कम पानी में भी किसान कर सकते है अरंडी की खेती, कम लागत में होगी छप्परफाड़ कमाई, जानें बुवाई का तरीका

कम पानी में भी किसान कर सकते है अरंडी की खेती, कम लागत में होगी छप्परफाड़ कमाई, जानें बुवाई का तरीका


खंडवा निमाड़ में किसान अब पारंपरिक फसलों के साथ दूसरी व्यावसायिक फसलों की ओर भी रुख कर रहे हैं। सोयाबीन, मक्का और कपास जैसी फसलों के बीच अब अरंडी की खेती भी किसानों को आकर्षित कर रही है। खास बात यह है कि अरंडी का पौधा अपनी गहरी जड़ों की मदद से मिट्टी में मौजूद नमी का उपयोग कर सकता है। ऐसे में कम बारिश वाले इलाकों में भी इसकी खेती एक विकल्प बन सकती है.

इस बार बारिश की कमी से खेती-किसानी पर असर पड़ा है, ऐसे में किसान ऐसी फसलों की तलाश कर रहे हैं, जिनसे सीमित संसाधनों में भी आमदनी का रास्ता बन सके। अरंडी के बीजों से तेल निकाला जाता है, जिसका इस्तेमाल साबुन, कॉस्मेटिक और कई औद्योगिक उत्पादों में होता है. यही वजह है कि बाजार में इसके बीजों की मांग बनी रहती है. हालांकि, अच्छी पैदावार और मुनाफे के लिए सही किस्म, समय पर बुवाई, खेत में जल निकासी और बाजार भाव का ध्यान रखना जरूरी है.

कम बारिश में भी खेती का विकल्प बन सकती है अरंडी

अरंडी की खेती को लेकर कृषि सलाहकार नवनीत रेवा पाठी बताते हैं कि यह एक व्यावसायिक फसल है और किसान इसे अपनी जमीन और उपलब्ध संसाधनों के हिसाब से लगा सकते हैं। अरंडी की जड़ें जमीन में गहराई तक जाती हैं, जिससे पौधा मिट्टी में मौजूद नमी का उपयोग कर सकता है। इस कारण कम बारिश वाले क्षेत्रों में भी इसकी खेती की संभावना रहती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि फसल को पानी की जरूरत नहीं पड़ती। पौधों की अच्छी बढ़वार और बीजों के विकास के समय पर्याप्त नमी मिलना जरूरी है. अगर लंबे समय तक बारिश नहीं होती, तो खेत की स्थिति के अनुसार सिंचाई की जरूरत पड़ सकती है. किसानों को बुवाई से पहले अपने खेत की मिट्टी और पानी की उपलब्धता को ध्यान में रखकर ही फसल का चुनाव करना चाहिए.

खेत तैयार करने से लेकर बुवाई तक रखें इन बातों का ध्यान

अरंडी की अच्छी पैदावार के लिए खेत की तैयारी महत्वपूर्ण है. बुवाई से पहले खेत की दो से तीन बार जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बनाया जा सकता है. खेत में खरपतवार न रहने दें और जल निकासी की अच्छी व्यवस्था रखें, क्योंकि खेत में लंबे समय तक पानी भरा रहने से पौधों को नुकसान हो सकता है. अरंडी की खेती सीधे बीज बोकर या नर्सरी में पौधे तैयार करके रोपाई के माध्यम से की जा सकती है। बुवाई के लिए बीज की मात्रा, पौधों के बीच दूरी और बुवाई का सही समय चुनी गई. किस्म और स्थानीय कृषि परिस्थितियों के अनुसार तय करना चाहिए. कृषि सलाहकार से अपने क्षेत्र के हिसाब से जानकारी लेकर बुवाई करने से किसानों को फायदा मिल सकता है.

बीजों से निकलता है तेल, कई उद्योगों में होती है मांग

अरंडी की फसल का मुख्य व्यावसायिक उपयोग इसके बीजों से तेल निकालने में होता है। अरंडी के तेल का इस्तेमाल साबुन, कॉस्मेटिक और कई औद्योगिक उत्पादों के निर्माण में किया जाता है। इसी वजह से यह फसल किसानों के लिए आमदनी का एक विकल्प बन सकती है। बाजार में अरंडी के बीज और उनसे प्राप्त तेल के भाव गुणवत्ता, मांग, आपूर्ति और बिक्री के तरीके के अनुसार बदलते रहते हैं। इसलिए किसानों को बुवाई से पहले आसपास की मंडियों, तेल मिलों और खरीददारों से जानकारी लेना जरूरी है। केवल बाजार में मांग होने के आधार पर खेती का फैसला करने के बजाय यह भी देखना चाहिए कि फसल तैयार होने पर उसे बेचने की व्यवस्था कहां होगी और परिवहन पर कितना खर्च आएगा.

एक हेक्टेयर में 25 से 30 हजार रुपये खर्च का दावा

कृषि सलाहकार के अनुसार, अरंडी की खेती में करीब 25 से 30 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर तक खर्च आ सकता है. हालांकि, वास्तविक लागत खेत की तैयारी, बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी और फसल की देखभाल पर निर्भर करेगी. जिन किसानों के पास पहले से खेती के जरूरी संसाधन उपलब्ध हैं, उनका खर्च अलग हो सकता है. इसलिए खेती शुरू करने से पहले स्थानीय स्तर पर लागत का हिसाब बनाना जरूरी है. अरंडी की फसल की अवधि भी किस्म और मौसम के अनुसार बदल सकती है। सामान्य तौर पर इसकी कुछ किस्मों में शुरुआती कटाई लगभग 120 से 130 दिनों के आसपास शुरू हो सकती है, लेकिन पूरी फसल की अवधि इससे अधिक भी हो सकती है। किसानों को बीज खरीदते समय किस्म की अवधि और उसकी उपज की जानकारी जरूर लेनी चाहिए.

कमाई का गणित समझना भी जरूरी

अरंडी की खेती से होने वाली कमाई का आकलन करते समय किसानों को उत्पादन और बिक्री भाव दोनों का हिसाब रखना चाहिए। बाजार में अरंडी के भाव समय और स्थान के अनुसार बदलते रहते हैं। इसलिए किसी एक भाव को पूरे साल के लिए तय मानना सही नहीं है। साथ ही, अरंडी के बीजों की उपज और उनसे निकलने वाले तेल की मात्रा भी अलग-अलग होती है। बीज उत्पादन और तेल उत्पादन को एक ही मानकर कमाई का हिसाब नहीं लगाना चाहिए। किसानों को पहले यह स्पष्ट करना चाहिए कि उन्हें बीज बेचने हैं या तेल निकालकर बेचना है, क्योंकि दोनों की लागत और बिक्री का तरीका अलग हो सकता है.अगर किसान को अच्छी उपज और उचित बाजार भाव मिलता है, तो अरंडी की खेती से आमदनी का अच्छा अवसर बन सकता है। लेकिन मुनाफा निकालते समय कुल उत्पादन, बिक्री भाव, खेती की लागत, तेल निकालने का खर्च और परिवहन जैसे सभी खर्चों को शामिल करना जरूरी है। किसी भी फसल में तय कमाई की गारंटी नहीं होती.

पारंपरिक खेती के साथ विकल्प तलाश रहे किसान

निमाड़ में खेती करने वाले किसानों के लिए अरंडी एक वैकल्पिक व्यावसायिक फसल हो सकती है, खासकर वहां जहां पानी सीमित है और बाजार तक पहुंच उपलब्ध है. हालांकि, हर खेत की मिट्टी, मौसम और सिंचाई की स्थिति अलग होती है. ऐसे में बड़े क्षेत्र में खेती शुरू करने से पहले छोटे रकबे में प्रयोग करना और कृषि विभाग या कृषि विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर रहेगा। किसान अगर सही किस्म का चुनाव करें, खेत में जल निकासी बनाए रखें और पहले से बाजार की जानकारी जुटा लें, तो जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है. कम बारिश के इस दौर में फसल का चुनाव सोच-समझकर करना ही किसानों के लिए सबसे जरूरी कदम है.



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