UK-रूस में बढ़ी टेंशन तो बचाने उतरा अमेरिका, भेजीं 2 न्यूक्लियर पनडुब्बियां
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रूस से समुद्र के नीचे मौजूद अहम केबलों को खतरे की आशंका के बीच अमेरिका ने ब्रिटेन की मदद के लिए दो परमाणु पनडुब्बियां भेजी हैं. ब्रिटेन की अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग और संचार व्यवस्था के लिए अटलांटिक की केबलें बेहद अहम हैं. GIUK गैप को संवेदनशील क्षेत्र माना जा रहा है
US Nuclear Submarine: समंदर के नीचे बिछी कुछ पतली केबलें आज ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी बन गई हैं. इन्हीं के जरिए ब्रिटेन और अमेरिका के बीच होने वाले संचार के साथ अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग का 90 फीसदी से ज्यादा लेन-देन जुड़ा है. ऐसे में अगर रूस ने इन केबलों को निशाना बनाया, तो असर सिर्फ इंटरनेट या फोन तक सीमित नहीं रहेगा. बैंकिंग और वित्तीय व्यवस्था पर भी बड़ा झटका लग सकता है. इसी खतरे के बीच अमेरिका ने ब्रिटेन की समुद्री केबलों की सुरक्षा के लिए दो परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियां भेजी हैं.
समंदर में छिड़ी नई जंग
ब्रिटेन के फर्स्ट सी लॉर्ड जनरल सर ग्विन जेनकिंस ने हाल ही में अटलांटिक की सुरक्षा पर बड़ा जोर दिया. उन्होंने कहा कि समुद्र के नीचे मौजूद केबलें आज के जीवन की रीढ़ हैं. इनके जरिए डेटा, लेन-देन और संचार चलता है. ब्रिटेन की ऊर्जा, कारोबार और संचार व्यवस्था अटलांटिक से गहराई से जुड़ी है. यानी खतरा सिर्फ किसी युद्धपोत या बंदरगाह पर हमले का नहीं है. समुद्र की गहराई में मौजूद बुनियादी ढांचा भी अब युद्ध का संभावित निशाना बन चुका है.
एक तार कटी तो बैंकिंग पर असर?
डेली मेल की रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिटेन के अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग का 90 फीसदी से ज्यादा हिस्सा अमेरिका और यूके के बीच होता है. ब्रिटेन और अमेरिका के बीच समुद्री केबलों के जरिए यह होता है. इसीलिए इन केबलों को नुकसान पहुंचने की स्थिति को गंभीर माना जा रहा है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि एक केबल कटते ही ब्रिटेन की पूरी बैंकिंग व्यवस्था तुरंत बंद हो जाएगी. नेटवर्क में कई वैकल्पिक रास्ते भी होते हैं. लेकिन बड़े पैमाने पर अगर केबल काटी जाती हैं तो इससे लेन-देन, डेटा और संचार में गंभीर बाधा आ सकती है.
GIUK गैप बना सबसे संवेदनशील इलाका
इन केबलों के लिए सबसे अहम इलाकों में GIUK गैप शामिल है. इसका मतलब है ग्रीनलैंड, आइसलैंड और ब्रिटेन के बीच का समुद्री क्षेत्र. यह इलाका उत्तरी अटलांटिक में बेहद अहम है. ब्रिटेन की नौसेना भी इसे रूस की समुद्री गतिविधियों पर नजर रखने के लिए महत्वपूर्ण मानती है. ब्रिटेन ने इस क्षेत्र में समुद्र के नीचे निगरानी और सेंसर नेटवर्क मजबूत करने की योजनाएं शुरू की हैं. रॉयल नेवी के मुताबिक, रूस की बढ़ती समुद्री और पनडुब्बी गतिविधियों के बीच उत्तरी अटलांटिक की सुरक्षा ब्रिटेन की प्राथमिकता बन गई है.
ब्रिटेन की जगह अमेरिका की परमाणु पनडुब्बियां क्यों?
सैन्य सूत्र के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि ब्रिटेन के पास फिलहाल इन समुद्री लाइनों की हर जगह सुरक्षा करने की पर्याप्त ताकत नहीं है. इसलिए अमेरिका से मदद ली जा रही है. इसी संदर्भ में दो अमेरिकी परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों की तैनाती की बात सामने आई है. इनका काम समुद्र के नीचे रूसी गतिविधियों पर नजर रखने और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा में मदद करना बताया गया है. यह कदम इसलिए भी अहम है क्योंकि ब्रिटेन खुद अपनी नौसेना को तेजी से आधुनिक बनाने और समुद्र के नीचे मौजूद ढांचे की सुरक्षा बढ़ाने पर जोर दे रहा है.
अगला खतरा स्वालबार्ड से?
इसी बीच नाटो स्वालबार्ड को लेकर भी चिंतित हैं. यह आर्कटिक में स्थित द्वीपसमूह है और नॉर्वे के अधीन है. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि नाटो संभावित रूसी कार्रवाई की स्थिति से निपटने के लिए योजनाएं बना रहा है. ब्रिटेन को इस इलाके में फ्रांस और अमेरिका की समुद्री मदद की जरूरत पड़ सकती है. रूस लंबे समय से इस क्षेत्र में अपनी रणनीतिक दिलचस्पी रखता है. आर्कटिक की बर्फ तेजी से पिघल रही है. इससे भविष्य में नए समुद्री रास्ते खुल सकते हैं. इसका असर व्यापार के साथ सैन्य रणनीति पर भी पड़ सकता है. ब्रिटिश नौसेना के प्रमुख ने भी कहा है कि आर्कटिक और उत्तरी समुद्री रास्ते अब ब्रिटेन की सुरक्षा के लिए दूर का इलाका नहीं रहे.
रूस पर बढ़ता शक
पश्चिमी देशों में चिंता इस बात को लेकर बढ़ी है कि रूस समुद्र के नीचे मौजूद महत्वपूर्ण ढांचे की निगरानी और उसकी मैपिंग कर रहा हो सकता है. डिफेंस विशेषज्ञ टिम रिप्ले ने भी दावा किया है कि रूस पश्चिमी देशों की समुद्री केबलों को मैप कर रहा है और उन्हें रोकने की क्षमता सीमित है. अभी बड़ा सवाल यही है कि समुद्र के नीचे चल रही यह निगरानी भविष्य में किस दिशा में जाती है.