रूस और चीन समुद्री व्यापार के लिए एक ऐसा नेटवर्क तैयार करने की दिशा में काम कर रहे हैं, जो युद्ध और जियोपॉलिटिकल तनाव के बीच भी उनके कारोबार को जारी रखने में मदद कर सके. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के सलाहकार निकोलाई पात्रुशेव ने 8 से 13 अक्टूबर तक चीन का दौरा किया. इस दौरान दोनों देशों के बीच बंदरगाहों के विकास, समुद्री तकनीक और आर्कटिक के रास्ते व्यापार बढ़ाने जैसे प्रस्तावों पर चर्चा हुई. हालांकि, ये योजनाएं अभी पूरी तरह लागू नहीं हुई हैं. इस पहल का मकसद केवल माल ढुलाई आसान करना नहीं है. रूस और चीन ऐसे वैकल्पिक रास्ते और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क बनाना चाहते हैं, जो वैश्विक तनाव के दौरान भी उनके व्यापार को सहारा दे सकें.
आर्कटिक के रास्ते चीन से यूरोप तक पहुंचने की तैयारी
रूस और चीन के प्रस्तावों में उत्तरी समुद्री मार्ग (Northern Sea Route) अहम है. यह आर्कटिक क्षेत्र से होकर गुजरता है और एशिया से यूरोप तक समुद्री यात्रा का समय कम करने की क्षमता रखता है. अक्टूबर 2025 में एक चीनी कंटेनर जहाज ने आर्कटिक के रास्ते चीन से ब्रिटेन तक की यात्रा करीब 20 दिन में पूरी की थी. पारंपरिक समुद्री मार्ग से ऐसी यात्रा में लगभग 40 से 50 दिन लग सकते हैं. इससे इस रास्ते की संभावनाएं सामने आईं.
हालांकि, आर्कटिक मार्ग अभी मिस्र की स्वेज नहर का विकल्प नहीं बन सकता. यहां समुद्र में बर्फ, महंगे बीमा, खास जहाजों और सीमित नौवहन सीजन जैसी चुनौतियां हैं. रूस के आंकड़ों के मुताबिक, 2024 में उत्तरी समुद्री मार्ग से 3.79 करोड़ टन माल की आवाजाही हुई थी. यह रिकॉर्ड था, लेकिन स्वेज नहर से होने वाले व्यापार की तुलना में काफी कम है.
होर्मुज और लाल सागर से क्या है कनेक्शन?
ईरान से भारी मात्रा में तेल चीन पहुंचता है. होर्मुज अगर बंद हो जाए तो ये एक तरह की नई मुसीबत होगी, जैसा दुनिया अभी झेल रही है. ऐसे में तेल की बड़ी खरीद रूस से चीन कर सकता है. वहीं एशिया से यूरोप के व्यापार के लिए लाल सागर जरूरी है. लाल सागर से जहाज स्वेज नहर के जरिए भूमध्य सागर में पहुंचते हैं. लेकिन आए दिन पश्चिम एशिया के संघर्ष के कारण इन रास्तों पर संकट आ जाता है. चीन इसीलिए नया रास्ता खोज रहा है. इसका बड़ा मकसद चीन के जहाजों को व्यापार के लिए दूसरे समुद्री रास्ते उपलब्ध कराना है. चीन अपने सामान और ऊर्जा की आपूर्ति के लिए समुद्री मार्गों पर काफी निर्भर है. स्वेज नहर, बाब-अल-मंदेब और मलक्का जलडमरूमध्य जैसे अहम रास्तों पर संकट आने से उसकी सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है.
आर्कटिक का रास्ता चीन को एक अतिरिक्त विकल्प दे सकता है. इससे किसी एक समुद्री मार्ग पर तनाव होने की स्थिति में दूसरे रास्तों का इस्तेमाल करने की गुंजाइश बढ़ेगी. वहीं समय भी कम लगेगा. लेकिन ये नहीं कहा जा सकता कि होमुज और लाल सागर पर निर्भरता खत्म हो जाएगी.
बंदरगाहों के सॉफ्टवेयर और तकनीक पर भी जोर
पात्रुशेव की चीन यात्रा के दौरान समुद्री सहयोग के कई प्रस्ताव सामने आए. इनमें चीन की मैरीटाइम सिल्क रोड को रूस के ट्रांस-आर्कटिक ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर से जोड़ना, रूसी बंदरगाहों में निवेश और शंघाई के यांगशान बंदरगाह से रूस के बंदरगाहों तक सीधे कंटेनर संपर्क विकसित करना शामिल है. दोनों देश कंटेनर टर्मिनल को स्वचालित बनाने, जहाज निर्माण, समुद्री शिक्षा और साझा शोध में सहयोग भी बढ़ाना चाहते हैं.
इसमें डिजिटल तकनीक की भूमिका खास है. आधुनिक बंदरगाहों पर जहाजों की आवाजाही से लेकर कंटेनरों और माल की निगरानी तक कई काम सॉफ्टवेयर से होते हैं. अगर रूस और चीन इन तकनीकों और व्यवस्थाओं को एक-दूसरे से जोड़ते हैं, तो उनके बीच माल की आवाजाही ज्यादा व्यवस्थित हो सकती है.
अमेरिका और जापान की नजर क्यों?
आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियों पर अमेरिका पहले से नजर रखता है. जापान के लिए भी दोनों देशों के बीच मजबूत होते समुद्री संपर्क अहम हैं, क्योंकि वह पहले ही क्षेत्र में रूस और चीन की सैन्य गतिविधियों को लेकर चिंता जता चुका है. अगर शंघाई से व्लादिवोस्तोक और आगे आर्कटिक तक समुद्री नेटवर्क मजबूत होता है, तो इसका असर भविष्य में क्षेत्रीय रणनीतिक समीकरणों पर पड़ सकता है. चीन के लिए व्यापार के वैकल्पिक रास्ते होने से किसी एक क्षेत्र में संकट के दौरान उसकी सप्लाई चेन पर दबाव बनाना मुश्किल हो जाएगा. लेकिन इसका ताइवान या किसी संभावित संघर्ष पर क्या असर होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है.