भारतीय इतिहास के पन्नों में जब-जब अदम्य साहस, देशप्रेम और अंग्रेजों की चूलें हिला देने वाले पराक्रम का जिक्र होता है, तब-तब नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज यानी इंडियन नैशनल आर्मी (INA) का नाम सबसे पहले आता है. दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भारत को आर-पार की आजादी दिलाने के लिए खड़ी की गई यह फौज केवल एक सेना नहीं थी, बल्कि यह भारत के करोड़ों देशवासियों के स्वाभिमान की आवाज थी. नेताजी ने साल 1943 में 21 अक्टूबर यानी आज ही के दिन 83 साल पहले को आजाद हिंद फौज क्यों बनाई, इसकी जरूरत क्यों पड़ी? इसका गठन कैसे हुआ और बैंक-करेंसी से लेकर इसे किन-किन देशों से मान्यता मिली थी?
आजाद हिंद फौज की जरूरत क्यों पड़ी?
1939 में जब दूसरा वर्ल्ड वार शुरू हुआ तो उस समय भारत ब्रिटिश हुकूमत का गुलाम था. अंग्रेजों ने बिना भारतीयों की सहमति के देश को युद्ध में झोंक दिया था. इस बात से नाराज कांग्रेस और देश के कई बड़े नेता ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बड़े आंदोलन की तैयारी कर रहे थे. महात्मा गांधी का ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन और अंग्रेजों का दमन शुरू हुआ था. 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ. अंग्रेजों ने क्रूरता से इस आंदोलन को कुचल दिया और देश के बड़े नेताओं को जेल में डाल दिया.
सुभाष चंद्र बोस का सोचना था कि अंग्रेजों से निवेदन करके या केवल अहिंसक आंदोलनों से आजादी पाना बहुत मुश्किल होगा. उनका स्पष्ट मत था कि तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा. सशस्त्र क्रांति की जरूरत बर फोकस किया. नेताजी का ऐसा मानना था कि अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने के लिए एक सुसज्जित और अनुशासित सैन्य बल की जरूरत है, जो ब्रिटिश सेना को उसी की भाषा में हथियारों और युद्ध में जवाब दे सके. इसी दूरदर्शिता के साथ उन्होंने विदेशों में रहकर भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने का बीड़ा उठाया.
कैसे बनी आजाद हिंद फौज?
आजाद हिंद फौज की स्थापना की पटकथा जापान और साउथ ईस्ट एशिया में लिखी गई थी. आजाद हिंद फौज का विचार सबसे पहले ब्रिटिश सेना के कैप्टन मोहन सिंह के मन में आया था. जापान की तरफ से युद्धबंदी बनाए गए भारतीय सैनिकों को लेकर उन्होंने दिसंबर 1941 में ‘इंडियन नेशनल आर्मी’ की शुरुआती नींव रखी थी. लेकिन कुछ जापानी सेना के साथ मतभेदों के चलते यह अभियान कुछ समय के लिए धीमा पड़ गया.
सुभाष चंद्र बोस 1943 में जर्मनी से पनडुब्बी के जरिए खतरनाक सफर तय करते हुए जापान के नियंत्रण वाले सिंगापुर पहुंचे. नेताजी की एंट्री हुई और उन्होंने कमान संभाल ली. जुलाई 1943 में रास बिहारी बोस ने आजाद हिंद फौज की पूरी कमान नेताजी को सौंप दी. नेताजी ने सिंगापुर में आरजी हुकूमत-ए-आजाद हिंद की स्थापना 21 अक्टूबर 1943 को की.
इसका मतलब होता है- स्वतंत्र भारत की अनंतिम सरकार. इस सेना में ना केवल युद्धबंदी भारतीय सैनिक शामिल हुए, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे मलाया, बर्मा, सिंगापुर में रह रहे आम भारतीय प्रवासियों, रसोइयों, दुकानदारों और मजदूरों ने भी अपनी गाढ़ी कमाई और जेवर दान कर दिए. महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए लक्ष्मी सहगल की अगुवाई में ‘झांसी की रानी रेजिमेंट’ बनाई गई, जो दुनिया की चुनिंदा महिला फाइटर्स यूनिट में से एक थी.
कैसे काम करती थी आजाद हिंद फौज?
आजाद हिंद फौज एक बेहद अनुशासित और राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत सेना थी. यह मुख्य रूप से इन तरीकों से काम करती थी. फौज का सबसे प्रसिद्ध नारा ‘चलो दिल्ली’ था. नेताजी का लक्ष्य बर्मा (अब म्यांमार) के रास्ते भारत में प्रवेश कर दिल्ली के लाल किले पर तिरंगा फहराना था.
INA की तीन प्रमुख ब्रिगेड है. फौज के अंदर सैनिक टुकड़ियों के नाम देश के महान नायकों के नाम पर रखे गए थे. गांधी ब्रिगेड, नेहरू ब्रिगेड, सुभाष ब्रिगेड. आजाद हिंद फौज ने जापानी सेना के सहयोग से बर्मा के जंगलों और इम्फाल-कोहिमा मोर्चे पर अंग्रेजों के खिलाफ भीषण युद्ध लड़ा. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को अंग्रेजों से मुक्त कराकर नेताजी ने इनका नाम ‘शहीद द्वीप’ और ‘स्वराज द्वीप’ रखा था.
अपनी बैंक, अपनी करेंसी और दुनिया में मान्यता
आजाद हिंद फौज केवल एक सैन्य टुकड़ी नहीं थी, बल्कि यह एक समानांतर सरकार की तरह काम करती थी, जिसके पास अपनी प्रशासनिक व्यवस्था, बैंक और करेंसी थी. इनमें सबसे पहली तो आजाद हिंद बैंक थी. सरकार के वित्तीय कार्यों को संभालने और युद्ध के लिए चंदा जुटाने के लिए सिंगापुर में आजाद हिंद बैंक की स्थापना की गई थी. इस बैंक ने देश-विदेश के भारतीयों से मिले दान और धन को मैनेज किया.
आजाद हिंद सरकार ने अपनी खुद की करेंसी भी जारी की थी. इन नोटों और सिक्कों पर रानी लक्ष्मीबाई और स्वतंत्रता संग्राम के प्रतीक चिन्ह छपे होते थे. जिन क्षेत्रों पर INA का कंट्रोल था, वहां यही करेंसी चलती थी. इसके अलावा, सरकार के पास अपने डाक टिकट भी थे.
किन-किन देशों से मिली मान्यता?
नेताजी की तरफ से बनाई गई आरजी हुकूमत-ए-आजाद हिंद यानी अस्थायी सरकार को दुनिया के कई देशों ने आधिकारिक तौर पर मान्यता दी थी. उस समय एक्सिस पॉवर्स और उनके सहयोगियों सहित कुल 9 देशों ने इसे मान्यता दी थी. इनमें प्रमुख देश जापान, जर्मनी, इटली, क्रोएशिया, बर्मा, थाईलैंड, मंचूरिया, फिलीपींस और नानजिंग (चीन की प्रो-जापानी सरकार) शामिल थे.
इतिहास पर अमिट छाप
द्वितीय विश्वयुद्ध के अंत में जापान की हार और 1945 में एक विमान दुर्घटना में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के कथित रूप से लापता हो जाने के बाद आजाद हिंद फौज का सैन्य अभियान भले ही थम गया हो, लेकिन इसका असर बहुत दूरगामी रहा. जब ब्रिटिश सरकार ने लाल किले में आजाद हिंद फौज के पकड़े गए सैनिकों पर मुकदमा चलाया. इनमें शाहनवाज खान, प्रेम सहगल और गुरदयाल सिंह ढिल्लों शामिल थे. इसके बाद पूरे भारत में भूचाल आ गया.
इस फौज के प्रति देशवासियों का समर्थन देखकर अंग्रेजों को अहसास हो गया कि अब भारत पर ज्यादा दिन राज करना नामुमकिन है. इतिहासकार मानते हैं कि आजाद हिंद फौज के संघर्ष ने ही ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी थी. भारत की आजादी के रास्ते को सबसे अधिक तेजी से बढ़ाया था. इस फौज और सरकार के गठन के 4 साल के बाद भारत को अंग्रेजों से आजादी मिल गई.