सऊदी अरब में बांग्लादेशी जोड़े को मौत की सजा किस तरह से दी गई ये नहीं बताया गया है. सऊदी गृह मंत्रालय के मुताबिक उन्हें सजा ताजीर के तहत दी गई थी. हालांकि मौत की सजा देने का तरीका क्या था इसे स्पष्ट नहीं किया गया. हैरानी की बात ये है कि सऊदी की ओर से बांग्लादेश को भी इसकी कोई जानकारी नहीं दी गई थी. ऐसा पहली बार नहीं जब सऊदी ने ऐसा किया हो. इससे पहले भी ऐसा कई बार सामने आ चुका है जब किसी अपराध में दूसरे देश के नागरिक को सऊदी ने मौत की सजा दे दी और संबंधित दूतावास को इसकी जानकारी ही नहीं दी. हाल ही में जून में इथियोपियाई के 5 लोगों के साथ ऐसा किया गया था. इससे पहले भारत के भी एक नागरिक के साथ ऐसा किया जा चुका है.
बांग्लादेश के नजरुल इस्लाम अब्दुल बशीर और सिती अख्तर को यह सजा दी गई है. पिछले कई महीनों से इनके खिलाफ जेद्दा की एक अदालत में सुनवाई चल रही थी. दोनों पर कथित तौर पर मक्का की एक मस्जिद से अश्लील हरकतें करने का आरोप था. बांग्लादेशी अखबार प्रोथोम आलो के मुताबिक जज ने मसजिद जैसी पवित्र जगह की मर्यादा के घोर अपमान को कारण बताते हुए दोनों को मौत की सजा सुनाई. शाही फरमान जारी होने के बाद 14 अक्टूबर को मक्का में ही दोनों को मौत की सजा दी गई. सजा का आधार ताजीर को बनाया गया था.
क्या होती है ताजीर?
ताजीर असल में शरिया कानून के तीन प्रमुख भागों में से एक होता है. दरअसल सऊदी की अदालतें शरिया यानी इस्लामी कानून के तहत काम करती हैं. दरअसल शरिया में सजा के तीन हिस्से होते हैं. इनमें पहला हद्द होता है, जिसमें वे अपराध शामिल होते हैं जिनकी सजा कुरान या हदीस में तय है. इसमें सजा साबित करने के लिए गवाह या कबूलनामा चाहिए. दूसरा हिस्सा है किसास यानी जान के बदले जान का नियम होता है, लेकिन अगर पीड़ित परिवार चाहे तो माफ कर सकता है. माफ करने के बदले ब्लड मनी यानी मुआवजा भी ले सकता है.
इसी का तीसरा हिस्सा होता है ताजीर, यानी विवेक के हिसाब से सजा. इसमें वो अपराध शामिल होते हैं जो कुरान या हदीस में तय नहीं है. इसके तहत जज अपने विवेक से ये तय करता है कि अपराध कितना गंभीर हे और उसमें सजा क्या होनी चाहिए.
सऊदी की मक्का मस्जिद में बांग्लादेशी जोड़े ने क्या किया था?
सऊदी में मौत की सजा पाने वाले जोड़े ने आखिर क्या किया था, इसके बारे में सऊदी प्रशासन की ओर से कोई जानकारी नहीं दी गई है. उन पर बस मस्जिद में अनैतिक हरकतें करने का आरोप था. सऊदी की ओर से ये भी नहीं बताया गया कि उनके खिलाफ सबूत क्या थे और आरोपियों को कानूनी सहायता दी गई थी या नहीं. सऊदी की तरफ से ये भी नहीं बताया कि असल में इस जोड़े का आपस में क्या संबंध था.
एमनेस्टी इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी में विदेशी नागरिकों को निष्पक्ष सुनवाई में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, क्योंकि वहां न्याय व्यवस्था उतनी पारदर्शी नहीं है. सबसे खास बात ये है कि विदेशी नागरिकों को वहां के कानूनों के बारे में जानकारी नहीं होती. कई बार अनजाने में वे ऐसी गलतियां कर देते हैं जिसे सऊदी में बहुत गंभीर माना जाता है.
संबंधित दूतावास को जानकारी नहीं देता सऊदी
सऊदी अरब किसी भी देश के नागरिक को मौत की सजा देने के बाद संबंधित दूतावास को सूचना नहीं देता. बांग्लादेश के मामले में भी यही हुआ है. जबकि विएना कन्वेंशन ऑन कॉन्सुलर रिलेशंस 1963 के मुताबिक अगर किसी भी देश के नागरिक को पकड़ा जाता है या उस पर मुकदमा चलता है तो संबंधित दूतावास को तुरंत जानकारी देनी होती है.
इससे पहले जून में पांच इथियोपियाई नागरिकों को भी मौत की सजा दी गई थी, लेकिन इनके बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई. बीबीसी की क रिपोर्ट के अनुसार इनके शव तक परिवार को नहीं दिए गए थे और न ही उनसे जुड़ी चीजें लौटाई गईं थीं. भारत के दो नागरिकों को 2019 में सऊदी ने मौत की सजा दी थी, जिसकी जानकारी दूतावास को बाद में दी गई थी.