ढोल-दमाऊं, तलवार-ढाल और रंगीन पोशाक…कभी छोलिया के बिना उत्तराखंड में अधूरे थे समारोह, आज कलाकारों के सामने रोजी का संकट

ढोल-दमाऊं, तलवार-ढाल और रंगीन पोशाक…कभी छोलिया के बिना उत्तराखंड में अधूरे थे समारोह, आज कलाकारों के सामने रोजी का संकट


नैनीताल: उत्तराखंड की लोक संस्कृति और खासकर कुमाऊं की पहचान माने जाने वाले छोलिया नृत्य की चमक अब धीरे-धीरे फीकी पड़ती नजर आ रही है. कभी पहाड़ के विवाह समारोहों, धार्मिक आयोजनों और बड़े उत्सवों में छोलिया दल की मौजूदगी प्रतिष्ठा का विषय मानी जाती थी, लेकिन बदलते समय के साथ इस लोककला के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है. कलाकारों का कहना है कि कार्यक्रम कम होने से उनकी आमदनी प्रभावित हुई है, वहीं सरकारी संरक्षण और आर्थिक सहायता की घोषणाओं का लाभ भी उन्हें अपेक्षित रूप से नहीं मिल पाया है.

ढोल-दमाऊं की थाप, पारंपरिक वेशभूषा और तलवार-ढाल के साथ किया जाने वाला छोलिया नृत्य कुमाऊं की लोक परंपराओं का अहम हिस्सा रहा है. पीढ़ियों से कलाकार इस कला को आगे बढ़ाते आए हैं. लेकिन अब कई कलाकार परिवार चलाने के लिए दूसरे कामों की तलाश करने को मजबूर हैं. कलाकारों की चिंता सिर्फ रोजगार तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें डर है कि यदि नई पीढ़ी इस परंपरा से नहीं जुड़ी तो आने वाले समय में छोलिया दलों की संख्या और कम हो सकती है.

तीन पीढ़ियों से नयना देवी मंदिर से जुड़ा परिवार

पिथौरागढ़ जिले के पांखूं गांव से अपने छोलिया दल के साथ नैनीताल पहुंचे भगत राम बताते हैं कि उनके परिवार की तीन पीढ़ियां छोलिया परंपरा से जुड़ी रही हैं. उनके दादाजी नयना देवी मंदिर आते थे, इसके बाद उनके पिता ने यह परंपरा आगे बढ़ाई और अब वह खुद नैनीताल पहुंच रहे हैं. भगत राम के मुताबिक, वह पिछले करीब 30 वर्षों से नैनीताल स्थित मां नयना देवी मंदिर में आरती के दौरान छोलिया दल के साथ प्रस्तुति देते आ रहे हैं. हर साल वह अपना ढोल लेकर नैनीताल पहुंचते हैं. उनका कहना है कि इसी काम से उनके परिवार का खर्च चलता है, लेकिन अब शादी-ब्याह में भी छोलिया दलों को पहले की तरह नहीं बुलाया जाता. उन्होंने बताया कि कार्यक्रमों में कमी के कारण उनकी आमदनी प्रभावित हुई है.

नई पीढ़ी भी इस काम में पहले जैसी रुचि नहीं दिखा रही है. भगत राम का कहना है कि कलाकारों को पेंशन और सरकारी सहायता मिलने की उम्मीद लंबे समय से है. उनके अनुसार, उन्होंने देहरादून जाकर कई बार पेंशन के लिए प्रयास किए, लेकिन अभी तक उन्हें पेंशन नहीं मिली. उनका यह भी दावा है कि कई सरकारी कार्यक्रमों में प्रस्तुति की भुगतान राशि भी उन्हें अब तक नहीं मिली है.

‘पोशाक तक खुद तैयार करवाते हैं कलाकार’

भगत राम बताते हैं कि छोलिया कलाकारों को अपनी पारंपरिक पोशाक भी खुद ही तैयार करवानी पड़ती है. उनका कहना है कि यदि सरकार छोलिया कलाकारों के लिए स्पष्ट नीति बनाए, नियमित आर्थिक सहायता दे और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए तो कलाकार अपने परिवार का बेहतर तरीके से भरण-पोषण कर सकते हैं. उनका कहना है कि छोलिया केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह कुमाऊं की सांस्कृतिक विरासत है. इसे बचाने के लिए कलाकारों को सम्मान और आर्थिक सुरक्षा दोनों की जरूरत है.

‘पीढ़ियों से कर रहे हैं काम, फिर भी नहीं मिली पेंशन’

छोलिया कलाकार किशन राम भी सरकारी सहायता नहीं मिलने की बात कहते हैं. उनका कहना है कि वह पीढ़ियों से इस लोककला से जुड़े हुए हैं और इसी काम से उनके परिवार का घर चलता है. उनके अनुसार, अभी तक उन्हें न तो पेंशन मिली है और न ही किसी सरकारी योजना का पर्याप्त लाभ. किशन राम सरकार से मांग करते हैं कि छोलिया कलाकारों के लिए उचित पेंशन, आर्थिक सहायता और अन्य जरूरी सुविधाओं की व्यवस्था की जाए, ताकि कलाकार इस परंपरा को मजबूरी में छोड़ने के बजाय सम्मान के साथ आगे बढ़ा सकें.

49 कलाकारों के चयन के बाद भी आगे नहीं बढ़ी प्रक्रिया

ओखलकांडा से नैनीताल पहुंचे छोलिया दल का नेतृत्व कर रहे नारायण राम ने भी सरकारी योजनाओं को लेकर अपनी चिंता जाहिर की. उनका कहना है कि उत्तराखंड सरकार की ओर से ढोल-दमाऊं बजाने वाले लोक कलाकारों के लिए आर्थिक सहायता से जुड़ी योजना की बात सामने आई थी. उनके मुताबिक, इसके तहत जिले से 49 कलाकारों का चयन भी किया गया था और कई स्तरों पर सत्यापन की प्रक्रिया पूरी हुई, लेकिन इसके बाद प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई. नारायण राम बताते हैं कि, इससे कलाकारों में निराशा पैदा हुई है. उनका कहना है कि पहाड़ में धीरे-धीरे छोलिया संस्कृति से जुड़े कलाकारों की संख्या कम हो रही है और यदि समय रहते संरक्षण के ठोस उपाय नहीं किए गए तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों पर पड़ेगा.

आधुनिक मनोरंजन के बीच परंपरा बचाने की चुनौती

कलाकारों के मुताबिक, मोबाइल, डीजे और आधुनिक मनोरंजन के बढ़ते चलन ने भी पारंपरिक लोककलाओं के अवसरों को प्रभावित किया है. पहले विवाह समारोहों और सामाजिक आयोजनों में छोलिया दलों को विशेष रूप से बुलाया जाता था, लेकिन अब कई आयोजनों में उनकी जगह आधुनिक मनोरंजन के साधनों ने ले ली है. कलाकारों की मांग है कि छोलिया दलों को सरकारी और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में नियमित अवसर दिए जाएं, कलाकारों के लिए पेंशन और आर्थिक सहायता की व्यवस्था हो, लंबित भुगतान का समाधान किया जाए और नई पीढ़ी को प्रशिक्षण देकर इस परंपरा से जोड़ा जाए. छोलिया की ढोल-दमाऊं की थाप आज भी कुमाऊं की पहचान को जीवंत करती है.



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