शास्त्री भवन और कृषि भवन अब खाली होने लगे हैं. दशकों तक इन इमारतों में केंद्र सरकार के मंत्रालयों ने काम किया, नीतियां बनीं, फाइलें चलीं और पत्रकारों से लेकर आम नागरिकों तक की आवाजाही बनी रही. अब इनकी जगह कर्तव्य भवन-4 और कर्तव्य भवन-5 बनाए जाने हैं. सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना का यह अगला महत्वपूर्ण चरण है. लेकिन इन इमारतों के खाली होने के साथ एक सवाल भी खड़ा हो गया है. इन दोनों परिसरों में वर्षों से बसे सैकड़ों बंदरों का ठिकाना अब क्या होगा? यह सवाल जनवरी में भी उठा था, जब इमारतों को तोड़ने की खबर सामने आई थी. अब जब दफ्तर वास्तव में खाली किए जा रहे हैं, तो बंदरों के भविष्य को लेकर चिंता और गहरी हो गई है.
साथ-साथ बीती इंसान और बंदरों की जिंदगी
शास्त्री भवन और कृषि भवन केवल सरकारी कार्यालय नहीं थे. इन परिसरों में इंसानों और बंदरों ने वर्षों तक एक साथ अपनी जगह बनाई. गलियारों में कर्मचारियों की आवाजाही रहती थी, तो पेड़ों की डालियों, छतों और मुंडेरों पर बंदरों का बसेरा ता था. दोपहर में कर्मचारी टिफिन खोलते, तो आसपास बंदरों की मौजूदगी भी महसूस होती थी. दोनों के बीच एक तरह का अनकहा सहअस्तित्व विकसित हो गया था. इंसान अपने काम में व्यस्त रहते और बंदर परिसर के परिचित माहौल में अपनी दिनचर्या निभाते थे. वक्त के साथ यह दृश्य राजधानी के सरकारी इलाकों की रोजमर्रा की पहचान बन गया.
कृषि भवन में देश की कृषि नीतियों से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले हुए, जबकि शास्त्री भवन शिक्षा, कानून, संस्कृति और सूचना-प्रसारण जैसे क्षेत्रों के प्रशासनिक कामकाज का प्रमुख केंद्र रहा. कृषि भवन का निर्माण करीब 1957 में और शास्त्री भवन का निर्माण 1960 के दशक में हुआ. ये इमारतें उस दौर की गवाह हैं, जब स्वतंत्र भारत अपनी प्रशासनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए नए संस्थान और कार्यालय खड़े कर रहा था. इन भवनों के साथ बंदरों की मौजूदगी भी धीरे-धीरे राजधानी की इसी तस्वीर का हिस्सा बन गई. अब जब इनका पुराना स्वरूप मिटने जा रहा है, तो उन बेजुबान जीवों के आश्रय का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है.
इमारतें हटेंगी, बंदरों का क्या होगा?
दोनों परिसरों को खाली कराने के बाद यहां पुरानी इमारतों को तोड़कर नए भवन बनाए जाने हैं. मंत्रालयों का स्थानांतरण हो रहा है. दफ्तरों से फाइलें और फर्नीचर हटाए जा रहे हैं. लेकिन बंदरों के लिए किसी नए ठिकाने का सवाल केवल सामान समेटने जैसा नहीं है. उनके लिए किसी जगह का मतलब पेड़, छाया, पानी, भोजन और वर्षों में विकसित हुई परिचित दिनचर्या से होता है. जब ऐसा ठिकाना अचानक खत्म हो जाता है, तो बंदरों के झुंड आसपास के पार्कों, सड़कों और रिहायशी इलाकों की ओर रुख कर सकते हैं. इससे उन इलाकों में इंसानों और बंदरों के बीच टकराव की आशंका भी बढ़ जाती है.
दिल्ली में पहले भी बंदरों को पकड़कर असोला-भाटी वन्यजीव अभयारण्य में स्थानांतरित करने की पहल की गई है. इसके बावजूद बंदरों से जुड़ी शिकायतें पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं. कई बार स्थानांतरित किए गए बंदरों के लौट आने या खाली हुए इलाकों में दूसरे झुंडों के पहुंच जाने की समस्या सामने आती रही है. ऐसे में शास्त्री भवन और कृषि भवन जैसे बड़े परिसरों के खाली होने से आसपास के क्षेत्रों पर पड़ने वाले संभावित दबाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. जरूरत इस बात की है कि इमारतों को तोड़ने और निर्माण शुरू करने से पहले बंदरों की संख्या, उनके मौजूदा ठिकानों और उनके सुरक्षित पुनर्वास को लेकर ठोस योजना तैयार हो.
विस्थापन से आगे की जिम्मेदारी
दिल्ली में बंदरों के प्रबंधन को लेकर कानूनी और प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव हुए हैं. नगर निकायों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है. दिल्ली नगर निगम और नई दिल्ली नगरपालिका परिषद जैसे निकाय बंदरों को पकड़ने और उन्हें दूसरी जगह स्थानांतरित करने की प्रक्रिया में शामिल रहे हैं. लेकिन असली चुनौती केवल बंदरों को किसी एक स्थान से हटाने की नहीं है. यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि उन्हें जहां भेजा जाए, वहां उनके लिए पर्याप्त जगह और उपयुक्त प्राकृतिक वातावरण हो. भोजन और पानी की उपलब्धता के साथ ऐसी व्यवस्था भी होनी चाहिए, जिससे वे दोबारा शहर के घनी आबादी वाले इलाकों में लौटने के लिए मजबूर न हों.
शास्त्री भवन और कृषि भवन के बंदरों का मामला दरअसल दिल्ली के शहरी विकास से जुड़ी एक बड़ी समस्या की ओर ध्यान खींचता है. शहर का विस्तार होता है, पुरानी इमारतों की जगह नई इमारतें खड़ी होती हैं और आधुनिक सुविधाओं के लिए नए परिसर तैयार किए जाते हैं. लेकिन इस प्रक्रिया में पेड़ों, खुले स्थानों और उन प्राकृतिक ठिकानों की जरूरत अक्सर पीछे छूट जाती है, जिन पर अनेक जीव-जंतु निर्भर होते हैं. इंसान के लिए कार्यालय बदलना प्रशासनिक प्रक्रिया है, लेकिन किसी वन्यजीव के लिए उसका पुराना ठिकाना उजड़ना जीवन की पूरी व्यवस्था बदल जाने जैसा है.
एक शहर, दो किरायेदार और बदलता वक्त
यह तर्क दिया जा सकता है कि दिल्ली में बंदरों की मौजूदगी कोई नई बात नहीं है और दो सरकारी परिसरों के खाली होने से क्या फर्क पड़ेगा. लेकिन फर्क केवल बंदरों की संख्या का नहीं, बल्कि उनके विस्थापन से पैदा होने वाले दबाव का भी है. इन दोनों परिसरों में लंबे समय तक इंसान और बंदर आसपास रहते आए हैं. यह सहअस्तित्व राजधानी के सत्ता केंद्र की उस अनौपचारिक तस्वीर का हिस्सा था, जो सरकारी फाइलों, बैठकों और आदेशों से अलग एक जीवंत दुनिया को भी सामने लाता था. आने वाले समय में आधुनिक सुविधाओं से लैस नए भवन इस जगह की पहचान बदल देंगे. सवाल यह है कि इस बदलाव में उन जीवों के लिए कितनी जगह बच पाएगी, जिनकी मौजूदगी को अब तक परिसर की सामान्य गतिविधियों का हिस्सा मान लिया गया था.
शास्त्री भवन और कृषि भवन के खाली होने के साथ एक छोटी-सी साझी दुनिया भी समाप्त होने की ओर है. यहां सरकारी फाइलों के बीच इंसानों की दिनचर्या चलती थी और परिसर के किसी कोने में बंदरों का झुंड अपनी जगह बनाए रहता था. अब नई इमारतें बनेंगी, मंत्रालयों का कामकाज नए सिरे से व्यवस्थित होगा और राजधानी का यह हिस्सा आधुनिक रूप लेगा. लेकिन बंदरों के लिए कोई ठोस योजना है, तो उसे इमारतों के ध्वस्तीकरण से पहले जमीन पर उतरना चाहिए. अन्यथा वे अपने लिए नया ठिकाना तलाशेंगे और संभव है कि वह किसी पार्क, सड़क या रिहायशी बस्ती में हो. तब आज का सवाल किसी दूसरे इलाके की समस्या बनकर सामने आएगा.
हरित क्रांति से प्रशासनिक बदलाव तक
कृषि भवन और शास्त्री भवन की कहानी केवल इमारतों के निर्माण और ध्वस्तीकरण की कहानी नहीं है. इनकी दीवारों ने स्वतंत्र भारत के विकास, संघर्ष और उपलब्धियों के अनेक अध्याय देखे हैं. कृषि भवन उस यात्रा का साक्षी रहा, जिसमें खाद्यान्न की कमी से जूझता देश धीरे-धीरे कृषि उत्पादन में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ा. वहीं शास्त्री भवन ने शिक्षा, कानून, संस्कृति और सूचना-प्रसारण जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों के प्रशासनिक कामकाज को दशकों तक संभाला. दोनों भवन उस दौर की याद दिलाते हैं, जब सीमित संसाधनों के बावजूद स्वतंत्र भारत अपनी संस्थागत जरूरतों को पूरा करने और बड़े सपनों को साकार करने में जुटा था.
कृषि भवन : हरित क्रांति की नींव
करीब 1957 में बना कृषि भवन स्वतंत्रता के बाद देश की कृषि नीति तैयार करने वाले प्रमुख केंद्रों में शामिल रहा. यहां कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के साथ ग्रामीण विकास तथा पशुपालन और डेयरी जैसे क्षेत्रों से जुड़े मंत्रालयों का कामकाज भी संचालित होता रहा. आजादी के बाद भारत के सामने खाद्यान्न की भारी कमी एक बड़ी चुनौती थी. 1943 के बंगाल अकाल की त्रासदी देश की स्मृति में थी और 1960 के दशक तक भारत को अपनी जरूरतों के लिए विदेशों से अनाज आयात करना पड़ता था.
इसी दौर में कृषि उत्पादन बढ़ाने और खाद्यान्न के मामले में देश को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिशों ने गति पकड़ी. हरित क्रांति से जुड़ी नीतियों और कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने में कृषि भवन की महत्वपूर्ण भूमिका रही. महान कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन और अमेरिकी कृषि वैज्ञानिक नॉर्मन बोरलॉग सहित अनेक विशेषज्ञों के प्रयासों से उच्च उपज देने वाली गेहूं और धान की किस्मों, उर्वरकों, सिंचाई तथा आधुनिक कृषि तकनीकों को बढ़ावा मिला. इन पहलों ने भारतीय कृषि की दिशा बदलने में योगदान दिया. सी. सुब्रमण्यम और बाबू जगजीवन राम जैसे नेताओं ने कृषि मंत्री के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं. बाद के दशकों में कृषि भवन से कृषि विकास, किसानों की आर्थिक सहायता, फसल बीमा और खेती की नई पद्धतियों से जुड़ी नीतियों का संचालन भी होता रहा. इस तरह यह भवन केवल मंत्रालयों का मुख्यालय नहीं, बल्कि केंद्र और राज्यों के बीच कृषि संबंधी समन्वय का महत्वपूर्ण केंद्र बना रहा.
शास्त्री भवन : कई मंत्रालयों का साझा ठिकाना
राजेंद्र प्रसाद रोड पर स्थित शास्त्री भवन में केंद्र सरकार के अनेक मंत्रालयों और विभागों का कामकाज वर्षों तक चलता रहा. इसके बनने से पहले इस इलाके में सरकारी बंगले और एक प्राथमिक विद्यालय भी थे. बाद में यह परिसर शिक्षा, विधि एवं न्याय, सूचना एवं प्रसारण, विधायी कार्य, संस्कृति तथा रसायन एवं उर्वरक जैसे विभागों की गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया. पत्रकारों, वकीलों, शिक्षकों, सामाजिक संगठनों और संस्कृति से जुड़े लोगों के लिए भी यह एक जाना-पहचाना सरकारी पता था.
शास्त्री भवन की खासियत यह थी कि एक ही परिसर में शासन के अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े मंत्रालय काम करते थे. इस कारण इसके गलियारों में दिनभर हलचल रहती थी. कोई शिक्षा नीति से जुड़ी जानकारी लेने पहुंचता, तो कोई कानून या सरकारी फैसलों पर प्रतिक्रिया जानने के लिए अधिकारियों से मिलता. पत्रकारों की आवाजाही ने भी इसे राजधानी के प्रशासनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाए रखा. अब सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना के तहत निर्माण भवन और उद्योग भवन के बाद इन दोनों परिसरों की बारी आई है. मंत्रालयों का नए कर्तव्य भवनों में स्थानांतरण जारी है और शेष कार्यालयों को परिसर खाली करना है, ताकि आगे की निर्माण प्रक्रिया शुरू हो सके.
निस्संदेह, नई इमारतें आधुनिक सुविधाओं, बेहतर ऊर्जा प्रबंधन और अधिक व्यवस्थित कार्यालयी ढांचे के लिहाज से उपयोगी साबित हो सकती हैं. विकास के साथ प्रशासनिक जरूरतों का बदलना स्वाभाविक है. लेकिन पुरानी इमारतों का महत्व केवल उनकी उम्र या वास्तुशिल्प तक सीमित नहीं होता. कृषि भवन की स्मृतियों में हरित क्रांति और खाद्यान्न आत्मनिर्भरता की कहानी दर्ज है, जबकि शास्त्री भवन ने दशकों तक शासन, शिक्षा, कानून और संस्कृति से जुड़े कामकाज को अपने भीतर समेटे रखा. इनके साथ राजधानी के जीवन के अनेक छोटे-बड़े दृश्य भी जुड़े हैं, जिनमें इन परिसरों में रहने वाले बंदर भी शामिल हैं.
इन इमारतों के हटने के साथ स्वतंत्र भारत के प्रशासनिक इतिहास का एक अध्याय पीछे छूट जाएगा. नए भवनों का निर्माण भविष्य की जरूरतों को पूरा करेगा, लेकिन पुराने परिसरों से जुड़ी विरासत और वहां आश्रय पाने वाले जीवों के प्रति जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. विकास का अर्थ केवल पुरानी इमारतों को हटाकर नई इमारतें खड़ी करना नहीं होना चाहिए. यह भी देखना होगा कि बदलाव की इस प्रक्रिया में इतिहास की स्मृतियों, पर्यावरण और दूसरे जीवों के लिए क्या व्यवस्था की गई है. शास्त्री भवन और कृषि भवन की जगह भले ही नए कर्तव्य भवन ले लें, लेकिन इनसे जुड़ी विरासत और यहां रहने वाले बेजुबान जीवों के भविष्य का हिसाब भी विकास की योजना में शामिल होना चाहिए.