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विजयदशमी के मौके पर रावण दहन किया जाता है, लेकिन सतना में एक ऐसा गांव है, जहां रावण की पूजा की जाती है. यहां रावण का पुतला नहीं बनाया जाता, बल्कि रावण की एक मूर्ति 300 साल पहले से ही स्थापित है. दशहरे के मौके पर इस मूर्ति की रक्षा करनी पड़ती है. रावण की पूजा करने वाले पुजारी ने रमेश मिश्रा इसके बारे में विस्तार से बताया है.
कोठी थाना में स्थापित रावण की प्रतिमा. (फाइल फोटो)
सतना. नवरात्रि के 9 दिन के बाद देश भर में आज विजयदशमी का जश्न मनाया जा रहा है. रावण दहन के साथ इसका समापन होगा. पुलिस और प्रशासन मुस्तैदी से लोगों की सुरक्षा में तैनात है. लेकिन मध्य प्रदेश के सतना जिले का एक पुलिस थाना कुछ अलग ही काम करता है. यहां की पुलिस रावण की रक्षा करती है. क्योंकि यहां के लो रावण की पूजा करते है. रावण की मूर्ति कोठी पुलिस थाने में ही है. यह 25 फुट ऊंची और 22 फुट चौड़ी है. माना जाता है कि यह कम से कम 300 साल पुरानी है. यहां एक पुजारी परिवार की कई पीढ़ियां दशहरा पर पूजा-पाठ करती आ रही हैं.
रावण के आम तौर पर देखे जाने वाले 10 सिरों के रूप से अलग, इस मूर्ति में रावण के 9 सिर हैं. स्थानीय लोगों का मानना है कि उसने अपना एक सिर भगवान शिव को अर्पित कर दिया था, जिसके कारण उसे यह अनोखा रूप मिला, जिसमें यहाँ उसकी पूजा की जाती है. हालाँकि यह मूर्ति पुलिस थाने के बनने से सदियों पुरानी है, लेकिन लगभग 19 साल पहले जब नया पुलिस थाना बना, तब से यह उसी के परिसर के अंदर है.
टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, 56 साल के पुजारी रमेश मिश्रा कहे हैं, “यह मूर्ति लगभग 300 साल पहले स्थानीय शासकों ने बनवाई थी. मेरे पूर्वज कोठी के शासकों के दरबार में राजपुरोहित थे और तब से ही वे इस मूर्ति की पूजा करते आ रहे हैं. मुझे अपने पूर्वजों की कम से कम चार पीढ़ियां याद हैं, जिन्होंने यहां पूजा-पाठ किया है. मेरे पिता, दादा और परदादा ने दशहरा पर इसकी पूजा की थी, और अब मैं इस परंपरा को आगे बढ़ा रहा हूं.” यह परंपरा एक स्थानीय लोककथा से जुड़ी है, जो इस इलाके को रामायण से जोड़ती है.
माना जाता है कि यहां रावण की और भी मूर्तियां मौजूद हैं. रमेश मिश्रा ने बताया कि उन्होंने अपने पूर्वजों से सुना था कि कभी इस मूर्ति के पास एक छोटी नदी बहती थी, जिसके दूसरे किनारे पर एक ‘राम चबूतरा’ था. कोठी के शासक वहां रामलीला का आयोजन करते थे, जिसमें भगवान राम नदी के उस पार से रावण की मूर्ति पर प्रतीकात्मक रूप से तीर चलाते थे. नदी पर बने एक पुल को ‘राम सेतु’ माना जाता था, जबकि रावण की तरफ की ज़मीन को स्थानीय लोग ‘लंका’ कहते थे.
रमेश मिश्रा ने एक और स्थानीय लोककथा का ज़िक्र किया, जिसके अनुसार रावण ने उस जंगल की सीमाओं पर अपने जासूस तैनात कर रखे थे, जहां भगवान राम ने चित्रकूट में अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा बिताया था. उन्होंने बताया कि उमरिया जिले के चित्रकूट और पाली में भी रावण की ऐसी ही मूर्तियां मौजूद हैं. इस साल इस इलाके में 20 अक्टूबर को दशहरा है, ऐसे में रमेश और उनका परिवार एक बार फिर इस मूर्ति के सामने पूजा-पाठ करेगा. यह मूर्ति एक पुलिस थाने के अंदर है, जो अपने आप में एक अनोखी बात है, क्योंकि यह थाना उस रावण की रक्षा करता है, जिसे देश के ज्यादातर हिस्सों में लोग जलाते हैं.