आलू जैसे चंद्रमा पर क्या करने जा रहा जापान? जहां पहुंचने में लग जाएगा एक साल
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जापान की स्पेस एजेंसी JAXA मंगल ग्रह के मून पर एक विशेष मिशन लॉन्च कर रही है. इसका टारगेट फोबोस से मिट्टी वापस लाना है, ताकि उस पर रिसर्च हो सके. मिशन की समय-सीमा तकरीबन पांच साल रखी गई है. मंगल ग्रह का यह मून बिल्कुल आलू के आकार का है. इसीलिए इसे आलू जैसा मून भी कहा जाता है.
मंगल का चंद्रमा फोबोस आलू की तरह दिखता है. (फोटो- NASA)
जापान की स्पेस एजेंसी JAXA एक खास मिशन लॉन्च करने जा रही है. मिशन का टारगेट आलू जैसे चंद्रमा पर पहुंचना है और 3 साल तक वहां रिसर्च कर मिट्टी के नमूने लेकर लौटना है. सबसे खास बात ये है कि यहां पहुंचने और लोटने में ही एक-एक साल का समय लग सकता है. दरअसल यह आम चंद्रमा नहीं बल्कि मंगल ग्रह का चंद्रमा फोबोस है. इसे आलू की तरह इसलिए बताया जाता है क्योंकि इसका आकार सामान्य नहीं है. यह आलू की तरह ही ऊबड़ खाबड़ है.
मंगल ग्रह के दो चंद्रमा हैं, पहला फोबोस है और दूसरा डीमोस. जापान यह पता लगाने की कोशिश में आखिर ये चंद्रमा कैसे बने. इसके लिए स्पेस एजेंसी मार्टियन मून्स एक्सप्लोरेशन MMX लॉन्च कर रही है. इसके तहत फोबोस की मिट्टी लाई जाएगी. दरअसल अमेरिका चीन समेत दुनिया की कई स्पेस एजेंसियों की नजर मंगल ग्रह पर है. ऐसे में जापान ये संभावना तलाशने की कोशिश कर रहा है कि अगर मंगल ग्रह के चंद्रमा के ही बेस के तौर पर इस्तेमाल किया जाए तो मंगल ग्रह के बारे में ज्यादा पता लगाया जा सकेगा.
कैसा है फोबोस, जहां जा रही JAXA?
अमेरिकन स्पेस एजेंसी NASA के मुताबिक फोबोस मंगल के दो चंद्रमा में से बड़ा है. आलू के आकार के इस चंद्रमा की खोज 17 अगस्त 1877 को असाफ हॉल ने की थी. इसका नाम एरेस के पौराणिक पुत्रों के नाम पर रखा गया जो रोमन देवता मार्स के ग्रीक के समकक्ष हैं. फोबोस का अर्थ भय होता है और यह डीमोस का भाई है. यह चंद्रमा मंगल ग्रह की एक दिन में तीन बार परिक्रमा करता है और ग्रह की सतह के इतना करीब है कि मंगल ग्रह के कुछ स्थानों पर इसे देखा नहीं जा सकता. ऐसा माना जाता है कि फोबोस विशाल उल्कापिंड से टकराने की वजह से चकनाचूर हो गया था. उस पर जो निशान बने हैं वह उल्का पिंडो के टकराने से बने हैं.
क्या पता लगाएगा जापान का ये मिशन?
जापान के प्रस्तावित MMS के प्रमुख यासुहिरो कावाकात्सु के मुताबिक फोबोस से जो नमूने वापस लाए जाएंगे वह ये बताएंगे कि भविष्य में मंगल ग्रह पर इंसानों को भेजने के लिए उसके किसी चंद्रमा को बेस के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है या नहीं. ऐसा इसलिए क्योंकि कई देश मंगल पर अंतरिक्षयात्रियों को भेजने की योजना बना रहे हैं.
कावाकात्सु के मुताबिक अभी तक मंगल के चंद्रमा की पूरी जांच नहीं हो पाइ्र है. दरअसल 1960 से लेकर अब तक मंगल ग्रह पर कई मिशन भेजे गए, लेकिन उसके दोनों चंद्रमा के बारे में ठीक से रिसर्च नहीं की गई. रूस ने एक दो बार यहां उतरने की कोशिश की लेकिर ये कोशिशें नाकाम रहीं. 2011 में भी रूस ने यहां एक मिशन भेजा था जो नाकाम रहा था.
फोबोस को क्यों चुना गया?
वैज्ञानिकों के मुताबिक फोबोस को इसलिए चुना गया, क्योंकि ये आकार में बड़ा है और डीमोस की तुलना में मंगल के ज्यादा करीब है. इसलिए वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इसके नमूनों में मंगल के बारे में ज्यादा जानकारी मिल सकती है. जापान की अंतरिक्ष एजेंसी के मुताबिक, फोबोस से इकट्ठा किए जाने वाले पदार्थों में मंगल ग्रह से आया लगभग 0.1 प्रतिशत पदार्थ होने की उम्मीद है. फोबोस का सबसे चौड़ा हिस्सा करीब 27 किलोमीटर यानी 17 मील व्यास का है. यह मंगल ग्रह से लगभग 6,000 किलोमीटर यानी 3,700 मील की दूरी पर परिक्रमा करता है और दिन में करीब तीन बार मंगल का चक्कर पूरा कर लेता है.
मंगल के मून तक पहुंचने में लगेगा एक साल
जापानी स्पेस एजेंसी H3 रॉकेट से लॉन्च किया जाएगा. अंतरिक्ष यान तकरीबन 2027 के आसपास मंगल ग्रह तक पहुंचने की उम्मीद है. दरअसल मंगल ग्रह धरती से अपने सबसे नजदीकी बिंदु पर भी करीब 5.5 करोड़ किलोमीटर दूर है. ऐसे में कम से कम एक साल तक इसके पहुंचने के लिए रखा गया है. तीन साल तक स्पेस क्राफ्ट वहां रिसर्च करेगा और फिर उसके वापस लौटने के लिए भी एक साल निर्धारित किया गया है. इसीलिए मिशन के लिए 5 साल निर्धारित किए गए हैं.