महिला ने हाथ पर कलश रख किया 9 दिन तक निर्जला उपवास, अंधविश्वास के आगे डॉक्टर भी फेल, हुई मौत

महिला ने हाथ पर कलश रख किया 9 दिन तक निर्जला उपवास, अंधविश्वास के आगे डॉक्टर भी फेल, हुई मौत


बिहार के सुपौल जिले से एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जहां एक महिला ने नवरात्रि के दौरान नौ दिनों तक हाथ पर कलश रखकर निर्जला उपवास किया. बताया जा रहा है कि महिला दूसरे ही दिन बीमार पड़ गई थी, लेकिन डॉक्टरों की सलाह के बावजूद उसने व्रत तोड़ने से इनकार कर दिया. आखिरकार उसकी मौत हो गई.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, महिला ने अपने पिता के ठीक होने के बाद मन्नत के तौर पर नौ दिनों तक उपवास रखने का संकल्प लिया था. इसी के तहत वह नवरात्रि के दौरान हाथ पर कलश रखकर पूजा कर रही थी. इस दौरान उसकी तबीयत बिगड़ गई और डॉक्टरों ने उसे व्रत तोड़ने की सलाह दी, लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ी रही. महिला के हार्ट और पल्स रेट अचानक से गिरने लगे थे, लेकिन इसके बावजूद वह अपना उपवास पूरा करना चाहती थी. प्रशासन ने उसे समझाने की भी कोशिश की, लेकिन वह व्रत तोड़ने के लिए तैयार नहीं हुई, जिस वजह से उसकी मौत हो गई.

महिला की पहचान 35 साल की सचिता के रूप में हुई है. परिजनों के अनुसार, सचिता देवी नवरात्र के पहले दिन से ही त्रिवेणीगंज बाजार स्थित दुर्गा मंदिर परिसर में छाती पर कलश रखकर पूजा कर रही थीं. नौ दिनों तक चले धार्मिक अनुष्ठान के पूरा होने के बाद मंगलवार, 20 अक्टूबर को वह घर लौटी थीं. घर लौटने के बाद रात में अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई. कुछ समय बाद उन्हें थोड़ी राहत महसूस हुई, लेकिन बुधवार सुबह यानी 21 अक्टूबर को फिर सीने में दर्द होने लगा. इसके बाद परिजन उन्हें त्रिवेणीगंज अनुमंडलीय अस्पताल लेकर पहुंचे. वहां डॉक्टरों ने जांच के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया.

आस्था के नाम पर सेहत को जोखिम में डालना कितना सही?

धार्मिक आस्था व्यक्ति का निजी विश्वास है, लेकिन किसी भी अनुष्ठान के दौरान अपनी सेहत को नजरअंदाज करना गंभीर हो सकता है. लंबे समय तक पानी नहीं पीने से डिहाइड्रेशन और इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन हो सकता है. वहीं, पहले से हार्ट पेशेंट से जूझ रहे लोगों के लिए कठिन उपवास जोखिम बढ़ा सकता है. अगर डॉक्टर किसी बीमारी या लक्षण के कारण उपवास रोकने की सलाह देते हैं, तो उसे गंभीरता से लेना चाहिए. सीने में दर्द, सांस लेने में परेशानी, बेहोशी या अचानक कमजोरी होने पर तुरंत चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए.

शरीर को दर्द देने के लिए नहीं कहता भगवान

आस्था का मतलब खुद को तकलीफ देना नहीं, बल्कि मन की शांति और विश्वास के साथ ईश्वर से जुड़ना है. भगवान कभी नहीं चाहते कि इंसान अपनी सेहत को खतरे में डालकर भक्ति करे. व्रत, पूजा और मन्नत तभी सार्थक हैं, जब उनके साथ विवेक और अपनी सेहत का भी ध्यान रखा जाए. श्रद्धा के नाम पर शरीर को दर्द देना या डॉक्टरों की सलाह को नजरअंदाज करना भक्ति नहीं है. ईश्वर के प्रति सच्चा विश्वास जीवन की रक्षा करने और उसे बेहतर बनाने में है, न कि खुद को कष्ट देने में.



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