Dharm Astha : कन्या पूजन में किस उम्र की बच्चियों को खिलाएं भोजन, क्या कहता है शास्त्र? 99% लोग नहीं जानते

Dharm Astha : कन्या पूजन में किस उम्र की बच्चियों को खिलाएं भोजन, क्या कहता है शास्त्र? 99% लोग नहीं जानते


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कन्या पूजन में किस उम्र की बच्चियों को खिलाएं भोजन, क्या कहता है शास्त्र?

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Kanya Pujan Age Limit : नवरात्रि चल रही है. इसमें मां दुर्गा की पूजा के साथ कन्या पूजन भी किया जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि किस उम्र की कन्याओं को भोग लगाना सबसे सही है. लोकल 18 ने इस बारे में ऋषिकेश के ज्योतिषी पंडित अखिलेश पांडेय से बात की. वे बताते हैं कि शास्त्रों में दो से 10 साल तक की कन्याओं को कन्या पूजन के योग्य बताया गया है. शुरुआत दो वर्ष की कन्या से करते हैं. इन्हें कुमारी कहा जाता है. इसके बाद त्रिमूर्ति, कल्याणी, रोहिणी, कालिका और चंडिका का नाम आता है. आठ वर्ष की कन्या को शाम्भवी, नौ को दुर्गा और 10 साल की कन्या सुभद्रा के स्वरूप में पूजी जाती हैं.

ऋषिकेश. नवरात्रि में मां दुर्गा की पूजा के साथ कन्या पूजन भी किया जाता रहा है. अष्टमी और नवमी के दिन लोग कन्या पूजन करते है. धार्मिक मान्यता है कि कन्याओं में मां दुर्गा का स्वरूप देखकर उनकी पूजा करने से माता रानी का आशीर्वाद मिलता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि किस उम्र की कन्याओं को भोग लगाना सबसे सही है. लोकल 18 से ऋषिकेश के ज्योतिषी अखिलेश पांडेय बताते हैं कि शास्त्रों में दो से 10 साल तक की कन्याओं को कन्या पूजन के योग्य बताया गया है. हर उम्र की कन्या का अलग नाम और महत्व है. दो वर्ष की कन्या को कुमारी कहा जाता है. तीन वर्ष की कन्या को त्रिमूर्ति और चार वर्ष की बच्ची को कल्याणी के रूप में पूजा जाता है. पांच वर्ष की कन्या को रोहिणी, छह वर्ष की कन्या को कालिका और सात वर्ष की कन्या को चंडिका कहा जाता है. आठ वर्ष की कन्या को शाम्भवी, नौ वर्ष की कन्या को दुर्गा और दस वर्ष की कन्या को सुभद्रा के स्वरूप में पूजा जाता है.

सबसे पहले करें क्या

ज्योतिषी अखिलेश पांडेय कहते हैं कि इस उम्र की कन्याओं को मां दुर्गा का स्वरूप मानकर उनका आदर-सत्कार किया जाता है. अष्टमी या नवमी के दिन इन्हें घर बुलाकर इनकी पूजा आरती की जाती है. इसके बाद इनके पैर धोए जाते हैं और इनका आशीर्वाद लिया जाता है. मान्यता है कि छोटी बच्चियों की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है और परिवार पर माता रानी की कृपा बनी रहती है. इसके बाद इन्हें पूरी, हलवा, चने इत्यादि का प्रसाद खिलाया जाता है. फिर अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा, फल, मिठाई या दूसरे उपहार दिए जाते हैं.

कैसे खोलें व्रत

ज्योतिषी अखिलेश पांडेय के मुताबिक नौ कन्याओं के साथ एक बालक को भी भोजन करवाया है, जिसे बटुक भैरव के प्रतीक के रूप में देखा जाता है. इसकी भी आरती की जाती है, जिसके बाद पैर धोए जाते हैं. आर्शीवाद लिया जाता है और प्रसाद खिलाया जाता है. इन सभी को खिलाने के बाद व्रती इसी प्रसाद से अपना व्रत खोलते हैं.



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