BIPARD में व्याख्यान के नाम पर लाखों का घोटाला, RTI से सामने आए आंकड़ों ने खड़े किए कई सवाल

BIPARD में व्याख्यान के नाम पर लाखों का घोटाला, RTI से सामने आए आंकड़ों ने खड़े किए कई सवाल


बिहार के अधिकारियों को प्रशासन की बारीकियां सिखाने वाली संस्था बिहार लोक प्रशासन एवं ग्रामीण विकास संस्थान (Bihar Institute of Public Administration & Rural Development) यानी बिपार्ड (BIPARD) में व्याख्यान (Lecture) के नाम पर किए गए भुगतानों को लेकर सवाल उठे हैं. एक आरटीआई एक्टिविस्ट ने बिपार्ड का यह काला खेल सामने लाया है. न्यूज 18 सुरक्षा कारणों से एक्टिविस्ट की पहचान उजागर नहीं कर रहा है. वित्तीय वर्ष 2023-24, 2024-25 और अप्रैल से अगस्त 2025 तक नियम विरुद्ध जाकर अतिथि व्याख्याताओं को लाखों का भुगतान किया गया है.बिपार्ड गया के लोक सूचना अधिकारी ने तीन वित्तीय वर्षों में अतिथि व्याख्याताओं को किए गए भुगतान की जानकारी छिपा ली है, जिसकी द्वितीय अपील बिहार राज्य सूचना आयोग में की गई है. न्यूज 18 ने इस पूरे घोटाले का खुलासा किया है.

आरटीआई (RTI) से मिली जानकारी के मुताबिक, अलग-अलग सरकारी पदों पर तैनात अधिकारियों और अन्य लोगों को BIPARD में प्रशिक्षण देने के एवज में बड़ी रकम का भुगतान किया गया. एक मामले में वित्तीय वर्ष 2023-24, 2024-25 और अप्रैल से अगस्त 2025 के दौरान करीब 17.92 लाख रुपये भुगतान का दावा किया गया है. अब सवाल यह है कि इन भुगतानों के लिए क्या निर्धारित नियमों और जरूरी अनुमतियों का पालन किया गया था.

एक अधिकारी को तीन साल में 17.92 लाख का भुगतान

RTI से मिली जानकारी के आधार पर दावा किया गया है कि बिहार सरकार में पदस्थ एक अधिकारी को BIPARD पटना में व्याख्यान देने के एवज में तीन अलग-अलग अवधियों में भुगतान किया गया. जानकारी के अनुसार, 2023-24 में 10,07,350 रुपये, 2024-25 में 3,82,500 रुपये और अप्रैल से अगस्त 2025 के दौरान 4,02,600 रुपये का भुगतान बताया गया है. इन तीनों रकम को जोड़ने पर कुल भुगतान 17,92,450 रुपये बैठता है.ऐसे में यह आंकड़ा सिर्फ BIPARD पटना से संबंधित बताया गया है. BIPARD गया की रकम को जोड़ने पर राशि और बढ़ने का दावा किया गया है.

RTI में पूरी जानकारी नहीं मिलने का दावा

मामले को सामने लाने वाले RTI आवेदक का दावा है कि तीन वित्तीय वर्षों में अतिथि व्याख्याताओं को किए गए भुगतान की पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई. इसी को लेकर बिहार राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील भी की गई है. अब सूचना आयोग के स्तर पर यह देखना बाकी है कि मांगी गई सूचनाएं क्यों उपलब्ध नहीं कराई गईं और BIPARD के रिकॉर्ड में अतिथि व्याख्याताओं को किए गए कुल भुगतान का वास्तविक आंकड़ा क्या है.

कई सरकारी अधिकारियों के नाम सामने आने का दावा

RTI से जुड़े दस्तावेजों और उपलब्ध जानकारी में कई सरकारी अधिकारियों तथा अन्य लोगों के BIPARD में व्याख्यान देने और भुगतान प्राप्त करने का दावा किया गया है.  बिपार्ड में क्लास के एवज में मोटी रकम लेने वालों में बड़े नाम हैं. हिमेश्वर सिंह सामान्य प्रशासन विभाग में सेक्शन ऑफिसर रहते हुए मोटी रकम ली. जेल सेवा के पदाधिकारी रविकांत देव, सचिव स्तर के IAS अधिकारी गोपाल प्रसाद मीणा, बिपार्ड में ही कार्यरत रचना पाटिल शामिल हैं. हैरानी की बात है कि बिपार्ड डीजी के पीए नंदकिशोर जो बोधगया में रहते हैं, उन्होंने भी क्लास देकर मोटी रकम ली. पटना बेउर जेल के पूर्व अधीक्षक नीरज झा जिन पर आय से अधिक संपत्ति का केस चल रहा है, उनकी पत्नी ज्योति रानी को भी बिपार्ड ने क्लास के नाम पर मोटी रकम दी है. ऐसे कई और अधिकारी और उनके रिश्तेदार हैं जिन्होंने बिपार्ड में गेस्ट फैकल्टी बनकर खूब कमाई की है.  हालांकि, यहां यह भी बता दें कि सिर्फ भुगतान होना अपने आप में नियमों के उल्लंघन का प्रमाण नहीं है. इसकी वैधता इस बात पर निर्भर करेगी कि संबंधित व्यक्ति को व्याख्यान देने की अनुमति थी या नहीं, भुगतान किस नियम के तहत हुआ और क्या निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया.

सरकारी कर्मचारी को भुगतान के लिए नियम क्या कहते हैं?

बिहार सरकारी सेवक आचरण नियम, 1976 में सरकारी कर्मचारी के निजी काम या फीस स्वीकार करने को लेकर प्रावधान हैं. नियमों के मुताबिक सरकारी कर्मचारी किसी सार्वजनिक निकाय या निजी व्यक्ति के लिए किए गए काम की फीस सक्षम सरकार या निर्धारित प्राधिकारी की अनुमति के बिना स्वीकार नहीं कर सकता. सरकारी कर्मचारियों को मानदेय या फीस देने से संबंधित सामान्य नियमों में भी पूर्व अनुमति और सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी की जरूरत बताई गई है. इसलिए BIPARD के मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि जिन सरकारी अधिकारियों को भुगतान किया गया, उनके लिए संबंधित अनुमति और भुगतान की स्वीकृति किस प्रक्रिया के तहत हुई.

अब दस्तावेजों से साफ होगा पूरा मामला

इस मामले में BIPARD से जुड़े भुगतान रिकॉर्ड, व्याख्यान की संख्या, प्रति व्याख्यान भुगतान, संबंधित अधिकारियों की अनुमति और विभागीय स्वीकृति अहम दस्तावेज होंगे. यदि नियमों के मुताबिक सभी मंजूरियां ली गई थीं तो भुगतान की प्रक्रिया की वैधता स्पष्ट होगी. वहीं, यदि जरूरी अनुमति या निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ है तो जिम्मेदारी तय करने का आधार बनेगा. फिलहाल RTI से सामने आए भुगतान के आंकड़ों ने BIPARD में गेस्ट फैकल्टी को दिए जाने वाले मानदेय की व्यवस्था पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं. अब निगाह सूचना आयोग और संबंधित विभाग के रिकॉर्ड पर है, जिससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि लाखों रुपये के इन भुगतानों में नियमों का कितना पालन हुआ.



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