Scientists Create Living Sand | अब सूखे रेगिस्तान में भी लहलहाएंगी फसलें, वैज्ञानिकों ने ढूंढी पानी सोखने वाली जिंदा रेत

Scientists Create Living Sand | अब सूखे रेगिस्तान में भी लहलहाएंगी फसलें, वैज्ञानिकों ने ढूंढी पानी सोखने वाली जिंदा रेत


इसी सोच के साथ यूएई की खलीफा यूनिवर्सिटी और स्विट्जरलैंड के रिसर्च संस्थानों ने साझा प्रयोग शुरू किया. उन्होंने संयुक्त अरब अमीरात के अल ऐन शहर के पास मौजूद रेत के टीलों से सैंपल इकट्ठा किए. इन सैंपल्स पर आधुनिक लैब में गहन टेस्टिंग की गई.

माइक्रोबियल फाइबर से मजबूत किए गए रेत के नमूने पानी में अपना आकार बनाए रखते हैं. (फोटो: खलीफा यूनिवर्सिटी)

वैज्ञानिकों ने बैक्टीरिया और फंगस से जिंदा रेत कैसे तैयार की?

लैब टेस्ट के दौरान पानी रोकने में कितना बड़ा फर्क देखने को मिला?

रिसर्च टीम ने रेत में पानी के ठहराव को नापने के लिए बहुत सटीक टेस्ट किए. उन्होंने पारदर्शी ट्यूबों में अलग-अलग तरह की रेत भरकर ऊपर से पानी डाला. इसके बाद उन्होंने पानी के नीचे बहने की रफ्तार को स्टॉपवॉच से रिकॉर्ड किया.

सामान्य रेत से पानी पलक झपकते ही नीचे बहकर निकल गया. लेकिन जिस रेत में बैक्टीरिया के फाइबर मौजूद थे, वहां पानी का बहाव छह गुना धीमा हो गया. दूसरे प्रयोग में वैज्ञानिकों ने बैक्टीरिया से बनी पतली सेल्युलोज शीट को रेत की परतों के बीच बिछा दिया.

माइक्रोस्कोपिक इमेज में रेत के कणों को आपस में जोड़ते हुए बायो-पॉलिमर फाइबर दिखाई दे रहे हैं. (Photo Credit : खलीफा यूनिवर्सिटी)

इस शीट ने एक मजबूत फिल्टर की तरह काम किया. नतीजे बेहद हैरान करने वाले थे, क्योंकि पानी का रिसाव सामान्य रेत के मुकाबले 28 गुना तक घट गया. इसके अलावा रेत की नमी सोखकर रखने की क्षमता भी 20.2 प्रतिशत से बढ़कर 25.5 प्रतिशत तक पहुंच गई.

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10 किलो का वजन भी झेल गई बैक्टीरिया से बनी यह अनोखी रेत

क्या इस नई तकनीक से रेगिस्तान में सचमुच खेती करना आसान हो जाएगा?

दुनिया भर में रेगिस्तानीकरण एक बहुत बड़ा संकट बनता जा रहा है. उपजाऊ जमीन तेजी से बंजर रेत में तब्दील हो रही है. मिट्टी को स्थिर करने के लिए अभी तक कई तरह के केमिकल और प्लास्टिक का इस्तेमाल किया जाता रहा है.

ये सिंथेटिक पदार्थ पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाते हैं. बैक्टीरिया से तैयार होने वाली यह जिंदा रेत पूरी तरह से प्राकृतिक और बायोडिग्रेडेबल है. यह पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन जोड़ती है.

गुस्ताव नीस्ट्रोम ने कहा, ‘यह तरीका हमें रेत में ऑर्गेनिक पदार्थ और पानी लाने की इजाजत देता है और इसे कुछ हद तक स्थिर करता है.’ अगर यह प्रयोग बड़े पैमाने पर सफल रहता है, तो सूखे इलाकों में पानी की भारी बचत होगी और फसलें उगाना मुमकिन हो सकेगा.

रेगिस्तान की तपती रेत में रुकने लगा पानी, बैक्टीरिया और फंगस से बनी नई जिंदा रेत की खोज! (AI Generated Video)

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इस रिसर्च के सामने अभी कौन सी व्यावहारिक चुनौतियां हैं?

‘कार्बोहाइड्रेट पॉलीमर्स’ जर्नल में पब्लिश हुई यह स्टडी अभी शुरुआती लैब स्तर पर ही परखी गई है. लैब के अंदर बैक्टीरिया को सही तापमान, पानी और जरूरी ऑक्सीजन दी गई थी. खुले और तपते रेगिस्तान में ऐसे हालात बनाए रखना बेहद मुश्किल काम है.

टेस्ट के दौरान छह सेंटीमीटर के सैंपल में बैक्टीरिया की ग्रोथ भी एक जैसी नहीं थी. ऊपर की तरफ ग्रोथ कमजोर थी, जिसकी वजह से ऊपरी हिस्सा थोड़ा कमजोर रह गया. रिसर्च टीम के तीन वैज्ञानिकों ने इस तकनीक के लिए पेटेंट का आवेदन भी जमा किया है.

वैज्ञानिकों ने अभी तक इस जिंदा रेत पर असली फसलें उगाकर नहीं देखी हैं. यह भी देखना बाकी है कि रेगिस्तान की भीषण गर्मी में यह मैटेरियल कितने दिनों तक टिक पाता है. इन सभी सवालों के जवाब मिलने के बाद ही यह तकनीक खेतों तक पहुंच सकेगी.



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