इटावा: उत्तर प्रदेश का इटावा जिला अब बासमती चावल के उत्पादन के एक प्रमुख केंद्र के रूप में उभर रहा है. पिछले चार वर्षों में यहां के किसानों ने धान की खेती की दिशा में बड़ा बदलाव करते हुए उच्च गुणवत्ता वाले बासमती धान के उत्पादन पर विशेष ध्यान दिया है. इसका नतीजा है कि जिले में बासमती चावल का कारोबार करीब 400 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है. बासमती की खेती से बेहतर आमदनी होने के कारण किसानों का रुझान भी लगातार बढ़ रहा है. कृषि विभाग को उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में इटावा प्रदेश में धान उत्पादन के बड़े केंद्रों में अपनी पहचान मजबूत करेगा.
इटावा जिले में लंबे समय से आलू और गेहूं प्रमुख फसलों के रूप में उगाए जाते रहे हैं, लेकिन अब किसान व्यावसायिक लाभ को देखते हुए धान की खेती की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं. खास बात यह है कि किसान सामान्य धान के बजाय उच्च गुणवत्ता वाली बासमती किस्मों को प्राथमिकता दे रहे हैं. इटावा में उत्पादित बासमती चावल की मांग देश के विभिन्न राज्यों में बनी हुई है. यहां से चावल की आपूर्ति देश के अलग-अलग हिस्सों में की जा रही है, जबकि बड़े पैमाने पर निर्यात की संभावनाएं भी इस कारोबार को नई दिशा दे रही हैं.
67 हजार हेक्टेयर में होता है धान उत्पादन
इटावा कृषि विभाग के उपनिदेशक सतीश पांडे के अनुसार, जिले के धान उत्पादक किसानों का रुझान बासमती की खेती की ओर बढ़ा है. जिले में करीब 67 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में धान का उत्पादन होता है. विभाग के मुताबिक, इस क्षेत्र के लगभग 90 फीसदी हिस्से में बासमती धान की खेती की जा रही है. यह बदलाव जिले में बासमती उत्पादन के बढ़ते महत्व को दर्शाता है.
धान की कीमत 3500 से 3600 रुपए
कृषि विभाग की ओर से किसानों को धान की उन्नत किस्मों और खेती से जुड़े विभिन्न पहलुओं के प्रति जागरूक करने के प्रयास किए जा रहे हैं. बेहतर बाजार मूल्य मिलने से किसानों को इस फसल में अच्छी आमदनी की उम्मीद दिखाई दे रही है. वर्तमान में धान की कीमत करीब 3,500 से 3,600 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास बताई जा रही है. हालांकि, वास्तविक कीमत धान की किस्म, गुणवत्ता और बाजार की स्थिति के अनुसार अलग-अलग हो सकती है.
इटावा से लेकर जसवंतनगर तक खूब हो रही धाम की खेती
इटावा जिले के भरथना, महेवा, ताखा, सैफई और जसवंतनगर ब्लॉक के क्षेत्रों में बासमती धान की खेती के लिए अनुकूल परिस्थितियां बताई जाती हैं. इन क्षेत्रों की मिट्टी और कृषि परिस्थितियां धान की पैदावार में सहायक साबित हो रही हैं. यही वजह है कि इन इलाकों में किसान बासमती की खेती को व्यवसाय के रूप में अपना रहे हैं.
इस साल बारिश ने चमकाई किसनों की किस्मत
स्थानीय किसानों का कहना है कि इस वर्ष अच्छी बारिश होने से धान की फसल को फायदा मिला है. पर्याप्त वर्षा के चलते उत्पादन अच्छा रहने की उम्मीद है, जिससे किसानों को बेहतर आमदनी मिलने की संभावना बढ़ी है. किसानों के अनुसार, बाजार में धान के अच्छे भाव मिलने से उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूती मिल सकती है.
जीआई टैग से पहचान को मिल सकती है मजबूती
बासमती चावल की गुणवत्ता, खुशबू और बाजार में मांग इसे किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक फसल बनाती है. इटावा में पूसा बासमती की विभिन्न किस्मों की खेती भी की जा रही है. बासमती से संबंधित भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग के तहत मान्यता प्राप्त किस्मों और निर्धारित उत्पादन क्षेत्र की पहचान इस कारोबार के लिए महत्वपूर्ण है. इससे उत्पाद की विशिष्टता और बाजार में उसकी पहचान को मजबूती मिल सकती है.
बासमती कमाई से हो रही खूब कमाई
इटावा के किसानों ने स्थानीय स्तर पर चावल की खपत को ध्यान में रखने के बजाय दूसरे राज्यों के बाजारों और व्यापारिक संभावनाओं पर अधिक ध्यान केंद्रित किया है. जिले में चावल खाने का प्रचलन अपेक्षाकृत कम होने के बावजूद किसान बासमती को कमाई का बेहतर जरिया बना रहे हैं.
किसान अरविंद क्या बोले
इटावा जिले के बसरेहर विकास खंड के काशीपुर गांव के धान उत्पादक किसान अरविंद यादव का कहना है कि इस साल बरसात बहुत ही शानदार हुई है जिसके कारण वासवती चावल के उत्पादन में खासा इजाफा हुआ है. धान किसान सौरभ यादव का कहना है कि बरसात ने धान किसानों के चेहरे की चमक बढ़ा दी है. पिछले साल धान किसानों को काफी नुकसान हुआ था क्यों की बरसात अच्छी तादात में नहीं हुई थी. लेकिन इस दफा धान उत्पादन बहुत ही शानदार हुआ है जिससे किसानों की किस्मत चमकी हुई है.
आने वाले सालों में बढ़ेगा खेती का उत्पाद
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसानों को उचित मूल्य, बेहतर बाजार और विपणन की सुविधाएं मिलती रहीं, तो आने वाले वर्षों में बासमती की खेती का रकबा और बढ़ सकता है. इससे न केवल किसानों की आय में सुधार की संभावना है, बल्कि इटावा को प्रदेश के प्रमुख बासमती उत्पादक क्षेत्रों में स्थापित करने में भी मदद मिल सकती है.