उज्जैन. दशहरा यानी विजयादशमी का पर्व पूरे देश में उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है. यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, क्योंकि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था. दशहरे पर रावण दहन के साथ ही शस्त्र पूजन की परंपरा भी विशेष महत्व रखती है. इस दिन हथियारों और औजारों की पूजा कर शक्ति, साहस और सुरक्षा की कामना की जाती है.
शस्त्र पूजन को केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परंपरा का हिस्सा भी माना जाता है. आखिर विजयादशमी पर शस्त्र पूजन की शुरुआत कैसे हुई, इसका धार्मिक महत्व क्या है और पूजा करने की सही विधि व शुभ मुहूर्त क्या है? इन सभी सवालों के जवाब आइए जानते है उज्जैन के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित आनंद भारद्वाज से विस्तार से.
शस्त्र पूजन की परंपरा और इसका आरंभ
दशहरे पर शस्त्र पूजन की शुरुआत के विषय में विद्वानों के बीच अलग-अलग मत हैं, लेकिन यह माना जाता है कि यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है. यह पूजा विशेष रूप से योद्धाओं के बीच लोकप्रिय रही है, जो युद्ध में जाने से पहले अपने शस्त्रों का पूजन करते थे. पंडित आनंद बताते हैं, शस्त्र पूजन हमारी रक्षा, शक्ति और विजय का प्रतीक है. यह परंपरा केवल योद्धाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह सभी के लिए शक्ति और आत्म-सुरक्षा का प्रतीक बन गई है. दशहरे के दिन रावण पर भगवान राम की जीत को याद करते हुए, शस्त्रों की पूजा की जाती है. यह अनुष्ठान युद्ध और संघर्ष में विजय प्राप्त करने के लिए भगवान से आशीर्वाद प्राप्त करने का एक तरीका है.
शस्त्र पूजन की विधि
शस्त्र पूजन के लिए सही विधि का पालन करना बहुत महत्वपूर्ण है. दशहरे के दिन सुबह स्नान कर नए वस्त्र धारण करने के बाद शस्त्रों को एक साफ स्थान पर रखा जाता है. शस्त्रों को अच्छी तरह से साफ किया जाता है और उन पर फूल, अक्षत, हल्दी चढ़ाई जाती है. पूजा के दौरान निम्नलिखित मंत्र का जाप किया जाता है:
मन्त्र – “शस्त्र देवता पूजनम्, रक्षा कर्ता पूजनम्.”
अर्थ – इस मंत्र के माध्यम से शस्त्र देवताओं से सुरक्षा, शक्ति और विजय की कामना की जाती है. पूजा के बाद, शस्त्रों को आदरपूर्वक उनके स्थान पर रखा जाता है और उनकी देखभाल की जाती है.
शस्त्र पूजन का महत्व
पंडित भारद्वाज के मुताबिक, दशहरे पर शस्त्र पूजन का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना जाता है. मान्यता है कि इस पूजा से व्यक्ति के भीतर साहस, आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प की भावना मजबूत होती है. शस्त्र पूजन शक्ति और सुरक्षा का प्रतीक है, जो जीवन की चुनौतियों का डटकर सामना करने की प्रेरणा देता है. इस परंपरा के माध्यम से परिवार की सुख-समृद्धि, सुरक्षा और जीवन में सफलता की कामना की जाती है.