छोटे-छोटे मुल्क, लेकिन इनमें बसती है भारत की जान! अंगोला से गैबॉन तक क्यों पहुंच रहे जहाज?

छोटे-छोटे मुल्क, लेकिन इनमें बसती है भारत की जान! अंगोला से गैबॉन तक क्यों पहुंच रहे जहाज?


भारत को तेल चाहिए तो दुनिया के बड़े तेल उत्पादक देशों रूस, सऊदी अरब, इराक और अमेरिका के नाम सबसे पहले दिमाग में आते हैं. लेकिन ये सब कहीं न कहीं जंग में फंसे हुए हैं. इनका सप्‍लाई चेन टूटता बिखरता जा रहा है. ऐसे में भारत ने कुछ छोटे-छोटे मुल्‍कों के साथ डील करनी शुरू कर दी है. ये वे देश हैं, ज‍िनके बारे में शायद आपको बहुत पता भी न हो, लेकिन आपकी गाड़ी में जो पेट्रोल डीजल पड़ रहा है, हो सकता है क‍ि इन देशों से आया हो.

हम बात अंगोला, गैबॉन, कांगो गणराज्य और लीबिया की कर रहे हैं. अक्टूबर 2026 में अंगोला से भारत आने वाले कच्चे तेल की मात्रा करीब 2.9 लाख बैरल प्रतिदिन रहने का अनुमान है. वहीं गैबॉन, कांगो गणराज्य और लीबिया से भी करीब तीन महीने के अंतराल के बाद तेल की खेपें भारत पहुंची हैं. यह बदलाव ऐसे समय दिख रहा है, जब भारत तेल की सप्लाई के लिए ज्यादा विकल्प खुले रखना चाहता है. इन चारों देशों की कुल आबादी करीब 5.7 करोड़ के आसपास बैठती है. यानी आबादी के लिहाज से ये भारत के मुकाबले बेहद छोटे देश हैं, लेकिन भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिए इनका तेल मायने रखता है. आखिर भारत इनसे कितना तेल खरीदता है, पहले कितना खरीद रहा था, ये देश भारत से कितनी दूर हैं और इनके साथ कारोबार कैसे बढ़ा?

कुछ इस तरह अंगोला से भारत के ल‍िए आते हैं तेल के टैंकर. (Reuters)

अंगोला से तेल खरीद में तीन गुने से ज्यादा उछाल?

सबसे ज्यादा चर्चा अंगोला की हो रही. वेस्‍ट अफ्रीका में अटलांटिक महासागर के किनारे बसा यह देश तेल का बड़ा उत्पादक है. अक्टूबर में भारत को यहां से करीब 2.9 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल मिलने का अनुमान है. इसके मुकाबले जनवरी से अक्टूबर 2025 के दौरान भारत की अंगोला से खरीद औसतन करीब 94000 बैरल प्रतिदिन थी. यानी ताजा अनुमान उस औसत के तीन गुने से भी ज्यादा है.

इसका मतलब यह नहीं कि भारत ने अंगोला के साथ अचानक कोई नई सरकारी तेल डील कर ली है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में रिफाइनरी कंपनियां अपनी जरूरत, तेल की गुणवत्ता, कीमत और जहाज से सप्लाई मिलने की संभावना के हिसाब से खरीद बदलती रहती हैं. अंगोला के Nemba, Dalia और Hungo जैसे कच्चे तेल के ग्रेड भारतीय रिफाइनरों के लिए पहले से जाने-पहचाने हैं. ऐसे में जरूरत बढ़ने पर वहां से खरीद बढ़ाना एक विकल्प हो सकता है.

गैबॉन, कांगो और लीबिया से भी लौटी तेल की खेपें

अंगोला अकेला देश नहीं है. गैबॉन, कांगो गणराज्य और लीबिया से भी भारत को तेल की खेपें पहुंची हैं. इन देशों से करीब तीन महीने के अंतराल के बाद सप्लाई आने की खबर इसलिए अहम है, क्योंकि इससे पता चलता है कि भारत की खरीद सिर्फ कुछ बड़े सप्लायरों तक सीमित नहीं है. हालांकि, इन तीनों देशों से अक्टूबर में कितने बैरल प्रतिदिन तेल आया, इसका अलग-अलग सत्यापित आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. इसलिए इनके आयात में कितनी बढ़ोतरी हुई, यह निश्चित रूप से कहना मुश्किल है.

गैबॉन पश्चिमी अफ्रीका में है, जबकि कांगो गणराज्य मध्य अफ्रीका के अटलांटिक तट पर बसा है. लीबिया उत्तर अफ्रीका में भूमध्यसागर के किनारे है. तीनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं में तेल की अहम भूमिका है, लेकिन भारत के साथ इनके व्यापार का आकार और स्वरूप अलग-अलग है.

भारत ने इन देशों से रिश्ते कैसे बनाए?

भारत और इन देशों के बीच कारोबार कोई आज की शुरुआत नहीं है. अंगोला के साथ भारत का व्यापार लंबे समय से तेल पर निर्भर रहा है. भारत वहां से कच्चा तेल खरीदता है, जबकि भारतीय कंपनियां दवाइयां, वाहन, मशीनरी और दूसरी वस्तुएं भी वहां बेचती हैं. नवंबर 2025 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के अंगोला दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक सहयोग पर भी जोर दिया गया था.

गैबॉन के साथ तो माइन‍िंग की भी डील

गैबॉन के साथ भारत के संबंध तेल से आगे बढ़कर खनन, दवाइयों, कृषि और कारोबार तक फैले हैं. कांगो गणराज्य के साथ भी पेट्रोलियम, धातुओं और भारतीय उत्पादों का व्यापार होता है. लीबिया के साथ भारत का रिश्ता ऊर्जा व्यापार के लिहाज से महत्वपूर्ण रहा है. लेकिन अक्टूबर में आई हर खेप को नई सरकारी डील का नतीजा मानना सही नहीं होगा. कच्चे तेल की खरीद कई बार कंपनियों के कारोबारी अनुबंधों के तहत होती है.

भारत से कितनी दूर हैं ये देश?

अंगोला, गैबॉन और कांगो गणराज्य अफ्रीका के अटलांटिक तट पर हैं. वहां से भारत आने वाले जहाजों को समुद्री रास्ते से अफ्रीका के दक्षिणी हिस्से के आसपास घूमकर हिंद महासागर की ओर आना पड़ सकता है. दूसरी ओर, लीबिया भूमध्यसागर के किनारे है. वहां से जहाज स्वेज नहर और लाल सागर के रास्ते भारत आ सकते हैं, हालांकि वास्तविक रास्ता जहाज और सुरक्षा परिस्थितियों पर निर्भर करता है.

इसलिए इन देशों से तेल मंगाने में सिर्फ तेल की कीमत नहीं देखी जाती. जहाज का भाड़ा, बीमा, समुद्री रास्ते की सुरक्षा और डिलीवरी में लगने वाला समय भी लागत तय करते हैं. कोई देश तेल दे सकता है, लेकिन अगर उसे भारत तक पहुंचाने में ज्यादा खर्च आए तो सौदा उतना फायदेमंद नहीं रह जाता.

वेस्‍ट एशिया तनाव के बीच ये कैसे बन गए भारत की जरूरत

भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदे गए कच्चे तेल से पूरा करता है. ऐसे में किसी एक क्षेत्र में युद्ध, समुद्री रास्तों में बाधा या उत्पादन में कमी आने पर तेल की सप्लाई प्रभावित हो सकती है. अलग-अलग देशों से तेल खरीदने का फायदा यह है कि किसी एक सप्लायर से आपूर्ति कम होने पर दूसरे विकल्प तलाशे जा सकते हैं.

अंगोला से बढ़ती खरीद और गैबॉन, कांगो व लीबिया से फिर आई खेपों को इसी नजर से देखना चाहिए. इसका मतलब यह नहीं कि भारत ने रूस या खाड़ी देशों से तेल खरीदना बंद कर दिया है. बल्कि भारतीय रिफाइनर जरूरत के हिसाब से अलग-अलग बाजारों में मौके तलाश रहे हैं.

भारत के लिए इन छोटे देशों की अहमियत उनकी आबादी से नहीं, बल्कि तेल की उपलब्धता और उसे भरोसेमंद तरीके से भारत तक पहुंचाने की क्षमता से तय होती है. दुनिया में तेल की सप्लाई पर दबाव बढ़े तो ऐसे देश भी भारत के लिए बड़े काम के साबित हो सकते हैं.



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