवाजी की. फिर बातचीत के दौरान कश्मीर का पुराना राग अलापा. इसके बाद सिंधु जल समझौते का रोना रोया.
शहबाज शरीफ ने मुइज्जू के 3 दिनों के दौरे के दौरान मुलाकात की. उनसे यह भी कहा कि पाकिस्तान हमेशा से कश्मीर विवाद को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के संबंधित प्रस्तावों और कश्मीरी लोगों की उम्मीद के मुताबिक सुलझाने के लिए प्रतिबद्ध है. वहीं भारत 1972 से यह रुख अपनाता रहा है कि शिमला समझौते में द्विपक्षीय बातचीत पर दिया गया जोर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के जरिए इस विवाद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाने की कोशिशों पर प्रभावी है.
इसके बाद शरीफ ने अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत की तरफ से सिंधु जल संधि को स्थगित रखने के फैसले पर भी गंभीर चिंता जताई. उन्होंने मुइज्जू के सामने अपनी सिरदर्दी और तकलीफ बताई. शरीफ ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लागू किए जा सकने वाले समझौतों का सम्मान जरूरी है. साझा जल संसाधनों को हथियार के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए. पाकिस्तान इस मामले में किसी भी उल्लंघन को युद्ध की कार्रवाई मानेगा.
इस साल 31 अगस्त को हेग स्थित मध्यस्थता वाले कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने फैसला दिया था कि भारत का सिंधु जल संधि को निलंबित करने का निर्णय कानूनी रूप से मान्य नहीं है और 1960 का यह समझौता पूरी तरह प्रभावी बना हुआ है. हालांकि नई दिल्ली ने इस फैसले को खारिज कर दिया है. भारत का कहना है कि इस ट्राइब्यूनल के पास भारत के संप्रभु फैसलों पर निर्णय देने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है.
खून और पानी एक साथ नहीं बह सकता
अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने इस समझौते को सस्पेंड कर दिया है. भारत का रुख है कि जब तक सीमा पार आतंकवाद बंद नहीं होता, तब तक समझौता बहाल नहीं किया जाएगा. सीधी भाषा में कहा जाए तो खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते हैं. भारत ने पाकिस्तान की तरफ जाने वाले पानी को रोकने और बिजली परियोजनाओं पर काम तेज करने की योजना तैयार की है.
नीदरलैंड्स के द हेग स्थित परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (PCA) ने 31 अगस्त और सितंबर 2026 में फैसला सुनाया कि भारत एकतरफा रूप से इस संधि को समाप्त या निलंबित नहीं कर सकता है. भारत ने इस फैसले को मानने से इनकार कर दिया है.
क्या है इस समझौते में?
भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी प्रणाली के जल के बंटवारे को लेकर हुआ एक ऐतिहासिक समझौता है. इस संधि पर 19 सितंबर 1960 को कराची में भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने साइन किए थे. इस समझौते में वर्ल्ड बैंक ने मध्यस्थता की थी.
इसमें 6 नदियों के पानी का बंटवारा हुआ था. भारत को पूर्वी हिस्से की 3 नदियां मिलीं. व्यास, रावी और सतलुज. भारत इन नदियों के जल का अधिकांश उपयोग कर सकता है. वहीं पश्चिमी नदियां पाकिस्तान को मिलीं. सिंधु, झेलम और चिनाब. इनका अधिकांश पानी पाकिस्तान को मिलता है. हालांकि भारत को इन पर हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रॉजेक्ट्स के लिए सीमित उपयोग का अधिकार है.