यूक्रेन में युद्ध के मैदान पर इलॉन मस्क की कंपनी ‘स्टारलिंक’ का सैटेलाइट कम्युनिकेशन बाधित हुआ, जिसकी जिम्मेदारी मस्क ने डोनाल्ड ट्रंप के मत्थे मढ़ दी. अमेरिकी राष्ट्रपति के दफ्तर वॉशिंगटन से लेकर कैलिफोर्निया में स्पेसएक्स के हेडक्वार्टर तक, इस मामले में एक-दूसरे पर सवाल उठाए जा रहे हैं. यूक्रेन की सेना ने बताया कि 14 अक्टूबर से उसके तेज रफ्तार ड्रोन और हवा में इस्तेमाल होने वाले दूसरे सैन्य उपकरणों पर लगे स्टारलिंक टर्मिनल अचानक काम करना बंद करने लगे. खास बात यह थी कि जैसे ही इन उपकरणों की रफ्तार 160 किलोमीटर प्रति घंटे यानी करीब 100 मील प्रति घंटे से ज्यादा होती, उनका कनेक्शन कट जाता था. यानी चलते युद्ध में तकनीक ने यु्क्रेन के हाथ बांध दिए. उधर रूसी सेना आगे बढ़ रही थी और इधर युक्रेन के बचाव के लिए भेजे जाने वाले ड्रोन हमला ही नहीं कर पा रहे थे.
Firstpost की रिपोर्ट बताती है कि स्टारलिंक के मालिक मस्क से जब सवाल पूछे गए तो उन्होंने सारा ठीकरा डोनाल्ड ट्रंप पर यह कहते हुए फोड़ा कि ये अमेरिकी सेना और राष्ट्रपति के कहने पर हुआ है. लेकिन अब सामने आई कुछ नई मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि स्पेसएक्स के CEO एलन मस्क ने खुद स्टारलिंक की स्पीड सीमित करने का आदेश दिया था. असल में स्टारलिंक की सैन्य सेवाओं से जुड़ी प्रणाली को स्टारशील्ड (Starshield) कहा जाता है. हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, रक्षा अधिकारियों और एलन मस्क के अलग-अलग बयानों के कारण अब भी यह साफ नहीं है कि इस फैसले का अंतिम आदेश किसने दिया और युद्ध के मैदान में संचार व्यवस्था बाधित होने के पीछे असल जिम्मेदारी किसकी थी.
यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की को ट्रंप ने दिया गच्चा. (रॉयटर्स)
यूक्रेन में स्टारलिंक के साथ क्या हुआ?
स्टारलिंक में आई इस गड़बड़ी की यूक्रेनी सेना को पहले से कोई जानकारी नहीं थी. इसके कारण लंबी दूरी तक निगरानी करने और रूसी सेना को निशाना बनाने वाले सैन्य अभियानों में रुकावट आई. यूक्रेन की राजधानी कीव में मौजूद सैन्य कमांडरों के मुताबिक, यह समस्या एक तय स्पीड लिमिट के रूप में सामने आई. यूक्रेन की तकनीकी टीमों ने पाया कि जैसे ही स्टारलिंक टर्मिनल से लैस कोई ड्रोन 160 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार पार करता, उसका डेटा कनेक्शन तुरंत टूट जाता था. यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के सैन्य तकनीक सलाहकार सर्गेई बेस्करेस्टनोव ने भी इसकी पुष्टि की. उन्होंने बताया कि इस समस्या के कारण मोर्चे पर चल रहे कई सैन्य अभियान नाकाम हो गए या उन्हें बीच में ही रोकना पड़ा.
यूक्रेन अपनी रक्षा के लिए तेज रफ्तार इंटरसेप्टर ड्रोन का इस्तेमाल करता है. ये ड्रोन रूस की ओर से भेजे जाने वाले आत्मघाती ड्रोन और मिसाइलों को रास्ते में ही रोकने के लिए बनाए गए हैं. इन्हें नियंत्रित करने में सैटेलाइट कम्युनिकेशन की अहम भूमिका होती है. स्टारलिंक की स्पीड पर पाबंदी लगने से यूक्रेन की सेना के सामने एक तरह का कम्यूनिकेशन ब्लाइंड स्पॉट बन गया. यानी कुछ इलाकों में सेना के पास दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने और ड्रोन को नियंत्रित करने की क्षमता प्रभावित हुई.
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स्टारलिंक की स्पीड कम करने का ऑर्डर किसका था, मस्क या ट्रंप?
शुरुआत में इस गड़बड़ी के पीछे अमेरिकी राष्ट्रपति कार्यालय का हाथ होने की आशंका जताई गई थी. पर द वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि स्टारलिंक के सैटेलाइट नेटवर्क की स्पीड और बैंडविड्थ सीमित करने का सीधा आदेश एलन मस्क ने दिया था. ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, मस्क ने यह फैसला अकेले नहीं लिया था. बताया गया कि उन्होंने स्पीड पर पाबंदी लगाने से पहले और इसे लागू किए जाने के तुरंत बाद ट्रंप प्रशासन के कई वरिष्ठ अधिकारियों से बातचीत की थी. इन चर्चाओं में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी शामिल थे.
मस्क और ट्रंप ने क्या कहा?
मस्क पहले सोशल मीडिया और सार्वजनिक बयानों में कह चुके हैं कि स्टारशील्ड की स्पीड लिमिट, संचालन की शर्तों और पहुंच से जुड़े फैसले लेने का अधिकार अमेरिकी राष्ट्रपति और रक्षा विभाग के पास है.
डोनाल्ड ट्रंप ने पत्रकारों से कहा कि उन्हें नहीं पता कि युद्ध के मैदान में संचार बाधित करने का आदेश किसने दिया. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि वह इस बारे में पता लगाना चाहेंगे. ट्रंप ने यह मानने से भी इनकार किया कि इसके लिए सीधे तौर पर वह या मस्क जिम्मेदार थे. अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा कि वॉशिंगटन ने यूक्रेन की स्टारलिंक तक पहुंच पूरी तरह खत्म नहीं की है. उनके बयान से संकेत मिला कि समस्या का संबंध सैन्य और व्यावसायिक इस्तेमाल की तय शर्तों से हो सकता है, जिनका पालन यूक्रेन को करना था.
मस्क ने कहा कि स्टारशील्ड की स्पीड लिमिट, संचालन की शर्तों और पहुंच से जुड़े फैसले लेने का अधिकार अमेरिकी राष्ट्रपति और रक्षा विभाग के पास है. (रॉयटर्स)
वहीं भारत आए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने उन दावों को खारिज किया कि व्हाइट हाउस ने एकतरफा आदेश जारी करके यूक्रेनी सेना को निशाना बनाया था. इस तरह, इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि फैसला लेने का कानूनी अधिकार किसके पास था और जमीन पर तकनीकी पाबंदी लगाने का सीधा आदेश किसने दिया.
इस घटना ने कई देशों के लिए नई बहस और चिंता पैदा की है. आज के युद्ध में जब सेनाएं किसी प्राइवेट कंपनी की टेक्नेलॉजी का इस्तेमाल करती हैं तो क्या किसी अरबपति बिजनेसमैन का फैसला उसकी दिशा तय कर सकता है?
यूक्रेन में स्टारलिंक की स्पीड कम करने के पीछे की वजह क्या है?
विशेषज्ञों के मुताबिक, इस घटना से पहले अमेरिका और यूक्रेन के बीच कूटनीतिक तनाव काफी बढ़ गया था. ये टेंशन तब ज्यादा बढ़ी जब युक्रेन ने रूस की तेल रिफाइनरियों और ईंधन डिपो पर ड्रोन हमले किए. 10 अक्टूबर को ट्रंप ने यूक्रेन की सैन्य रणनीति पर नाराजगी जताई थी. ट्रंप ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा था, ‘आप रूस के साथ जो करना चाहते हैं, कर सकते हैं, लेकिन उसकी तेल रिफाइनरियों पर हमला मत कीजिए, क्योंकि यह पूरी दुनिया के लिए समस्या बन सकती है.’ ट्रंप ने कहा कि उन्होंने जेलेंस्की से इस बारे में बात की थी, लेकिन इसके बावजूद यूक्रेन ने रूस के डीजल ईंधन से जुड़े ठिकानों पर हमला किया. ट्रंप ने नाराजगी जताते हुए कहा कि जेलेंस्की को ऐसा करना बंद कर देना चाहिए. इसी घटना के 4 दिन बाद ये गड़बड़ियां सामने आईं.
स्टारलिंक को लेकर इतना बड़ा विवाद क्यों है?
आमतौर पर हथियार और सैन्य उपकरण बनाने वाली कंपनियां सरकारों के साथ तय कानूनी नियमों और अनुबंधों के तहत काम करती हैं. लेकिन स्पेसएक्स के स्टारलिंक जैसे विशाल सैटेलाइट नेटवर्क के मामले में तकनीक, कारोबार और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संबंध कहीं ज्यादा जटिल हैं.
अमेरिकी रक्षा विभाग ने सरकारी और सैन्य संचार के लिए स्टारशील्ड की सेवाएं ली हैं. इसके बावजूद, सैटेलाइट टर्मिनलों के सॉफ्टवेयर, तकनीकी प्रोटोकॉल, स्पीड सीमित करने और किसी खास क्षेत्र में सेवा उपलब्ध कराने या रोकने जैसे कई तकनीकी फैसलों में स्पेसएक्स की अहम भूमिका है. यही इस विवाद की सबसे बड़ी चिंता है. जब किसी देश की सेना कम्यूनिकेशन के लिए प्राइवेट कंपनी पर निर्भर हो जाती है, तो कंपनी की तकनीकी नीतियों, सरकार के साथ उसके संबंधों या अनुबंध की शर्तों में बदलाव से युद्ध के मैदान पर असर पड़ सकता है. एक बड़ा सवाल ये भी है कि क्या किसी निजी कंपनी के पास इतनी ताकत होनी चाहिए कि उसके तकनीकी फैसले युद्ध लड़ रहे देश की सैन्य क्षमता को प्रभावित कर सकें?