नई दिल्ली. वैश्विक कमर्शियल एविएशन में पिछले पांच दशकों से केवल दो ही कंपनियों का राज रहा है. अमेरिका की बोइंग और यूरोप की एयरबस. भारत की इंडिगो और एयर इंडिया से लेकर अमेरिकी, यूरोपीय और खाड़ी देशों की दिग्गज एयरलाइंस इन्हीं दो कंपनियों के विमान इस्तेमाल करती है. लेकिन, अब चीन ने इस ड्युओपोली की नींव हिलाने की ढानी है. चीन की सरकारी एयरोस्पेस कंपनी कमर्शियल एयरक्राफ्ट कॉर्पोरेशन ऑफ चाइना (COMAC) का बनाया नैरो-बॉडी यात्री विमान C919 बोइंग और एयरबस को चुनौती देने को तैयार है. यह इस साल अगस्त से ही चीन और मंगोलिया के बीच उड़ रहा है. चीन से हांगकांग के बीच भी यह विमान काफी समय से उड़ान भर रहा है.
मंगोलिया के लिए सी919 की नियमित उड़ान शुरू करने के साथ ही चीन ने वैश्विक स्तर पर यह कड़ा संदेश दे दिया है कि वह केवल अपनी घरेलू सीमाओं तक सीमित रहने वाला नहीं है. लेकिन असली सवाल यह उठता है कि क्या मेड इन चाइना का लेबल लिए यह C919 सचमुच एयरबस और बोइंग के दशकों पुराने साम्राज्य को ध्वस्त कर सकता है, या यह चुनौती अभी सिर्फ कागजी दावों और राजनीतिक प्रचार तक सीमित है?
15 साल का सफर
चीन ने वर्ष 2008 में सी919 बनाने का काम शुरू किया. इसका सीधा मकसद ग्लोबल एविएशन मार्केट के सबसे लोकप्रिय और कमाऊ सेगमेंट यानी एयरबस A320 और बोइंग 737 सीरीज को सीधी टक्कर देना था. दिसंबर 2011 में इसका निर्माण शुरू हुआ और 2 नवंबर 2015 को पहला प्रोटोटाइप दुनिया के सामने आया. इसके बाद 5 मई 2017 को पहली टेस्ट फ्लाइट हुई और अंततः 29 सितंबर 2022 को चीनी उड्डयन नियामक (CAAC) से इसे टाइप सर्टिफिकेशन हासिल हुआ. 9 दिसंबर 2022 को चाइना ईस्टर्न एयरलाइंस को पहला कमर्शियल विमान सौंपा गया. 28 मई 2023 से चीन में इस विमान ने यात्री सेवाएं शुरू कीं.
फोटो : रॉयटर्स
C919 एक सिंगल-आइल (एक गलियारे वाला) नैरो-बॉडी जेट है-
- यात्री क्षमता: इसमें एक बार में 158 से लेकर 192 यात्रियों के बैठने की व्यवस्था है.
- उड़ान रेंज: यह विमान 4,075 किलोमीटर से लेकर 5,555 किलोमीटर तक की दूरी बिना रुके तय कर सकता है.
- उपयुक्तता: यह क्षेत्रीय, घरेलू और मध्यम दूरी की अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए उपयुक्त है.
क्यों सी919 के लिए अब है मौका
चीन का यह नया विमान ऐसे समय में अंतरराष्ट्रीय पटल पर आया है जब पश्चिमी एविएशन कंपनियां गंभीर आंतरिक और तकनीकी संकटों से जूझ रही हैं. अमेरिकी दिग्गज बोइंग पिछले कुछ वर्षों से सुरक्षा खामियों, गुणवत्ता नियंत्रण की विफलताओं और मैनेजमेंट संकट से जूझ रहा है. वहीं, एयरबस के पास ऑर्डर्स का इतना बड़ा अंबार लगा हुआ है कि कई एयरलाइंस को अपने विमानों की डिलीवरी के लिए 6 से 8 साल लंबा इंतजार करना पड़ रहा है. सप्लाई चेन की बाधाओं के कारण विमानों की समय पर डिलीवरी न होना एयरलाइंस के लिए सिरदर्द बन चुका है.
ऐसे संकट के समय में C919 एक व्यवहार्य, नए और अपेक्षाकृत सस्ते विकल्प के रूप में उभर सकता है. चीन दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा और सबसे तेजी से बढ़ता एविएशन बाजार है. चीनी सरकार ने अपनी तीन सबसे बड़ी सरकारी एयरलाइंस, एयर चाइना, चाइना ईस्टर्न और चाइना सदर्न को 100-100 विमानों के मेगा ऑर्डर देने का निर्देश देकर C919 की वित्तीय नींव मजबूत कर दी है. कोमैक को अब तक 1,000 से ज्यादा विमानों के ऑर्डर मिल चुके हैं. तिब्बत के अत्यधिक ऊंचे और दुर्गम ल्हासा गोंगगर एयरपोर्ट पर सुरक्षित लैंडिंग कराकर चीन ने इसके ‘प्लेटो मॉडल’ का भी लोहा मनवाया है. इस घरेलू मांग के जरिए चीन ने अपने विमानन बाजार में बोइंग और एयरबस के भविष्य के अरबों डॉलर के मुनाफे पर सीधा ताला लगा दिया है.
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गरीब देशों पर नजर
चीन की नजर एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों पर है. कंबोडिया, इंडोनेशिया, नाइजीरिया जैसे देशों के पास पश्चिमी कंपनियों के महंगे विमान खरीदने का भारी बजट नहीं होता. चीन अपनी ‘कर्ज और बुनियादी ढांचा कूटनीति’ के तहत इन देशों को आसान शर्तों पर C919 विमान, सस्ते लोन और मेंटेनेंस पैकेज की पेशकश कर रहा है. इससे चीन न केवल व्यावसायिक मुनाफा कमाएगा, बल्कि उन देशों पर अपना रणनीतिक और कूटनीतिक शिकंजा भी कस सकेगा.
आसान नहीं है C919 की राह
ऊपरी तौर पर C919 की कामयाबी जितनी चमकदार दिखती है, तकनीकी धरातल पर उसकी हकीकत उतनी ही पेचीदा है. भले ही इस पर मेड इन चाइना का ठप्पा लगा हो, लेकिन विमान की ‘आत्मा’ आज भी पूरी तरह पश्चिमी तकनीक पर टिकी हुई है. किसी भी आधुनिक जेट का सबसे संवेदनशील हिस्सा उसका इंजन और फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम होता है. C919 में लगा LEAP-1C जेट इंजन CFM इंटरनेशनल’ बनाती है, जो अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक (GE Aerospace) और फ्रांस की सफ्रान (Safran) का संयुक्त उपक्रम है. विमान का कॉकपिट एवियोनिक्स, फ्लाइट कंट्रोल, नेविगेशन, लैंडिंग गियर और टायर जैसी संवेदनशील तकनीक अमेरिकी कंपनियों जैसे हनीवेल (Honeywell), रॉकवेल कॉलिन्स और पार्कर एयरोस्पेस से आती हैं.
यदि भविष्य में ताइवान मुद्दे या दक्षिण चीन सागर को लेकर अमेरिका-चीन के बीच भू-राजनीतिक तनाव चरम पर पहुंचता है, तो वाशिंगटन कड़े रक्षा व व्यापारिक प्रतिबंध लगाकर इंजन और स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति रोक सकता है. ऐसी स्थिति में चीन के C919 प्रोजेक्ट के पंख रातों-रात कट जाएंगे और विमानों का उत्पादन ठप हो सकता है.
अंतरराष्ट्रीय लाइसेंस न होना
चीनी विमान के सामने दो बड़ी चुनौतियां भी हैं. C919 के पास चीन के CAAC का सुरक्षा प्रमाण पत्र तो है, लेकिन इसे अभी तक अमेरिकी फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन (FAA) या यूरोपियन एविएशन सेफ्टी एजेंसी (EASA) से क्लीयरेंस नहीं मिला है. जब तक यह अंतरराष्ट्रीय सेफ्टी लाइसेंस नहीं मिलता, तब तक C919 न तो अमेरिका और यूरोप के आसमान में उड़ सकता है, और न ही वैश्विक स्तर की शीर्ष एयरलाइंस इसे खरीदने का जोखिम उठा सकती हैं.
अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस केवल विमान की शुरुआती कीमत देखकर खरीदारी नहीं करतीं. उनके लिए सबसे जरूरी होता है मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहाल नेटवर्क. अगर किसी एयरलाइन का बोइंग या एयरबस विमान दुनिया के किसी भी कोने में तकनीकी खराबी का शिकार होता है, तो 24 से 48 घंटे के भीतर उसके स्पेयर पार्ट्स और इंजीनियर्स वहां पहुंच जाते हैं. कोमैक के पास चीन के बाहर ऐसा कोई विश्वसनीय सर्विस नेटवर्क, वेयरहाउसिंग या लॉजिस्टिक्स ढांचा मौजूद नहीं है.
ड्रैगन खेल रहा लॉन्ग टर्म गेम
C919 रातों-रात बोइंग या एयरबस को बाजार से बाहर नहीं फेंक सकता और न ही तुरंत उनके 90% से अधिक वैश्विक बाजार शेयर को छीन सकता है. खुद कोमैक का आधिकारिक लक्ष्य भी वर्ष 2045 तक वैश्विक कमर्शियल एविएशन में महज 5% हिस्सेदारी हासिल करने का है. लेकिन इसे केवल एक साधारण शुरुआत मानकर खारिज करना भूल होगी. चीन का गेम-प्लान हमेशा ‘लॉन्ग टर्म’ यानी दशकों की रणनीति पर आधारित होता है.