Opinion: SIR यहां ठीक वहां खराब की राह पर क्यों बढ़ रही कांग्रेस? दिल्ली में ज्ञानेश कुमार पर हमलावर, लेकिन दक्षिण में सुस्त


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SIR पर यहां ठीक, वहां खराब? दिल्ली में मुखर कांग्रेस, दक्षिण में नरम क्यों?

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SIR पर कांग्रेस यहां ठीक वहां खराब की राह पर क्यों बढ़ रही है? दिल्ली में पार्टी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रही है. लेकिन तमिलनाडु में कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने माना कि SIR का अनुभव पश्चिम बंगाल और बिहार से अलग रहा है. उन्होंने कांग्रेस और DMK के बीच मतभेदों की बात भी स्वीकार की. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस की राष्ट्रीय रणनीति राज्यों में अलग-अलग राजनीतिक जरूरतों के हिसाब से बदल रही है? लोकतंत्र और मतदाता अधिकारों की बात करने वाली पार्टी को अब अपने विरोध के आधार और राज्यवार स्थिति को तथ्यों के साथ स्पष्ट करना होगा.

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SIR पर यहां ठीक, वहां खराब? दिल्ली में मुखर कांग्रेस, दक्षिण में नरम क्यों?Zoom

SIR पर दिल्ली में ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रही कांग्रेस के बीच कार्ति चिदंबरम ने तमिलनाडु का अनुभव बंगाल और बिहार से अलग बताया. (फाइल फोटो)

SIR यानी वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर कांग्रेस का रुख अब सवालों के घेरे में है. दिल्ली में पार्टी चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर हमलावर है. इस्तीफे की मांग से लेकर लोकतंत्र बचाने की अपील तक कांग्रेस इस मुद्दे पर अपनी लड़ाई को राष्ट्रीय स्तर पर ले जाना चाहती है. लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी इसे आर-पार की लड़ाई बना चुके हैं. वह लगातार दिल्ली में रैली निकाल रहे हैं और पूरे देश में जनसभा करने का प्लान बना चुके हैं. लेकिन कहानी का दूसरा पहलू दक्षिण भारत से सामने आ रहा है. तमिलनाडु में कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने कहा है कि SIR का अनुभव हर राज्य में एक जैसा नहीं रहा. उनके मुताबिक पश्चिम बंगाल और बिहार में इसका असर ज्यादा महसूस किया गया जबकि तमिलनाडु में लोगों का अनुभव सीमित रहा है. यहीं से सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस SIR पर भी ‘यहां ठीक वहां खराब’ की राजनीति कर रही है? दिल्ली में जिस मुद्दे को पार्टी लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा बता रही है उस पर दक्षिण में उसके सुर इतने अलग क्यों सुनाई दे रहे हैं?

कांग्रेस की परेशानी सिर्फ बयान के विरोधाभास की नहीं है. पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा राजनीतिक संदेश देना चाहती है लेकिन राज्यों की वास्तविक परिस्थितियां उसके लिए अलग चुनौती खड़ी कर रही हैं. तमिलनाडु में कांग्रेस और DMK सहयोगी हैं. दोनों के बीच राज्य की राजनीति में अपनी जगह और प्रभाव को लेकर खींचतान भी होती रही है. ऐसे माहौल में कांग्रेस के लिए हर मुद्दे पर आक्रामक रुख अपनाना आसान नहीं है. कार्ति चिदंबरम ने अपने बयान में यह भी कहा कि राज्य स्तर पर राजनीतिक दल प्रतिद्वंद्वी हो सकते हैं लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर साथ काम कर सकते हैं. सवाल यह है कि कांग्रेस की SIR विरोधी मुहिम में भी यही व्यावहारिकता दिख रही है या पार्टी की रणनीति राज्यों की राजनीतिक जरूरतों के हिसाब से नरम पड़ रही है?
तमिलनाडु में कांग्रेस की राजनीति का एक बड़ा हिस्सा DMK के साथ उसके रिश्तों पर निर्भर करता है. (X/ANI)

दिल्ली में विरोध तेज तो दक्षिण में अलग सुर क्यों?

दिल्ली में कांग्रेस SIR के खिलाफ खुलकर मोर्चा संभाले हुए है. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग के साथ पार्टी चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठा रही है. लेकिन तमिलनाडु में कार्ति चिदंबरम का बयान यह संकेत देता है कि SIR के प्रभाव को लेकर राज्यवार अंतर स्वीकार करना जरूरी है. उनका कहना है कि पश्चिम बंगाल और बिहार में लोगों का अनुभव तमिलनाडु से अलग रहा है. यह बात अपने आप में गलत नहीं है. हर राज्य की परिस्थितियां अलग हो सकती हैं. लेकिन फिर कांग्रेस को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उसकी राष्ट्रीय मांग किन ठोस शिकायतों पर आधारित है और उनका असर अलग-अलग राज्यों में कैसे दिखाई दे रहा है.

DMK के साथ रिश्ते भी बन रहे हैं चुनौती

तमिलनाडु में कांग्रेस की राजनीति का एक बड़ा हिस्सा DMK के साथ उसके रिश्तों पर निर्भर करता है. कार्ति चिदंबरम ने दोनों दलों के बीच मतभेद और टकराव होने की बात स्वीकार की है. उन्होंने केरल का उदाहरण देते हुए कहा कि कांग्रेस और CPI(M) वहां एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते हैं लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में सहयोग कर सकते हैं. यह तर्क गठबंधन की राजनीति को समझाता है. मगर इससे कांग्रेस की SIR रणनीति का सवाल खत्म नहीं होता. अगर पार्टी किसी मुद्दे पर देशव्यापी आंदोलन चला रही है तो उसे यह भी बताना होगा कि सहयोगी राज्यों में उसका संदेश कितना स्पष्ट और एक समान है.

कांग्रेस को नारे से आगे जाकर तथ्य रखने होंगे

SIR पर पारदर्शिता और मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा की मांग करना जरूरी राजनीतिक बहस है. लेकिन किसी प्रक्रिया का विरोध करने के लिए आरोपों के साथ ठोस उदाहरण और प्रमाण भी सामने रखने चाहिए. कांग्रेस अगर पश्चिम बंगाल और बिहार में ज्यादा असर की बात करती है तो उसे वहां की समस्याओं को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए. तमिलनाडु में सीमित अनुभव का जिक्र करना भी उसी तस्वीर का हिस्सा है. दिक्कत तब पैदा होती है जब राष्ट्रीय स्तर पर एक मुद्दे को बेहद गंभीर बताया जाए लेकिन अलग राज्यों में उसके राजनीतिक अर्थ बदलते नजर आएं.

‘यहां ठीक वहां खराब’ की छवि से कैसे बचेगी कांग्रेस?

कांग्रेस के सामने असली चुनौती SIR का विरोध करना नहीं बल्कि अपनी बात में स्पष्टता बनाए रखना है. अगर पार्टी मानती है कि हर राज्य का अनुभव अलग है तो उसे अपनी रणनीति भी तथ्यों के आधार पर समझानी चाहिए. दिल्ली में ज्ञानेश कुमार पर हमले और दक्षिण में नरम रुख के बीच का अंतर तभी दूर हो सकता है जब कांग्रेस अपनी मांगों का आधार साफ करे. वरना विरोधियों को यह कहने का मौका मिलता रहेगा कि पार्टी मुद्दे को सिद्धांत से ज्यादा राजनीतिक सुविधा के हिसाब से उठा रही है.



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