Maldives-Pakistan Relations: मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू की पाकिस्तान यात्रा और दोनों देशों के बीच 20 समझौतों पर हस्ताक्षर ने हिंद महासागर क्षेत्र में नई रणनीतिक चर्चा छेड़ दी है. पाकिस्तान और मालदीव ने रक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और व्यापार जैसे क्षेत्रों में रिश्ते मजबूत करने का फैसला किया है. ऐसे में भारत की नजर इस बदलते समीकरण पर रहना स्वाभाविक है. खास बात यह है कि मालदीव समंदर के बीच में बसा देश है. यहां पर पाकिस्तान ने अपने राजदूत के तौर पर रिटायर्ड वाइस एडमिरल फैसल रसूल लोधी को नियुक्त किया है, जो पाकिस्तान की नौसेना में वरिष्ठ पद पर रह चुके हैं. साथ ही समुद्री मामलों का अनुभवी हैं.
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और राष्ट्रपति मुइज्जू की मौजूदगी में हुए इन समझौतों का दायरा काफी बड़ा है. दोनों देश अपने रिश्तों को सिर्फ कूटनीति और व्यापार तक सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि सुरक्षा से जुड़े मामलों में भी सहयोग बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. हालांकि समझौतों की पूरी डिटेल सामने नहीं आई है. वहीं मुइज्जू ने अपनी यात्रा के दौरान उर्दू में कहा, ‘हम आपकी नवाजिश के लिए शुक्रगुजार हैं.’
मोहम्मद मुइज्जू का पाकिस्तान में वेलकम. (X/MMuizzu)
भारत की नजर क्यों?
मालदीव हिंद महासागर में ऐसी जगह पर स्थित है, जहां से दुनिया के कई अहम समुद्री व्यापार मार्ग गुजरते हैं. इन रास्तों से तेल, जरूरी सामान और दूसरे व्यापारिक उत्पादों की आवाजाही होती है. इसलिए मालदीव के साथ किसी भी देश का समुद्री सुरक्षा सहयोग क्षेत्रीय रणनीति के लिहाज से अहम माना जाता है. पाकिस्तान और मालदीव के बीच हुए समझौतों में रक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा, पुलिस प्रशिक्षण और गैरकानूनी ड्रग्स की तस्करी रोकने जैसे मुद्दे शामिल हैं. सवाल यही है कि मुइज्जू ‘इंडिया आउट’ का नारा लगाकर सत्ता में आए थे. लेकिन क्या अब वह पाकिस्तान की सेना को मालदीव में एंट्री देने वाले हैं? दोनों देशों ने साइबर सुरक्षा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़े क्षेत्रों में जानकारी साझा करने और कानून लागू करने वाली एजेंसियों के बीच सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति जताई है.
भारत के लिए इस घटनाक्रम को समझना इसलिए जरूरी है, क्योंकि मालदीव उसके दक्षिण में हिंद महासागर के बीच स्थित है. भारत लंबे समय से मालदीव के साथ विकास, व्यापार और सुरक्षा के क्षेत्रों में सहयोग करता रहा है. ऐसे में पाकिस्तान की बढ़ती सक्रियता पर भारत की नजर होनी चहिए. हालांकि, केवल समझौतों पर हस्ताक्षर होने से यह नहीं माना जा सकता कि मालदीव भारत के खिलाफ पाकिस्तान के साथ आएगा. इन समझौतों का असली असर इस बात पर निर्भर करेगा कि उन्हें जमीन पर किस तरह लागू किया जाता है.
पाकिस्तान ने मालदीव में तैनात किया मिलिट्री चेहरा
इस पूरी कहानी में पाकिस्तान के राजदूत फैसल रसूल लोधी का नाम भी ध्यान खींचता है. दरअसल पाकिस्तान ने 17 ऐसे लोगों को राजदूत बनाया है, जिनका विदेश सेवा से कोई लेना-देना नहीं है. इनमें से 9 लोग पाकिस्तानी सेना के रिटायर्ड अधिकारी हैं. वाइस एडमिरल (रिटायर्ड) फैसल रसूल लोधी भी उन्हीं 9 लोगों में से एक हैं. उन्हें मालदीव का राजदूत बनाया गया है. वाइस एडमिरल पाकिस्तान की नौसेना का एक वरिष्ठ रैंक है. लोधी का सैन्य बैकग्राउंड और समुद्री मामलों से जुड़ा अनुभव ऐसे समय में अहम नजर आता है, जब पाकिस्तान और मालदीव समुद्री सुरक्षा और रक्षा सहयोग बढ़ाने की बात कर रहे हैं. यानी मालदीव में पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व करने वाला शख्स सिर्फ एक राजनयिक नहीं, बल्कि नौसेना का पूर्व वरिष्ठ अधिकारी भी है. यह तथ्य दोनों देशों के बीच समुद्री सहयोग की अटकलों को जोर देता है.
दो साल में 200 मिलियन डॉलर के व्यापार का लक्ष्य
रक्षा और समुद्री सुरक्षा के अलावा दोनों देशों ने आर्थिक रिश्ते बढ़ाने का भी लक्ष्य रखा है. रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान और मालदीव अगले दो साल में द्विपक्षीय व्यापार को 200 मिलियन डॉलर तक पहुंचाना चाहते हैं. इसके लिए पाकिस्तान की ट्रेडिंग कॉरपोरेशन और मालदीव की स्टेट ट्रेडिंग ऑर्गनाइजेशन के बीच कृषि उत्पादों और जरूरी खाद्य सामान की बड़ी मात्रा में खरीद-बिक्री को आसान बनाने से जुड़े समझौते किए गए हैं.
क्या भारत को चिंता करनी चाहिए?
भारत और मालदीव के रिश्तों में सुरक्षा का पहलू हमेशा महत्वपूर्ण रहा है. हिंद महासागर में समुद्री रास्तों की सुरक्षा, आपदा के समय मदद, तस्करी रोकने और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर दोनों देशों का सहयोग मायने रखता है. मालदीव में चीन के जहाज भी जब आते थे, तो भारत इसे लेकर भी चिंता जाहिर करता था. पाकिस्तान के साथ मालदीव के बढ़ते संपर्क को इसी बड़े क्षेत्रीय संदर्भ में देखा जा सकता है. मालदीव का दूसरे देशों के साथ संबंध बढ़ाना अपने आप में सामान्य है. मालदीव जैसे छोटे देशों के लिए व्यापार, सुरक्षा और विकास के अलग-अलग साझेदारों के साथ काम करना सामान्य कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है. फिर भी, रक्षा और समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में हुए समझौतों पर नजर रखना जरूरी है.