इंटरनेट सर्विस की आड़ में मस्क का धोखा, ये घटना हमें क्या सबक दे रही है
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एलॉन मस्क की कंपनी स्टारलिंक ने बिना पहले से जानकारी दिए यूक्रेन में स्टारलिंक इंटरनेट की स्पीड जिस तरह कंट्रोल की है. ये आरोप है यूक्रेनी सेना का. पर इस आरोप ने कई बड़ी चिंताएं खड़ी कर दी हैं.
स्टारशील्ड स्पेसएक्स का सैन्य और सरकारी उपयोग के लिए बना सैटेलाइट नेटवर्क है.
इलॉन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स ने यूक्रेन में स्टारलिंक इंटरनेट की स्पीड जिस तरह कंट्रोल की है, उसने एक नए खतरे की तरफ पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है. यूक्रेन के राष्ट्रपति के सलाहकार सेरही बेस्क्रेस्टनोव ने बुधवार को बताया कि इस फैसले से रूस के खिलाफ लड़ रही यूक्रेनी सेना के कई ऑपरेशन पर असर पड़ा है. टर्मिनल 160 किलोमीटर प्रति घंटे से ज्यादा स्पीड पर चलने में कनेक्शन टूटने लगा और इससे यूक्रेनी ड्रोन मिशन प्रभावित हुए. असल में ये बात इसलिए ज्यादा चिंता वाली है क्योंकि स्टारलिंक ने इसकी कोई जानकारी पहले से नहीं दी थी. अब भारत में भी इसे लेकर चिंताएं उठ रही हैं, क्योंकि अमेरिकी अरबपति मस्क जल्द ही यही स्टारलिंक सर्विस भारत में भी शुरू करना चाह रहे हैं.
क्या लगा है स्टारलिंक पर आरोप?
कुछ यूक्रेनी अधिकारियों ने इसे ‘परमाणु हमले’ जैसा बताया क्योंकि कई मिशन रद्द करने पड़े और फ्रंटलाइन ऑपरेशंस बाधित हुए.स्टारलिंक एक कमर्शियल सर्विस है. हालांकि मस्क का कहना है कि स्टारशील्ड अमेरिकी सरकार और सेना के कंट्रोल में है और उसकी स्पीड या इस्तेमाल का फैसला अमेरिकी सेना और अंतिम फैसला अमेरिकी राष्ट्रपति का होता है. इससे पहले मस्क ने फरवरी में रूसी सेना के लिए स्टारलिंक बंद कर दिया था. इससे रूस को यूक्रेन में लड़ाई लड़ने में परेशानी हुई और उसके कमांडरों और सैनिकों के बीच तालमेल बिगड़ गया था.
यह पहला मौका नहीं है, जब स्टारलिंक पर इस तरह के आरोप लगे हैं. 2023 में स्पेसएक्स ने स्वीकार किया कि युक्रेन में युद्ध के दौरान स्टारलिंक के कुछ उपयोग को सीमित किया गया. इससे यह बहस छिड़ी कि क्या एक निजी सैटेलाइट कंपनी युद्धरत देश की सैन्य क्षमता को प्रभावित कर सकती है.
एलन मस्क के स्टारलिंक की धोखेबाजी
स्टारशील्ड क्या है?
स्टारशील्ड (Starshield) स्पेसएक्स का सैन्य और सरकारी उपयोग के लिए बना सैटेलाइट नेटवर्क है. इसे आसान भाषा में “स्टारलिंक का सरकारी/सैन्य संस्करण” कहा जा सकता है. जिसका उद्देश्य आम इंटरनेट देना नहीं, बल्कि सुरक्षित संचार, जासूसी/अवलोकन और राष्ट्रीय सुरक्षा मिशन को सपोर्ट करना है. स्टारशील्ड हाई लेवल का एन्क्रिप्शन और सीक्रेट डेटा हैंडल करती है.
भारत में स्टारलिंक शुरू करना चाहते हैं मस्क
मस्क जल्द ही भारत में ये सर्विसेज शुरू करना चाहते हैं. स्टारलिंक की खासियत से है कि यह जमीन पर बिछी इंटरनेट केबल या मोबाइल टावर के बजाए स्पेस में मौजूद अपने सैटैलाइट से इंटरनेट देता है. इसका फायदा ये है कि जिन दुर्गम गावों या पहाड़ी इलाकों में मोबाइल नेटवर्क या ब्रॉडबैंड से इंटरनेट पहुंचना मुश्किल है, इससे वहां भी इंटरनेट पहुंच सकता है. मस्क भारत में सस्ते प्लान लाने की तैयारी में है. नई कंपनी आने से इंटरनेट कंपनियों के बीच मुकाबला बढ़ेगा और इसका फायदा ग्राहकों को मिलेगा. बता दें कि भारत सरकार ने सैटेलाइट इंटरनेट सेवा के लिए जियो सैटकॉम, एयरटेल की सहयोगी कंपनी यूटेलसेट वनवेब और स्टारलिंक को लाइसेंस दिए हैं. पर सिर्फ लाइसेंस मिलना काफी नहीं है. अभी सुरक्षा से जुड़ी मंजूरियां और सैटेलाइट के जरिए इंटरने देने में इस्तेमाल होने वाली रेडियो फ्रीक्वेंसी की कीमत तय होना भी जरूरी है.
एलन मस्क भारत में स्टारलिंक को लाने के लिए बेताब हैं. (AI Generated Image)
युक्रेन की घटना के बाद क्या उठे सवाल?
यूक्रेन में स्टारलिंक की स्पीड पर लगी रोक से यह सवाल उठा है कि जब सेना किसी निजी कंपनी की इंटरनेट सर्विस पर निर्भर हो, तो कंपनी के तकनीकी फैसलों का उसके काम पर कितना असर पड़ सकता है. सारी कीमत चुकाने के बाद जब किसी तकनीक पर सैना की निर्भरता हो पर कंट्रोल की डोरी किसी प्राइवेट कंपनी या विदेशी सरकार के हाथ में हो, चिंताएं बढ़ जाती हैं. हालांकि जो यूक्रेन में हुआ, वो भारत में हो ये जरूरी नहीं. भारत में स्टारलिंक का इस्तेमाल दूर-दराज के इलाकों में इंटरनेट सर्विस पहुंचाने के लिए किया जाना है. इंटरनेट आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत बन गया है. ऐसे में अगर इसी पर किसी और का गुपचुप कंट्रोल हो, तो सुरक्षा के मायने से ये बड़ा सवाल हो जाता है.