नाविक के ताने से बना ऋषिकेश का लक्ष्मण झूला, हरिद्वार की 250 साल पुरानी सेठ सूरजमल धर्मशाला से जुड़ा है अनूठा इतिहास

नाविक के ताने से बना ऋषिकेश का लक्ष्मण झूला, हरिद्वार की 250 साल पुरानी सेठ सूरजमल धर्मशाला से जुड़ा है अनूठा इतिहास


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Laxman Jhula History: क्या आप जानते हैं कि ऋषिकेश की पहचान बन चुके ऐतिहासिक लक्ष्मण झूले की नींव एक नाविक के तीखे तंज और एक मां के अटूट संकल्प पर रखी गई थी? 20वीं सदी में बदरी-केदार की दुर्गम यात्रा पर निकली एक मां को मिले ताने ने न सिर्फ गंगा के सीने पर लोहे का झूलता पुल खड़ा कर दिया, बल्कि हरिद्वार में 250 साल पुरानी सेठ सूरजमल धर्मशाला के रूप में लाखों तीर्थयात्रियों को एक सुरक्षित आशियाना भी दिया. पढ़िए दानवीर सेठ सूरजमल परिवार के उस ऐतिहासिक संकल्प की पूरी दास्तान.

Laxman Jhula History: ऋषिकेश के विश्वविख्यात लक्ष्मण झूले का ऐतिहासिक संबंध हरिद्वार के अपर रोड पर स्थित करीब 250 साल पुरानी सेठ सूरजमल धर्मशाला से जुड़ा है. 20वीं सदी की शुरुआत में बदरी-केदार की कठिन यात्रा पर जाने वाले तीर्थयात्रियों को उफनती गंगा पार करने में जोखिम उठाना पड़ता था. श्रद्धालुओं की इस समस्या को देखते हुए दानवीर सेठ सूरजमल परिवार ने लोहे के तारों वाले ऐतिहासिक लक्ष्मण झूले का निर्माण कराया था. इसी भाव से हरिद्वार में भव्य धर्मशाला भी बनाई गई थी ताकि चारधाम पर जाने वाले यात्रियों को सुरक्षित छत और अच्छा रास्ता मिल सके.

नाविक का तंज और मां का स्वाभिमान
हरिद्वार में स्थित सेठ सूरजमल धर्मशाला के संचालक श्रीनिवास से हमने बातचीत की तो उन्होंने बताया कि एक बार सेठ सूरजमल ने अपनी माता को बदरी-केदार यात्रा पर भेजा था. उस समय गंगा पार करने के लिए नाव से जाना पड़ता था. सेठ की माताजी जब नाव में बैठीं और नाव आगे की ओर बढ़ी तो उन्होंने देखा कि उनके कुछ साथी पीछे ही रह गए हैं. उन्होंने नाविक से नाव वापस मोड़ने का आग्रह किया लेकिन नाविक ने कहा कि नाव खुलने के बाद वापस नहीं जाती है.

सेठ की माता नाविक से नाव को वापसी के लिए कहती रहीं तो नाविक ने उन पर तंज कसते हुए कह दिया कि आपको ज्यादा परेशानी है तो अपने लिए एक पुल बनवा लो. नाविक की यह बात सेठ की माता के मन में घर कर गई और वह बिना यात्रा किए ही वापस लौट आईं.

मां का संकल्प और 1929 में बना ऐतिहासिक लक्ष्मण झूला
बदरी-केदार की यात्रा पूरी किए बगैर सेठ की माता सीधे कोलकाता लौट आईं तो बेटे ने यात्रा के बारे में पूछा. माता ने सेठ से कहा कि बदरी-केदार के दर्शन तभी करेंगी जब गंगा के ऊपर पुल बन जाएगा. मां के इस संकल्प को पूरा करने के लिए सेठ सूरजमल परिवार ने ब्रिटिश काल में सन् 1929 में लक्ष्मण झूला पुल का निर्माण कराया.

संचालक श्रीनिवास पांडे ने आगे बताया कि पुल की मरम्मत के लिए सेठ ने तत्कालीन सरकार को 1 लाख फिक्स डिपॉजिट के रूप में देकर एग्रीमेंट किया था कि इस पैसे के इंटरेस्ट यानी ब्याज से पुल की मरम्मत की जाएगी. लक्ष्मण झूला पुल बनाने से पहले सेठ ने हरिद्वार और लक्सर क्षेत्र में तीर्थयात्रियों के रुकने के लिए धर्मशालाएं बनाई थीं जो आज भी शान से खड़ी हैं.



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