durga puja brothel soil rituals Why Soil from Brothel Used to Make durga pratima | दुर्गा पूजा से पहले वेश्यालय की मिट्टी मांगते समय निभाई जाती हैं ये

durga puja brothel soil rituals Why Soil from Brothel Used to Make durga pratima | दुर्गा पूजा से पहले वेश्यालय की मिट्टी मांगते समय निभाई जाती हैं ये


Durga Puja Brothel Soil Rituals: दुर्गा पूजा की शुरुआत षष्ठी तिथि से होती है और विजयादशमी को इस पर्व का समापन होता है. नवरात्रि का पर्व भारत में अलग-अलग परंपराओं के साथ मनाया जाती है, जबकि दुर्गा पूजा पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा और ओडिशा सहित पूर्वी भारत में धूमधाम से मनाया जाता है. दुर्गा पूजा के दौरान आपने कई बार सुना और पढ़ा होगा कि मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने में वेश्यालय की मिट्टी का प्रयोग किया जाता है. लेकिन क्या आपको पता है कि वेश्यालय की मिट्टी मांगते समय कौन सी रस्में निभाई जाती हैं. आइए जानते हैं दुर्गा पूजा के लिए बनाई जाने वाली प्रतिमा किस तरह बनाई जाती है और प्रतिमा बनाने के दौरान किन किन बातों का ध्यान रखा जाता है…

प्रतिमा के लिए तैयार किया जाता है मिट्टियों का मिश्रण
दुर्गा पूजा के लिए मूर्तिकार कई महीनों की कड़ी मेहनत और खास तरह की मिट्टियों के मिश्रण से इन भव्य प्रतिमाओं को जीवंत रूप देते हैं. आज के समय में इको-फ्रेंडली (पर्यावरण-अनुकूल) मूर्तियों का चलन बहत तेजी से बढ़ा है, ताकि त्योहार के बाद जलाशयों को प्रदूषण से बचाया जा सके. मां दुर्गा प्रतिमा बनाने के लिए किसी एक मिट्टी का नहीं, बल्कि अलग-अलग गुणों वाली मिट्टियों के मिश्रण का उपयोग किया जाता है, जिसमें गंगा की मिट्टी (कैटल माटी), दोआश माटी, पुण्य माटी, बेलर माटी मुख्य रूप से इस्तेमाल किया जाता है.

कहा जाता है पुण्य माटी?
दुर्गा पूजा की मूर्ति बनाने में वेश्यालय के आंगन या चौखट की मिट्टी का उपयोग किया जाता है, जिसे पुण्य माटी कहा जाता है. वेश्यालय मिट्टी के साथ गंगा नदीं की मिट्टी, गाय का गोबर व गोमूत्र को आपस में मिलाया जाता है और मूर्ति तैयार की जाती है. परंपरा के अनुसार, मूर्ति के लिए पुजारी या मूर्तिकार खुद वेश्यालय जाते हैं और वहां की मिट्टी को आशीर्वाद या उपहार स्वरूप मांगकर लाते हैं. मिट्टे लेने के बाद शगुन के तौर पर वस्त्र, श्रृंगार का सामान व कुछ राशि भी दी जाती है.

मिट्टी को लेकर पौराणिक कथा
वेश्यालय के आंगन की मिट्टी को लेकर मान्यता है कि वह समाज के बनाए नियमों के अनुसार, अपने सभी पुण्य, कर्म, पवित्रता को बाहर ही छोड़ देता है इसलिए वहां की मिट्टी पुण्य व पवित्र मानी जाती है. इस प्रथा के पीछे एक उद्देश्य यह भी है कि समाज के इन बहिष्कृत लोगों को मुख्यधारा से जोड़ा जाए. एक लोक कथा के अनुसार, कुछ वेश्याओं ने मिलकर एक कुष्ठ रोगी की काफी सेवा की थी. वह कुष्ठ रोगी कोई और नहीं बल्कि भगवान शिव थे. वेश्याओं की सेवा से प्रसन्न होकर शिवजी ने वरदान दिया कि अब से उनके आंगन की मिट्टी के बिना मां दुर्गा की प्रतिमा पूर्ण नहीं मानी जाएगी, तभी से मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने के लिए वेश्यालय की मिट्टी का प्रयोग किया जाने लगा.

चैत्र संक्रांति से विशेष अनुष्ठान के साथ शुरुआत
दुर्गा पूजा के दौरान कोलकाता के उत्तर में स्थित करीब 300 साल पुरानी पारंपरिक बस्ती, कुम्हारटोली, कला, आस्था और अर्थशास्त्र का केंद्र माना जाता हैं. मूर्तिकला की प्रक्रिया उत्सव से महीनों पहले, आमतौर पर बंगाली वर्ष के अंतिम दिन (चैत्र संक्रांति) से एक विशेष अनुष्ठान के साथ शुरू हो जाती है. सबसे पहले बांस और पुआल से देवी का मूल ढांचा तैयार किया जाता है, जिसे ‘काठामो’ कहते हैं. इस ढांचे को मजबूती देने के लिए विशेष रूप से सुंदरबन से मंगाए गए पुआल का उपयोग किया जाता है, जिसे जूट की रस्सियों से कसा जाता है. कुम्हारटोली की मूर्तिकला ‘टेराक्रूडा’ तकनीक पर आधारित है, जिसका अर्थ है धूप में सुखाई गई बिना पकी कच्ची मिट्टी का उपयोग.

कई चरणों में तैयार किया जाता है लेप
मूर्ति को ठोस आकार देने के लिए मिट्टी का लेपन कई चरणों में किया जाता है. प्रतिमाओं के निर्माण में मुख्य रूप से तीन प्रकार की मिट्टियों का वैज्ञानिक और प्रतीकात्मक उपयोग होता है. एंटेल माटी एक चिपचिपी और सख्त काली मिट्टी होती है. इसे पानी में घोलकर पुआल के ढांचे पर सबसे पहले लगाया जाता है, ताकि पुआल की दरारें भर सकें और मूर्ति को मजबूत आधार मिले. गंगा माटी नदी का तल बेहद कोमल और चिकनी मिट्टी होती है. इसका लेप देवी के शरीर को अंतिम रूप देने और त्वचा को कोमलता प्रदान करने के लिए किया जाता है.

महालया के दिन चक्षुदान
मिट्टी सूखने के बाद मूर्तियों को रंगों से सजाया जाता है. इस पूरी प्रक्रिया के दौरान देवी की आंखों पर पट्टी बंधी रहती है. ‘महालया’ के पवित्र दिन, जो पितृ पक्ष के अंत और देवी पक्ष की शुरुआत का प्रतीक है, कारीगर शंख की ध्वनि के बीच देवी की आंखें उकेरते हैं. ‘चक्षुदान’ कहलाने वाली इस प्रक्रिया के माध्यम से प्रतिमा में प्राणों का संचार माना जाता है.

प्रतिमा शृंगार में दो शैलियों का प्रभुत्व
प्रतिमा के शृंगार में ऐतिहासिक रूप से दो शैलियों का प्रभुत्व रहा है. पहला है ‘शोला साज’, जो दलदली क्षेत्रों में पाए जाने वाले सफेद जलीय पौधे के कोर से बनाया जाता है और यह पूरी तरह से प्राकृतिक तथा बायोडिग्रेडेबल होता है. दूसरी शैली ‘डाक का साज’ है, जिसकी शुरुआत औपनिवेशिक काल में हुई थी, जब अमीर जमींदार अपनी मूर्तियों को सजाने के लिए जर्मनी से डाक द्वारा विशेष चांदी के वर्क और धागे मंगवाते थे.



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